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बिहार कांग्रेस में जान फूंकने के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं शक्ति सिंह गोहिल

बुधवार को बिहार कांग्रेस के जिलाध्यक्षों की बैठक पटना के सदाकत आश्रम में हुई. बिहार कांग्रेस के नवनियुक्त प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल की मौजूदगी में हुई बैठक में जिलाध्यक्षों को कई जरूरी दिशा-निर्देश दिए गए

Updated On: Apr 26, 2018 01:58 PM IST

Ravishankar Singh Ravishankar Singh

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बिहार कांग्रेस में जान फूंकने के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं शक्ति सिंह गोहिल

बिहार कांग्रेस में जान फूंकने की दिशा में एक बार फिर से भागीरथी प्रयास तेज हो गए हैं. बुधवार को बिहार कांग्रेस के जिलाध्यक्षों की बैठक पटना के सदाकत आश्रम में हुई. बिहार कांग्रेस के नवनियुक्त प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल की मौजूदगी में हुई बैठक में जिलाध्यक्षों को कई जरूरी दिशा-निर्देश दिए गए. इस बैठक में यह निर्णय लिया गया कि बिहार को तीन जोन में बांटकर तीन सेक्रेटरी बनाए जाएंगे. नेताओं को पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी को खत्म करने की सलाह भी दिए गए.

राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद से ही यह कयास लगाए जा रहे थे कि बिहार और यूपी जैसे राज्यों में कांग्रेस संगठन पर विशेष ध्यान देने वाली है. कुछ राज्यों के प्रभारी बदलने के बाद यह दिखने भी लगा. केंद्रीय स्तर से लेकर राज्य स्तर तक 2019 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए पार्टी में काफी फेरबदल किए जा रहे हैं.

बिहार में भी पार्टी को एक सशक्त विपक्ष की भूमिका निभाने के लिए और मजबूत करने की लगातार कोशिश चल रही है. खुद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी पिछले कई मौकों पर कह चुके हैं कि बिहार में पार्टी को मजबूत करने के लिए जरूरी प्रयास और ठोस कदम उठाए जाएंगे.

शक्ति सिंह गोहिल बना रहे हैं रणनीति

बिहार कांग्रेस के नए प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल ने बुधवार को मीडिया से बात करते हुए कहा, ‘बिहार एक बड़ा प्रदेश है. कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए राज्य को तीन हिस्सों में बांटकर तीन सचिव बनाए जाएंगे. यह काम काफी अर्से से रुका हुआ है. कांग्रेस के जिलाध्यक्ष और प्रखंड अध्यक्ष बिहार में लोगों की आवाज बनेंगे और पार्टी को मजबूत करेंगे.’

कांग्रेस पार्टी राज्य की सियासत में मजबूती से कदम बढ़ाने की दिशा में लगातार प्रयास कर रही है, लेकिन बिहार की मौजूदा राजनीतिक हालात पार्टी के लिए मुफीद नहीं है. बिहार में पार्टी की लगातार टूट और अंदरूनी गुटबाजी ने पार्टी को काफी नुकसान पुहंचाया है. एक के बाद एक नेता पार्टी से दूर होते जा रहे हैं. पार्टी पिछले कई सालों से अंदरूनी गुटबाजी से परेशान और त्रस्त चल रही है.

बिहार में कांग्रेस पार्टी ने भले ही सीपी जोशी की जगह शक्ति सिंह गोहिल को प्रभारी बना दिया है इसके बावजूद अब तक कोई परिवर्तन नजर नहीं आ रहा है. कांग्रेस पार्टी के नए बिहार प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल भी पार्टी की गुटबाजी से परेशान नजर आ रहे हैं. पिछले दिनों उनके पटना आगमन के बाद पार्टी में गुटबाजी खुलकर सामने आ गई थी. पार्टी को बिहार में एक पूर्णकालिक अध्यक्ष बनाने में अब भी पसीना छूट रहा है. अशोक चौधरी के पार्टी छोड़ने के बाद से ही अध्यक्ष का पद खाली चल रहा है. कौकब कादरी को प्रभारी अध्यक्ष बना कर जैसे-तैसे काम चलाया जा रहा है.

इसके बावजूद गोहिल एक्शन में दिख रहे हैं. पार्टी की मजबूती और आम लोगों में पार्टी के प्रति विश्वास पैदा करने के लिए गोहिल लगातार प्रयास कर रहे हैं. कई स्तर पर प्लान तैयार किए जा रहे हैं. बिहार को तीन हिस्सों में बांटकर सचिव स्तर के प्रभारी को नियुक्त करने की बात कही जा रही है.

पार्टी में अनुशासन कायम करने को लेकर भी अंदरखाने खूब चर्चा हो रही है. प्रखंड और जिला स्तर पर सक्षम लोगों को मौका देने की बात भी कही जा रही है. कहा यह जा रहा है कि जो पदाधिकारी प्रखंड और जिला स्तर पर सक्षम नहीं हैं उनकी जगह दूसरे लोगों को मौका दिया जाएगा.

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लंबे समय से बिहार में कमजोर रही है कांग्रेस

आपको बता दें कि लंबे समय से सत्ता दूर रही कांग्रेस पार्टी बिहार में 2015 विधानसभा चुनाव में 27 विधायकों के साथ जीत कर आई थी. पिछले 20 सालों में इससे ज्यादा सीट कांग्रेस पार्टी को कभी नहीं मिली थी. महागठबंधन की सरकार बनने के बाद कांग्रेस को 20 महीने सरकार चलाने का मौका भी मिला था, लेकिन नीतीश कुमार का एनडीए के साथ जाने के बाद यह मौका हाथ से निकल गया. नीतीश कुमार के मुताबिक केंद्रीय नेतृत्व का तेजस्वी यादव पर फैसला नहीं लेना एक बहुत बड़ी वजह थी.

पिछले साल सीबीआई के द्वारा रेलवे टेंडर घोटाले में तेजस्वी यादव के नाम सामने आने के बाद नीतीश कुमार ने दिल्ली जाकर राहुल गांधी से मुलाकात भी की थी. बाद में कोई नतीजा नहीं निकलने पर नीतीश कुमार ने कांग्रेस पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व पर तेजस्वी पर फैसला नहीं लेने का आरोप मढ़ा था.

गोहिल के ये दो फैसले साबित हो सकते हैं फायदे का सौदा

बिहार के राजनीतिक गलियारे में यह चर्चा खूब गरम है कि बिहार कांग्रेस के अंदर अभी भी कई गुट बने हुए हैं. पिछले कुछ सालों से यह देखा जा रहा है कि कांग्रेस आलाकमान डैमेज कंट्रोल की कोशिश तो शुरू करती है, पर इसके बावजूद पार्टी को टूट से बचाने में नाकाम साबित रहती है. पार्टी में कभी सदानंद सिंह तो कभी अखिलेश सिंह तो कभी अशोक चौधरी को लेकर परेशानी झेलनी पड़ती है.

ऐसे में नए प्रभारी ने संतुलन बनाकर चलने में ही फायदा समझा है. हाल ही में अखिलेश सिंह को बिहार से राज्यसभा भेजना और प्रेमचंद्र मिश्रा को विधान परिषद में भेजना इसी नजरिए से देखा जा रहा है. कहा जा रहा है कि गोहिल का यह दोनों फैसला पार्टी के भविष्य के लिए फायदे का सौदा साबित हो सकता है. पार्टी इन दोनों नेताओं के जरिए ब्राह्मण और भूमिहार जाति के वोट बैंक में सेंध लगा सकती है.

दोनों नेताओं का राज्यसभा और विधान परिषद में भेजने के दौरान पार्टी के विधायकों ने जिस एकजुटता का परिचय दिया है, उससे आलाकमान भी काफी कुछ खुश नजर आ रही है.

इसके बावजूद बिहार में कांग्रेस पार्टी के लिए दिल्ली अभी काफी दूर है. मीडिया रिपोर्ट्स में अब भी कांग्रेस में टूट को लेकर खबरें प्रकाशित होती रहती हैं. ऐसा कहा जा रहा है कि पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता जेडीयू नेताओं से लगातार संपर्क में हैं. कुछ विधायक अब भी पूर्व प्रदेश प्रदेश अध्यक्ष अशोक चौधरी के संपर्क में बने हुए हैं. दल बदल कानून से बचने के लिए पार्टी में टूट के लिए कम से कम 18 विधायकों के समर्थन की जरूरत है.

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'राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाना एक मकसद'

बिहार कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और लंबे समय से पार्टी का टीवी चैनलों में पक्ष रखने वाले प्रेमचंद्र मिश्रा फ़र्स्टपोस्ट हिंदी से बात करते हुए हैं, ‘देखिए 29 अप्रैल को दिल्ली में होने वाली रैली को लेकर गोहिल जी पटना आए हुए थे. इसी क्रम में राज्य के जिलाध्यक्षों की बैठक बुलाई गई. पार्टी के भीतर सक्रियता बढ़ाने की कोशिश हो रही है. बिहार की राजनीति में पार्टी एक्टिव रोल अदा करे इसके लिए हमलोग लगातार प्रयासरत हैं. पार्टी के संगठन का विस्तार हो इस पर जोर-शोर से काम चल रहा है. नए प्रभारी का क्या रणनीति होगी यह हम नहीं कह सकते हैं, लेकिन हर जिले का दौरा कर पार्टी को मजबूत करने की दिशा में वह एक ठोस कदम उठा रहे हैं.’

प्रेमचंद्र मिश्रा आगे कहते हैं, देखिए कांग्रेस पार्टी बिहार में अपने बूते खड़ा होना चाहती है. पार्टी समान विचारधारा वाले पार्टियों के साथ भी गठबंधन करेगी इसमें कहीं कोई दो राय नहीं है. आरजेडी के साथ मेरा गठबंधन चल रहा है. वैचारिक स्तर पर हम दोनों सेक्युलर साथी हैं. कांग्रेस की कोशिश होगी कि बिहार में सेक्युलर विचारधारा को और मजबूत किया जाए. जहां तक पार्टी में गुटबाजी की बात मीडिया में आ रही है यह सरासर गलत है. पार्टी के अंदर कोई गुटबाजी नहीं है. हम सब मिल कर काम कर रहे हैं. मकसद एक है कि राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाना है. हमलोगों का फिलहाल कोई दूसरा टारगेट नहीं है. हमने राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने को लेकर अपनी सारे मतभेद खत्म कर दिए हैं.’

बिहार की सियासत में कांग्रेस का उठने और गिरने का सिलसिला पिछले तीन दशकों से चला आ रहा है. पार्टी पिछले तीन दशकों से कभी आरजेडी तो कभी जेडीयू की पिछलग्गू के तमगे से अपने आपको निकाल नहीं पा रही है. पार्टी पिछले तीन दशक से इस स्थिति में कभी नहीं रही कि अपने बलबूते पर वह सरकार चलाए या फिर किंगमेकर की भूमिका भी निभाए.

जानकार मानते हैं कि पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी और केंद्रीय नेतृत्व का बिहार जैसे राज्यों का उपेक्षा करना. पिछले कई सालों से कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व बिहार को ज्यादा तरजीह नहीं देती. केंद्रीय नेतृत्व मान चुकी है कि बिहार में वह आरजेडी का पिछलग्गू बनकर ही कुछ हासिल कर सकती है, जो कि बिल्कुल गलत है. आरजेडी के साथ चलने और नहीं चलने को लेकर भी समय-समय पर पार्टी के अंदर आवाज बुलंद होती रहती है.

पिछले दिनों ही पार्टी के वरिष्ठ नेता और बछवाड़ा विधानसभा सीट से पार्टी के विधायक रामदेव राय ने पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था. रामदेव राय ने कांग्रेस के बाकी विधायकों से कहा था कि वह भी विद्रोह का बिगुल फूंके. रामदेव राय ने मीडिया से बात करते हुए कहा था कि बिहार में जिसके हाथों में पार्टी की कमान दी गई है, वह कभी भी पार्टी के जमीनी स्तर के नेताओं से सलाह मशविरा नहीं करते. रामदेव राय का कहना था कि हमारे जैसे सैकड़ों लोगों ने पूरा जीवन कांग्रेस को दे दिया, लेकिन अब उन्हीं लोगों का पार्टी में अपमान हो रहा है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि बिहार के नए प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल पार्टी को कैसे आगे बढ़ाएंगे?

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