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तीसरे चरण में 7 जिलों में होगी 'चेहरा और साख' बचाने की चुनौती

तीसरे चरण में 12 में से 7 जिले ऐसे हैं जो भले ही आज सपा के गढ़ हैं लेकिन पहले बीजेपी और बीएसपी की भी यहां लहर होती थी.

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Feb 18, 2017 07:59 PM IST

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तीसरे चरण में 7 जिलों में होगी 'चेहरा और साख' बचाने की चुनौती

यूपी चुनाव के तीसरे चरण में इस बार 12 जिलों की 69 सीटों पर मतदान हो रहा है. पिछले विधासभा चुनाव के नतीजे बता रहे हैं कि यहां समाजवादी पार्टी की बयार किसी सुनामी की तरह चली थी.

सपा ने कुल 55 सीटें जीती थीं. 12 जिलों में 7 जिले ऐसे भी थे जहां बीएसपी और बीजेपी का वर्चस्व हुआ करता था. लेकिन बदलाव की आंधी में वो पारंपरिक किले भी ढह गए थे. इस बार इन 7 जिलों में फिर से कांटे की टक्कर है.

लखनऊ में कौन करेगा राज ?

लखनऊ में विधानसभा की 9 सीटें हैं. साल 2012 में सपा ने 7 सीटें जीती थीं जबकि बीजेपी को केवल 1 सीट मिली थी. कांग्रेस को भी एकमात्र सीट लखनऊ कैंट की मिली थी.

LUCKNOW

लखनऊ से पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी 5 बार सासंद रहे. राजनाथ सिंह और लालजी टंडन की विरासत वाले लखनऊ में बीजेपी धीरे धीरे कमजोर होती चली गई. इस बार यहां सबने जोर लगा दिया है.

हरदोई में सपा बचाएगी गढ़ ? 

हरदोई में विधानसभा की 8 सीटें हैं. हरदोई की सीट पर समाजवादी पार्टी का वर्चस्व कायम रहा है. साल 2012 में समाजवादी पार्टी ने 8 में से 6 सीटें जीती थीं.

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हरदोई को सपा के राष्ट्रीय महासचिव नरेश अग्रवाल का गढ़ माना जाता है. इस बार नरेश के बेटे नितिन अग्रवाल हरदोई सदर से मैदान में खड़े हुए हैं. नरेश अग्रवाल के ऊपर अपने गढ़ में अच्छे प्रदर्शन की चुनौती है.

इटावा में सपा की अंतर्कलह बिगाड़ न दे खेल ?

इटावा में विधानसभा की 3 सीटें हैं. ये निर्विवाद रूप से समाजवादी पार्टी का गढ़ हैं. साल 2012 में समाजवादी पार्टी ने सभी 3 सीट जीती थीं. जसवंत नगर से शिवपाल सिंह यादव लगातार चुनाव जीतते आए हैं. साल 2002 में मुलायम सिंह ने ये सीट शिवपाल सिंह यादव के लिये छोड़ी थी.

ITAWA

लेकिन मुलायम परिवार में हुई कलह का असर जसवंत नगर सीट पर दिखाई पड़ सकता है. हाल ही में शिवपाल सिंह यादव ने ये तक कह दिया था कि चुनाव बाद वो नई पार्टी बनाने के बारे में सोच सकते हैं. जिस पर पलटवार करते हुए अखिलेश ने कहा था कि आरोप उन पर लग रहे थे नई पार्टी बनाने के लेकिन बना कोई और रहा है. ऐसे में पारिवारिक कलह थमने के आसार नहीं दिख रहे हैं.

खुद अखिलेश की पत्नी डिंपल यादव भी ये बयान दे चुकी हैं कि लोगों ने यही कोशिश की थी कि केवल भैया के पास चाबी और भाभी रह जाएं. जाहिर तौर पर ऐसे में इटावा में मतदाता क्या सोचकर फैसला करता है वो देखने वाली बात होगी. पारिवारिक कलह की वजह से इस बार इटावा में सपा पर पुरानी जीत बरकरार रखने की चुनौती है.

मैनपुरी में विधानसभा की 4 सीट

साल 2012 समाजवादी पार्टी ने सभी 4 सीटें जीत ली थीं. लेकिन इस बार यहां शिवपाल फैक्टर अखिलेश के समीकरण बिगाड़ सकता है. वहीं खुद बीजेपी को भी टिकट बांटने की वजह से नाराजगी झेलनी पड़ सकती है.

मैनपुरी की भोगांव सीट पर ममता राजपूत का नाम काटकर राहुल राठौर को टिकट दे दिया गया है. ऐसे में ममता राजपूत बीजेपी के लिये मुश्किल खड़ी कर सकती हैं.

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ओरैया में विधानसभा की 3 सीट

ओरैया पर भी सपा ने साल 2012 के विधानसभा चुनाव में सभी सीटें जीत ली थीं.

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बाराबंकी में विधासभा की 6 सीट

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बाराबंकी की हैदरगढ़ सीट से राजनाथ सिंह जीतकर सीएम बन चुके हैं. वहीं इसे बेनी प्रसाद वर्मा का भी गढ़ माना जाता है. साल 2012 में यहां भी सपा ने 6 में से 5 सीटों पर जीत हासिल की थी. इस बार कैबिनेट मंत्री अरविंद सिंह गोप बाराबंकी के रामनगर से चुनाव लड़ रहे हैं. बेनी प्रसाद वर्मा के साथ अरविंद सिंह गोप के रिश्तों में तल्खी रही है. इसका इस चुनाव पर भी असर पड़ सकता है. लेकिन बाराबंकी में बेनी प्रसाद वर्मा की अहमियत को देखते हुए ही उनकी सपा में वापसी हुई है.

 

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