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राहुल गांधी का नया सिरदर्द बन सकते हैं पवार

एनसीपी के नेता शरद पवार एक बार फिर राजनीति में सक्रिय भूमिका में दिखाई दे रहे हैं

Updated On: Jan 30, 2018 08:00 PM IST

Syed Mojiz Imam
स्वतंत्र पत्रकार

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राहुल गांधी का नया सिरदर्द बन सकते हैं पवार

एनसीपी के नेता शरद पवार एक बार फिर राजनीति में सक्रिय भूमिका में दिखाई दे रहे हैं. शरद पवार ने विपक्ष के नेताओ के साथ बैठक की है. इससे पहले 26 जनवरी को मुबई में संविधान बचाओ मार्च आयोजित किया. जिसमें विपक्ष के कई नेता पहुंचे. बताया जा रहा है कि विपक्ष के नेताओं को खुद शरद पवार नें फोन करके न्योता दिया. हालांकि औपचारिक तौर पर एनसीपी की तरफ से कहा जा रहा है कि संसद के सत्र में फ्लोर स्ट्रेटजी के लिए ये मीटिंग की जा रही है. ताकि विपक्ष को एकजुट किया जा सके. लेकिन राजनीति कुछ और है. शरद पवार 2019 के चुनाव से पहले नया राजनीतिक दांव चल रहे हैं.

शरद पवार को ऐसा लग रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता घट रही है. राहुल गांधी अभी पूरी तरह से कांग्रेस की कमान संभालने में व्यस्त हैं. ऐसे में अपनी अगुवाई में राजनीतिक मोर्चा खड़ा करना चाहते हैं. शरद पावर बीजेपी के विरोध में तो राजनीतिक घेराबंदी करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इससे नई मुसीबत कांग्रेस के लिए खड़ी हो सकती है.

कांग्रेस सकते में

शरद पवार के इस अभियान से कांग्रेस असमंजस में है. हालांकि विवाद से बचने के लिए शरद पवार ने सोनिया गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से बात की है. कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सदस्य का कहना है कि कांग्रेस अभी वेट एंड वॉच कर रही है. क्योंकि अभी इस मसले पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी. लेकिन शरद पावर को जानने वाले लोग शरद पवार के इस राजनीतिक दांव के कई मायने निकाल रहे हैं.

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तस्वीर राहुल गांधी की फेसबुक वॉल से साभार

कुछ लोगों को मानना है कि शरद पवार एक ऐसा मोर्चा खड़ा करना चाहते हैं. जिसे कांग्रेस के विकल्प के तौर पर पेश किया जा सके. हालांकि कांग्रेस के नेता ये तो कह रहे हैं बिना कांग्रेस के कोई भी विकल्प नहीं बन सकता है. क्योंकि कांग्रेस सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है इसलिए इसकी अगुवाई में ही कोई यूपीए जैसा गठबंधन बनेगा, लेकिन औपचारिक तौर पर इस मसले पर कोई भी राय रखने से परहेज कर रहे हैं.

शरद पवार की राजनीति

शरद पवार दो मोर्चे पर अभी घिरे हुए हैं. एक तो परिवार में राजनीतिक विरासत की जंग भी संभालनी है. दूसरे एनसीपी के कई नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले चल रहे हैं. शरद पवार के बारे में कहा जा रहा है कि वो पॉवर पॉलिटिक्स करने में यकीन करते हैं. सत्ता से बहुत दिन दूर नहीं रह सकते हैं.

वरिष्ठ पत्रकार अजित द्विवेदी कहते है कि शरद पवार पहली बार 15 साल में महाराष्ट्र की सत्ता से बाहर हुए हैं. शरद पवार की पहली प्राथमिकता महाराष्ट्र की सत्ता हासिल करना है. दूसरा राजनीति में अपने वजूद को बचाए रखना. फिलहाल शरद पवार यही कर रहे हैं, लेकिन शरद पवार राजनीति में समझौते करने में माहिर व्यक्ति हैं.

ये बात दीगर है कि बीजेपी से सीधे समझौता नहीं कर सकते. लेकिन जिस सोनिया गांधी के विरोध में कांग्रेस से अलग हुए. उस कांग्रेस के साथ महाराष्ट्र में सरकार बनाई. फिर 2004 में मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली सरकार में मंत्री भी रहे. उनके रिश्ते बालासाहब ठाकरे और अटल बिहारी वाजपेयी से काफी अच्छे रहे हैं. अटल बिहारी वाजपेयी ने नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट का वाइस चेयरमैन शरद पवार को बनाया था. जाहिर है कि सत्ता के खेल से शरद पवार कम ही बाहर रहे हैं. शरद पवार जानते हैं कि कब कौन सा राजनीतिक दांव चलना है.

राहुल गांधी के लिए परेशानी का सबब

राहुल गांधी हाल में ही कांग्रेस के अध्यक्ष बने हैं. उनके सामने 2019 का चुनाव है. कांग्रेस में जनरेशनल शिफ्ट का दौर चल रहा है. इसमें कांग्रेस के पुराने नेता वजूद बचा पाएंगे. ये कहना मुश्किल है, लेकिन राहुल गांधी की नई टीम राजनीतिक तौर पर शरद पवार जैसे मंझे हुए राजनेता के दांव को माकूल जवाब दे पाएंगे, ये देखना बाकी है. क्योंकि जिस विपक्षी एकजुटता की बात राहुल गांधी की तरफ से आनी चाहिए थी. उसमें शरद पवार बाजी मारते हुए दिखाई पड़ रहे हैं.

इससे पहले ऐसी बैठकें ज्यादातर सोनिया गांधी की अगुवाई में होती रही हैं. भले सभी राजनैतिक दल शामिल हो या ना हो. राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस के सबसे भरोसेमंद साथी लालू प्रसाद यादव ने भी कहा कि अगला चुनाव राहुल गांधी की अगुवाई में लड़ा जाए ये तय नहीं है. जाहिर है कि राजनीति के क्षेत्रीय क्षत्रप पहले भी कांग्रेस के लिए मुश्किल खड़ी कर चुके हैं.

Mulayam Singh

(फोटो: पीटीआई)

शरद पवार के साथ मुलायम सिंह के रिश्ते काफी अच्छे हैं. ममता बनर्जी ने 26 जनवरी वाली संविधान बचाओ रैली में अपना नुमाइदा भेजा था. सीपीएम के महासचिव सीताराम येचुरी और सीपीआई के डी. राजा भी इस मार्च में थे. कांग्रेस भी शरद पावर का मूड भांपने की कोशिश कर रही है. इसलिए कांग्रेस के तीन पूर्व मुख्यमंत्री इस प्रोग्राम में शरीक थे. कांग्रेस के नए साथी हार्दिक पटेल की मौजूदगी शरद पवार के मंसूबे को जाहिर करती है.

शरद पवार समय-समय पर विपक्ष को एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं. इससे पहले अगस्त 2015 में शरद पवार ने गैरबीजेपी गैर कांग्रेस के नेताओं की बैठक मुंबई में की थी.

क्या है राजनीतिक समीकरण

कांग्रेस की अगुवाई में यूपीए अभी भी है जिसकी अध्यक्ष सोनिया गांधी हैं. लेकिन इसकी तादाद लगातार घट रही है. कई पुराने दल छिटक गए हैं. शरद पवार को लग रहा है कि 2019 में अगर कोई समीकरण बिना कांग्रेस-बीजेपी के बनता है तो उनकी बात बन सकती है.

एनसीपी के नेता इसकी कई वजह बताते हैं. शुरुआत यूपी से करें तो एसपी बीएसपी दोनों को शरद पवार के साथ आने में कोई दिक्कत नहीं है. इस तरह बिहार में आरजेडी और नीतीश कुमार कभी भी पवार के पक्ष में जा सकते हैं. सीपीएम और टीएमसी दोनों के रिश्ते एनसीपी के साथ अच्छे हैं. बीजू जनता दल के नवीन पटनायक, टीडीपी के चंद्र बाबू नायडू और टीआरएस के चन्द्रशेखर राव किसी भी राजनीतिक फार्मूलाइजेशन का हिस्सा बन सकते हैं.

इस तरह डीएमके, एआईडीएमके और जेडीएस का भी हिसाब है. नार्थ ईस्ट की भी क्षेत्रीय पार्टियों को सिर्फ कांग्रेस से या बीजेपी से ही मोह नहीं है. आमआदमी पार्टी भले ही शरद पावर के विरोध में रही हो लेकिन अब रिश्ते अच्छे हैं.

राहुल गांधी को पेश करना होगा विकल्प

Sharad Pawar

कांग्रेस के नेता गुजरात चुनाव के नतीजों से उत्साहित है लेकिन अभी कर्नाटक चुनाव के नतीजों के बाद ही कोई पेशकश करने की उम्मीद है. कांग्रेस के लोग चाहते हैं कि जब गठबंधन की बात शुरू की जाए, तब कांग्रेस एक सशक्त पार्टी के तौर पर दिखने लगे. नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के और घटने का इंतजार अभी कांग्रेस कर रही है.

इस बीच राजनीति में जो कोशिश गैर कांग्रेसी दल कर रहे हैं उसके नतीजे भी सामने होंगे. कांग्रेस के लोग दलील दे रहे हैं कि राहुल गांधी युवा हैं. देश में युवाओं के मुद्दे हावी हैं. खासकर बेरोजगारी और दीगर मसले देश के सामने हैं. आज का वोटर राजनीतिक तौर पर युवा राहुल गांधी को विकल्प के तौर पर देखेगा. जिस तरह गुजरात में हुआ.

शरद पवार राजनीति के माहिर खिलाड़ी जरूर हैं लेकिन अभी सत्ता से बाहर हैं. इसलिए कि 2014 में राजनीतिक नब्ज नहीं टटोल नहीं पाए. एनसीपी कांग्रेस से अलग हुई तो उसका फायदा सीधे बीजेपी को मिला. शिवसेना को मिलता तो शायद शरद पवार की राजनीति चमकती रहती क्योंकि शिवसेना अध्यक्ष के साथ गहरे रिश्ते हैं.

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