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शशि थरूर गलत समझे: एक चायवाले को पीएम नेहरू ने नहीं, लोकतांत्रिक संस्थाओं ने बनाया

नेहरू-गांधी परिवार के प्रति अतिउत्साह दिखाने के चक्कर में पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर ने वही बात दोहरा डाली जो पीएम मोदी लगातार कहते रहे हैं.

Updated On: Nov 16, 2018 05:03 PM IST

FP Staff

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शशि थरूर गलत समझे: एक चायवाले को पीएम नेहरू ने नहीं, लोकतांत्रिक संस्थाओं ने बनाया

नेहरू-गांधी परिवार के प्रति अतिउत्साह दिखाने के चक्कर में पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर ने वही बात दोहरा डाली जो पीएम मोदी लगातार कहते रहे हैं. पीएम मोदी अक्सर कांग्रेस पर आरोप लगाते रहे हैं कि एक परिवार के प्रति आस्था दिखाने के चक्कर में कांग्रेसियों ने देश में हर बात का क्रेडिट एक परिवार को ही दे डाला है.

शशि थरूर ने अपनी किताब नेहरू: इन्वेंशन ऑफ इंडिया के लॉन्च के मौके पर कहा, ' अगर आज एक चायवाला भारत का पीएम बन सका है तो ऐसा नेहरू जी की वजह से ही संभव हुआ है. उन्होंने देश में ऐसी लोकतांत्रिक संस्थाएं स्थापित कीं जिनकी वजह से कोई आम भारतीय देश के सर्वोच्च पद तक पहुंच सकता है.'

बीजेपी ने कांग्रेस सांसद के इस वक्तव्य पर बेहद चुटीले तरीके से जवाब दिया है. बीजेपी के ट्विटर हैंडल से किए गए एक ट्वीट में लिखा गया कि थोड़ा करेक्शन है थरूर जी. नेहरू जी को पूरी मानवता के अस्तित्व के लिए भी क्रेडिट दिया जाना चाहिए.

इसमें कोई संदेह नहीं है कि देश के पहले प्रधानमंत्री के तौर पर जवाहर लाल नेहरू ने कुछ बेहतरीन संस्थाओं की स्थापना की. लेकिन एक अहम सवाल यह है कि क्या उन्होंने ऐसी संस्थाओं की स्थापना की जिसकी वजह से मोदी जैसे लोगों के लिए पीएम पद तक पहुंच पाना आसान हो गया?

अगर थरूर सही भी कह रहे हैं तो दूसरा सवाल यह है कि आखिर क्यों नेहरू जी अपनी पार्टी में ऐसी संस्थाओं की नींव डाली जिनके जरिए कोई चायवाला पार्टी अध्यक्ष पद तक पहुंच सके. नेहरू जी आजादी के पहले कई बार और आजाद भारत में पीएम रहते हुए कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर बने रहे. एक सवाल यह भी है कि पीएम और पार्टी प्रेसिडेंट रहते हुए उन्होंने क्यों इस तहत का ढांचा तैयार कि आगे चलकर पार्टी बिल्कुल परिवार के हाथों में ही बनी रहे.

Indira Gandhi

इंदिरा गांधी 42 साल की उम्र में 1959 में पार्टी की अध्यक्ष बनी थीं. तब जवाहर लाल नेहरू ही देश के प्रधानमंत्री थे. यह बात सही है कि इंदिरा अपने पिता की मौत के करीब डेढ़ साल बाद पीएम बनी थीं. नेहरू ने अपना उत्तराधिकारी भी घोषित नहीं किया था. लेकिन ये भी सच है कि तब तक वो पार्टी में इतनी मजबूत हो चुकी थीं कि पार्टी में सिंडिकेट ने उन्हें टॉप पोस्ट पर पहुंचाया. ये अलग कहानी है कि उन्होंने सिंडिकेट के साथ बाद में क्या किया?

एक बार जब इंदिरा गांधी ने खुद को नेता के तौर पर स्थापित कर लिया तो फिर या तो उन्होंने देवकांत बरुआ जैसे नेताओं को पार्टी का अध्यक्ष बनाया जो इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा के नारे लगाते थे या फिर वो खुद अपनी मौत तक कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर बनी रहीं. उनकी मौत के बाद राजीव गांदी पार्टी के अध्यक्ष पद पर काबिज हुए. सोनिया गांधी ने पार्टी अध्यक्ष का पद 1998 में संभाला था और वो भी सीताराम केसरी को दफ्तर से बाहर का दरवाजा दिखाकर. उसके बाद से 19 साल तक वो अध्यक्ष रहीं जो किसी भी पार्टी अध्यक्ष का सबसे लंबा कार्यकाल था. पिछले करीब एक साल नेहरू जी पड़नाती राहुल गांधी पार्टी के अध्यक्ष हैं.

दरअसल थरूर जिस बात को श्रेय जवाहर लाल नेहरू को दे रहे हैं वह देश के लोकतंत्र को दिया जाना चाहिए.

इस तथ्य पर भी ध्यान देना होगा कि नेहरू ने देश में लोकतांत्रिक राजव्यवस्था की स्थापना की नहीं की थी. दरअसल देश में बनाई गई नई व्यवस्था के पहले बेनिफिशियरी थे. क्योंकि वो महात्मा गांधी को सबसे प्रिय थे. भारत को एक लोकतांत्रिक देश बनाने का असली श्रेय संविधान सभा और ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष बी.आर. अंबेडकर को जाता है.

1946 में हुए कांस्टिटुएंट असेंबली के चुनाव में देशभर से जीते 389 सदस्यों में से नेहरू भी एक थे. ऐतिहासिक साक्ष्यों के मुताबिक कांस्टिटुएंट असंबेली ( बंटवारे के पहले का भारत ) की पहली मीटिंग 9 दिसंबर 1946 को हुई थी और उसके बाद 14 अगस्त 1947 को इसकी दूसरी बैठक हुई. इसकी आखिरी बैठक 24 जनवरी 1950 को हुई थी.

Jawaharlal-Nehru (1)

हालांकि संविधान का ढांचा बनाने के लिए 13 कमेटियां थीं और नेहरू कुछ कमेटियों के अध्यक्ष थे लेकिन सबसे महत्वपूर्ण कमेटी थी ड्राफ्टिंग कमेटी. इसकी स्थापना 29 अगस्त 1947 को हुई थी. इस कमेटी में बीआर अंबेडकर, कृष्णस्वामी अय्यर, एन गोपालास्वामी, के.एम मुंशी, मोहम्मद सादुल्ला, बीएल मिटर और डीपी खैतान थे. इसके कांस्टिट्यूशन एडवाइजर बीएन राजू.

थरूर को एक बात समझ लेनी चाहिए कि मोदी जैसे लोग इस देश के सर्वोच्च पद तक इसलिए पहुंच सके क्योंकि देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था थी और इसे संविधान के जरिए सुरक्षित रखा गया. नेहरू के बनाए सिस्टम की वजह से नहीं. इसके अलावा यह बात भी याद रखनी चाहिए कि नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री नेहरू परिवार को निशाने पर लेकर और नेहरूवादी राजनीति और अर्थव्यवस्था के सिस्टम की आलोचना कर बने हैं.

( फ़र्स्टपोस्ट पर संजय सिंह के लेख से इनपुट के साथ )

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