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राजनीति छोड़ना चाहती थीं शीला दीक्षित, लेकिन निर्भया गैंगरेप ने मूड बदल दिया

दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने संस्मरण में कहा है कि उस वक्त त्याग पत्र देने का मतलब होता 'लड़ाई के मैदान' से भाग जाना

FP Staff Updated On: Jan 21, 2018 07:19 PM IST

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राजनीति छोड़ना चाहती थीं शीला दीक्षित, लेकिन निर्भया गैंगरेप ने मूड बदल दिया

शीला दीक्षित साल 2012 में मुख्यमंत्री पद छोड़ना चाहती थीं और इसके लिए उन्होंने कांग्रेस को अगले असेंबली चुनाव से पहले कोई नेता चुन लेने को कह दिया था. अपनी सेहत का हवाला देते हुए शीला दीक्षित ने सीएम पद छोड़ने का मूड बनाया था लेकिन अचानक निर्भया गैंगरेप की घटना हो गई और उन्हें मामला सुलझने तक रुकना पड़ा. दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने संस्मरण में कहा है कि उस वक्त त्याग पत्र देने का मतलब होता 'लड़ाई के मैदान' से भाग जाना इसलिए काफी सोच-समझ कर वे रुक गईं.

शीला ने 'सिटीजंस देल्हीः माई टाइम्स माई लाइफ' में कहा, निर्भया कांड के बाद मैं मजबूर हो गई. मेरे घर वाले जो मुझे उस वक्त काफी परेशान देख रहे थे, उन्होंने सीएम की कुर्सी छोड़ने की सलाह दी. लेकिन मुझे लगा कि ऐसे नाजुक दौर में कुर्सी छोड़ने का अर्थ लड़ाई के मैदान से भागना होगा.

हार का रहा दुख

शीला दीक्षित ने अपने संस्मरण में अपने तीन बार के कार्यकाल, दिल्ली में लाए गए बदलाव, 2013 में हार के बाद की चुनौतियों जैसे विषयों पर बेबाकी से लिखा है. 2013 चुनाव के बारे वे कहती हैं, यह हमारी करारी हार थी, मैं खुद 25,000 वोटों से हार गई. नई दिल्ली सीट मैं आप के अरविंद केजरीवाल के हाथों हार गई. इसके बाद हमें हल्के में लिया जाने लगा.

शीला के मुताबिक, दिल्ली की सरकार चूंकि यूपीए-2 से साथ थी, इसलिए दिल्ली की हार का असर केंद्र के चुनावों पर भी पड़ा और लोगों ने इसे जनविरोध के रूप में लिया. एक और फैक्टर था जैसा कि मैं समझती हूं. वोटरों का एक बड़ा वर्ग जो पहली बार वोट देने जा रहा था उनके जेहन में 15 साल पहले की दिल्ली नहीं थी. इस पीढ़ी ने दिल्ली में निर्वाध बिजली, फ्लाईओवर और मेट्रो रेल, कई नई यूनिवर्सिटी को स्वाभाविक अधिकार के रूप में लिया. उन लोगों को कम से कम इससे खुश होना चाहिए था.

घोटालों की भी चर्चा

शीला दीक्षित ने माना कि कॉमनवेल्थ घोटाला, 2 जी स्पेक्ट्रम और अन्ना हजारे के एंटी-करप्शन मुहिम ने भी मीडिया में सरकार के खिलाफ माहौल बनाया. संसद के बाहर और भीतर हम समझ बनाने में नाकाम रहे कि भ्रष्टाचार रोकने के लिए एक विजिलेंस सिस्टम के अलावा देश में कानून भी है. केंद्र सरकार को तब 'एक निर्णायक राजनीतिक प्रबंधन' संभालना चाहिए था. उन्होंने कहा, उस वक्त कांग्रेस नेताओं की छवि ऐसी बन गई कि सरकार के मंत्री एयरपोर्ट पर बाबा रामदेव को रिसीव करने जाते हैं. समूचे देश के सामने केंद्र की भी एक ऐसी ही छवि बन गई.

साल 2011 में बाबा रामदेव को अनशन करने से रोकने के लिए केंद्र के तत्कालीन मंत्री प्रणब मुखर्जी और कपिल सिब्बल ने उनसे एयरपोर्ट पर मुलाकात थी. यह कोशिश हालांकि बाद में विफल रही थी.

केंद्र से दिल्ली सरकार की खटपट

केंद्र की सरकार में खासकर कांग्रेस को लेकर लोगों की राय बदलने लगी थी. केंद्र का असर दिल्ली पर भी पड़ा. लेकिन यह जान लेना भी जरूरी है कि उस वक्त दिल्ली और केंद्र सरकार के बीच सबकुछ ठीक नहीं चल रहा था. इस संदर्भ में उन्होंने लोगों को याद दिलाया कि कैसे वह दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने की मांग कर रही थीं जिसे केंद्र सरकार लगातार अनसुना कर रही थी. या एमसीडी को तीन हिस्सों में बांटने के लिए उनकी सरकार को कैसे केंद्र से जूझना पड़ा. मामला इतना बढ़ा कि बाद में पार्टी आला कमान को बीच-बचाव करना पड़ा, तब जाकर मामला सुलझा. एमसीडी को उस वक्त 5 हिस्सों में बांटना था, लेकिन यह 3 हिस्सों में बंटकर रह गया.

राजनीति तो छोड़नी ही थी

शीला ने कहा, मैंने चुनावी राजनीति छोड़ने का मूड बना लिया था. घर के लोगों ने कहा, राजनीति से ज्यादा खुद का ख्याल रखना जरूरी है. त्याग पत्र देने का फैसला भी लगभग निश्चित था. तब चुनाव लगभग साल भर बाद थे, इसलिए पार्टी के पास पूरा मौका था कोई नया नेता चुनने का. लेकिन निर्भया गैंगरेप की घटना के बाद दिल्ली और देश में ऐसा उबाल पैदा हुआ कि मुझे अपना फैसला बदलना पड़ा.

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