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देवबंद में 'ईसाइयत को नकारने' वाला विभाग क्यों बना?

देवबंद पर फर्स्ट पोस्ट हिंदी की स्पेशल स्टोरी की सीरीज का यह दूसरा हिस्सा है.

Updated On: Nov 27, 2016 07:26 AM IST

Nazim Naqvi

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देवबंद में 'ईसाइयत को नकारने' वाला विभाग क्यों बना?

हम देवबंद के सफर पर हैं तो आइए ये भी जानते चलें कि मदरसे का चलन इस्लाम में कब से है:

इस्लाम में मदरसे की कल्पना मस्जिद से जुड़े हुए किसी ऊंचे चबूतरे से शुरू होती है. इसे मंच भी कहा जा सकता है. मदीने में मोहम्मद साहब जिस मस्जिद में नियमित प्रार्थना करते थे उससे जुड़ा हुआ एक मंचनुमा स्थान था जो 'सुफ्फा' कहलाता था.

मोहम्मद साहब के नजदीक पढ़ने और सीखने का कितना महत्व था इसका अंदाजा 'इब्न माजा' के इस वर्णन से लगाया जा सकता है - जब ‘रसूलुल्लाह’ मस्जिद में आए तो उन्होंने देखा कि चबूतरे पर उनके साथी दो अलग-अलग घेरों में बैठे हैं. एक घेरे में लोग कुरान की वंदना में व्यस्त थे. दूसरे गोल में लोग कुरान के अध्ययन में लगे थे. तो मोहम्मद साहब ये कहते हुए दूसरे-गोल में सम्मलित हो गये कि ‘यकीनन मुझे गुरु के रूप में आदेशित किया गया और भेजा गया है.’

10 वीं सदी तक तालीम का केंद्र थीं मस्जिदें

Madarsa

इतिहास में मिलता है कि 10वीं सदी तक इस्लामी तालीम का केंद्र मस्जिदें ही होती थीं. 11वीं सदी में, बगदाद में पहला नियमित भवन मदरसे के रूप में, 'मदरसा-ए-निज़ामिया' बना. भारत में कुतुबउद्दीन एबक के शासनकाल में, मुल्तान में पहला (लगभग 1222 ई.) मदरसा बना.

यह भी पढ़ें: मदरसों की मां: दारुल-उलूम देवबंद  (पार्ट 1)

दरअसल मोहम्मद साहब के समय तक इस्लाम का कोई कानूनी रूप नहीं था. मोहम्मद साहब के शरीर त्याग देने के बाद लगभग तीन सौ वर्षों तक इस्लाम, नैतिक अनुशासन पर आधारित रहा. मौलाना अरशद मदनी भी यही बताते हुए कहते हैं ‘रसूलुल्लाह’ ने उम्मत (अनुयायियों) को सिर्फ इल्म ही नहीं दिया बल्कि वो अल्लाह का आदेश पूरा करके दिखाया.

लेकिन 9वीं सदी के आस-पास एक लिखित कानून की जरूरत महसूस की जाने लगी. चूंकि मोहम्मद साहब के बाद इस्लाम में कई फिरके बन चुके थे इसलिए कानूनसाजी भी अलग-अलग हुई, जिसे शरिया कहकर पुकारा गया. मोटे तौर पर चार प्रकार की शरिया मिलती हैं जिनसे इस्लाम के ज्यादातर वर्ग जुड़े हुए हैं.

देवबंद इनमें से हनफी फिकह (हनफी-कानून) का पक्षधर है. लगभग सभी शरिया अल्लाह के आदेश (जो कुरान में दर्ज हैं) और मोहम्मद साहब के उपदेश, इन दोनों के तालमेल से किन्हीं तीसरे पक्ष द्वारा तैयार की गई हैं.

यकीनन, ये तीसरे पक्ष के लोग, अपने समय के बहुत प्रतिष्ठित लोग थे और इन्हें इस्लाम के अनुयायियों के बड़े वर्गों का समर्थन प्राप्त था. ये, ऐसे लोगों की सोहबत में बैठे हुए लोग थे, जिन्होंने अपनी आंखों और कानों से मुहम्मद साहब को देखा-सुना था. लेकिन तर्क-शास्त्र ये कहता है कि जब किसी एक बात को चार अलग-अलग तरह से बयान किया जाए तो पांचवी बात अपने आप पैदा हो जाती है.

इसलिए जो शरिया को अल्लाह का आदेश मानने से इंकार करते हैं वो इस पांचवें खाने से निकले हुए लोग हैं. वो इस बात की वकालत करते हैं कि शरिया से पहले जो नैतिकता के आधार पर इस्लाम का अध्ययन और अनुसरण हो रहा था वही अल्लाह का इस्लाम था और है.

क्या कहते हैं मौलाना अरशद मदनी 

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मौलाना अरशद मदनी जो उलेमा-ए-हिंद के प्रेसीडेंट भी हैं, उनका भी यही मानना है. वे कहते हैं ‘मजहबी तालीम बगैर तर्बियत के अपने अंदर कोई मानवीयत (अर्थ) नहीं रखती है. इसलिए मदरिसे इस्लामिया हो या दारुल उलूम देवबंद, बुनियादी तौर पर बच्चों को अपने यहां रख करके. उनको तालीम और शिक्षा देते हैं. उनकी तर्बियत भी  देते हैं.'

तो ये है देवबंद. उसका दारुल उलूम. हर तरफ एक अनुशासन भरी ज़िंदगी. इत्र और बिरयानी की खुश्बू में बसे बाजार, चौराहे, खूबसूरत जामे रशीद मस्जिद. पांच वक्त अजान की आवाजें. अपने पिछले लेख में हमने वादा किया था की इनके एक विशेष विभाग 'शोबा-ए-रद्दे-ईसाइयत' पर हम आपसे चर्चा करेंगे. वास्तव में कोई ऐसा विभाग किसी यूनिवर्सिटी में हो, चौकाने वाला है. हमने कभी ऐसा कोई विभाग कहीं नहीं देखा. देवबंद के एकेडेमिक विभागों की सूची में ये दर्ज है.

'शोबा-ए-रद्दे-ईसाइयत' यानी ईसाई धर्म को नकारने वाला विभाग. इनकी किताबों में इसका उल्लेख कुछ इस तरह मिलता है - दारुल-उलूम की स्थापना ऐसे समय में हुई जब मुल्क पूरी तरह ईसाइयों के हाथ में जा चुका था और ईसाई, मुसलमानों के धर्म पर हमला कर रहे थे.

इनसे टक्कर लेने और इनका प्रचार रोकने के लिए दारुल-उलूम ने बीड़ा उठाया और ईसाई मिशनरी का हर तरह से मुकाबला किया. इसी बीच 1998 में एक पूरे विभाग की बुनियाद डाली गई. ये विभाग हर साल दो ऐसे आलिम (विद्वान) तैयार करता है. जो देश-विदेश में जा-जाकर ईसाइयत का मुकाबला करते हैं.

हमारे लिए ये जानकारी बड़ी विचित्र थी क्योंकि कुरान-शरीफ में ईसाइयों को अहले-किताब कहा गया है जिसका अर्थ है वो कौमें, जिनके पास अल्लाह की किताब उतरी. ये एक विरोधाभास ही है कि जिस कौम की तारीफ अल्लाह स्वयं कर रहा हो उसका विरोध करने के लिए एक विभाग का निर्माण? कोई एक धर्म किसी दूसरे धर्म के बारे में इतनी नकारात्मक सोच कैसे रख सकता है?

अपने धर्म का पालन करना, और दूसरे धर्म की इज्जत करना, मानवता के नजदीक यही सबसे अच्छा रास्ता है. खुद कुरान में ये आदेश आया है कि ‘दूसरे के खुदाओं को बुरा न कहो नहीं तो पलट कर वो तुम्हारे खुदा को बुरा कहेंगे’.

हमारी इस परेशानी को कुछ हद तक मौलाना अरशद मदनी ने हल किया – ‘देखिए ये समझना होगा कि दारुल उलूम को किस बुनियाद और किस माहौल में बनाया? जब 1857 के संग्राम में हिंदू-मुसलमान दोनों की शिकस्त हो गई.  हजरत गंगोही जो उस वक्त अंग्रेजों के खिलाफ लड़े थे, वो जेल में बंद कर दिए गए. ये समझा गया कि उन्हें फांसी हो जाएगी पर ऐसा नहीं हुआ. लेकिन जब दो-तीन साल के बाद आम माफी का ऐलान हुआ और ये लोग घरों को लौट के आए तो इन्होंने अजीबो-गरीब चीज देखी. देखा कि चर्च के लोग, उन बच्चों को, जिनके बाप 1857 में शहीद हो गए थे, सड़कों  पर भीख मांग रहे हैं. माएं घरों में अपनी इज्जत बचाए बैठी हुई हैं, ईसाइयों ने उन बच्चों के हाथों को पकड़ना शुरू किया, ‘हमें दो बच्चे,  हम इन बच्चों को पढ़ाएंगे.  मतलब  क्या था इसका?

अरशद मदनी कहते हैं 'ये ईसाइयों की चाल थी कि बाप इनका दुश्मन था हमारा,  हम उसकी औलाद को अंग्रेजी और ईसाइयत की तालीम देकर अपना वफादार बनाएंगे. ये देखकर इन लोगों के दिल तड़पे और इसी का मुकाबला करने के लिए, नौ साल बाद दारूल-उलूम की बुनियाद रखी गई, और बिल्कुल उसी तरह,  मतलब हमें दो बच्चे,  हम उन्हें मुफ्त पढ़ाएंगे, मुफ्त खिलाएंगे, मुजाहिद की औलाद को मुजाहिद बनाएंगे.'

दुनियाभर में फैले विद्यार्थी

फोटो: आसिफ खान/फर्स्टपोस्ट हिंदी

फोटो: आसिफ खान/फर्स्टपोस्ट हिंदी

और ऐसा ही हुआ भी,  पिछले डेढ़ सौ वर्षों में हजारों विद्यार्थी इस संस्था से निकलकर इस्लाम को सुरक्षा  देने का काम कर रहे हैं. श्री लंका, जावा, समात्रा, मलया, बर्मा, चीन, मंगोलिया, तातार, कज़ान, साउथ अफ्रीका, बुखारा, समरकंद, अफगानिस्तान, मिस्र, और अरब आदि देशों में यहां से ट्रेनिंग लेकर पहुंच चुके हैं.

देवबंद से अपनी तालीम पूरी कर चुके मुफ्ती जाकिर हुसैन कासमी, यहां के शैक्षिक दृष्टिकोण को कुछ इस तरह बताते हैं- ‘हम यहां से तर्बियत हासिल करके पूरी दुनिया में जाकर इस्लामी तालीम का काम करते हैं,  दीनी तशनिगी, दीनी प्यास बुझाने का काम करते हैं,  और अपने मुसलमानों को आका-ए-मदीना से जोड़कर उनकी उस रास्ते की रहनुमाई करते हैं जिस रास्ते के जरिए, हम और आपका, सबका मकसद है, स्वर्ग यानी जन्नत में जाना.

तो ये है इल्म और ज्ञान के संबंध में देवबंद का दृष्टिकोण जिसे कासमी साहब ने दो टूक शब्दों में हमें बताया. देवबंद को अलविदा कहने का वक्त नजदीक आ रहा था लेकिन हमें अभी वो जगह भी देखनी थी जिसने हमारे समाज में फैली एक बुराई को जड़ से नहीं तो कम-से-कम देवबंद से तो उखाड़ फेंका था,.जी हां, सूदखरी की व्यवस्था, कैसे? तीसरी और अंतिम कड़ी में हम उसी का उल्लेख रेंगे.                                                                                                              जारी...

देवबंद पर फर्स्ट पोस्ट हिंदी का ये स्पेशल वीडियो जरूर देखें

https://hindi.firstpost.com/india/darul-uloom-deoband-the-mother-of-all-madrasas-2143.html

 

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