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मध्यप्रदेश के सरकारी सेक्टर में दस्तक दे रहा है भीमा-कोरेगांव

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर हाईकोर्ट के आदेश पर स्टे-ऑर्डर तो ले लिया है, लेकिन समस्या कम होने के बजाए बढ़ गई स्टे के कारण किसी भी तरह का प्रमोशन नहीं हो रहा है

Updated On: Jan 10, 2018 09:26 AM IST

Dinesh Gupta
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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मध्यप्रदेश के सरकारी सेक्टर में दस्तक दे रहा है भीमा-कोरेगांव

लगभग डेढ़ वर्ष पहले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जब यह बयान दिया था कि कोई माई का लाल नहीं है, जो प्रमोशन में रिजर्वेशन का समाप्त करा सके, उस वक्त उन्हें अनुमान नहीं था कि प्रमोशन में रिजर्वेशन का मामला दोधारी तलवार है. राज्य के कर्मचारियों का विभाजन जाति के आधार हो जाने के बाद अब स्थिति धीरे-धीरे नियंत्रण के बाहर होती जा रही है.

मुख्यमंत्री का यह बयान उस वक्त आया था, जब अप्रैल 2016 मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने प्रमोशन में रिजर्वेशन के नियमों को निरस्त कर दिया था. सरकार ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है. याचिका पर सुनवाई चल रही है. हाईकोर्ट द्वारा नियम निरस्त किए जाने के बाद सरकारी कर्मचारियों को पदोन्नति देना बंद है. आरक्षण के बगैर प्रमोशन न देने की सरकारी की नीति के कारण पिछले एक साल में हजारों कर्मचारी पात्रता होने के बाद भी बिना प्रमोशन के रिटायर हो गए है.

हम हैं माई के लाल की टोपी लगाकर सामान्य वर्ग के हजारों कर्मचारी राज्य भर में सरकार की प्रमोशन में रिजर्वेशन की नीति का विरोध कर रहे हैं. सामान्य वर्ग के कर्मचारियों के संगठन सपाक्स ने मंत्रियों ओर बीजेपी नेताओं का घेराव करने का ऐलान कर दिया है. सपाक्स संगठन में सामान्य वर्ग के अलावा पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक समुदाय के कर्मचारी भी सदस्य हैं.  सपाक्स के संस्थापक अजय जैन का दावा है कि इन वर्गों के कर्मचारियों की संख्या लगभग सत्तर प्रतिशत है. महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांव की घटना के बाद से ही राज्य का गुप्तचर विभाग मुख्यमंत्री को सरकारी सेक्टर में उभरे जातिवाद को लेकर चेतावनी दे रहा है.

दिग्विजय सरकार ने शुरू किया था प्रमोशन में आरक्षण

प्रमोशन में रिजर्वेशन की व्यवस्था लागू किए जाने के कारण ही वर्ष 2003 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को अपनी सत्ता गंवाना पड़ी थी. संविधान संशोधन के बाद दिग्विजय सिंह ने प्रमोशन में भी रिजर्वेशन देना तय किया था. सरकारी कर्मचारियों को प्रमोशन में रिजर्वेशन देने के नियम वर्ष 2002 में लागू किए गए. इन नियमों के लागू होने के बाद से अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के तृतीय श्रेणी के कई कर्मचारियों को पिछले पंद्रह साल में तीन से ज्यादा प्रमोशन मिल चुके हैं. कई विभागों में स्थिति यह है कि सामान्य वर्ग का वरिष्ठ कर्मचारी,आरक्षित वर्ग के जूनियर कर्मचारी का अधीनस्थ बन गया है.

Digvijay Singh

प्रमोशन में रिजर्वेशन की नीति के कारण लोक निर्माण और सिंचाई जैसे महकमों में सर्वोच्च पद पर योग्य अफसर ही नहीं मिल पा रहे हैं. हाईकोर्ट द्वारा प्रमोशन में रिजर्वेशन के नियम निरस्त करने के बाद स्थिति पदोन्नतियां निरस्त करने की बन गई है. पदोन्नति से मिले आर्थिक लाभ की भी वसूली की जानी है. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर हाईकोर्ट के आदेश पर स्टे-ऑर्डर तो ले लिया है, लेकिन समस्या कम होने के बजाए बढ़ गई. सुप्रीम कोर्ट के स्टे के कारण किसी भी तरह का प्रमोशन नहीं हो रहा है.

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प्रमोशन अटकने से दोनों ही वर्गों के कर्मचारियोंं की नाराजगी बढ़ती जा रही है. मुख्यमंंत्री प्रमोशन में रिजर्वेशन को बनाए रखना चाहते हैं. उन्होंने कार्मिक विभाग को नए नियम बनाने के लिए कहा है. मामला अदालत में लंबित होने के कारण कार्मिक विभाग अवमानना के डर से नए नियम बनाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है. अनुसूचित जाति और जनजाति के कर्मचारियों की नाराजगी को कम करने के लिए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में मामले की पैरवी के लिए देश के जाने-माने वकीलों को लगा रखा है. वकीलों की फीस सरकार दे रही है. मामले में एक पक्ष अनुसूचित जाति और जनजाति कर्मचारियों और अधिकारियों का संगठन अजाक्स भी है.

अजाक्स और सपाक्स के संरक्षक हैं आईएएस अफसर

आल इंडिया सर्विस के अधिकारियों के लिए केंद्र के कार्मिक मंत्रालय की जो आचार संहिता है, उसमें कोई भी आईएएस अफसर ऐसी गतिविधियों में हिस्सा नहीं ले सकते हैं, जो समाज में जाति और धर्म की खाई पैदा करते हो. कार्मिक मंत्रालय की इस नियम के बाद भी अजाक्स और सपाक्स संगठन की कमान आईएएस अधिकारियों के हाथ में है.

अजाक्स के अध्यक्ष आईएएस अधिकारी जेएन कंसोटिया हैं. जबकि सपाक्स के संरक्षक राजीव शर्मा हैं. सपाक्स की हाल ही में हुई बैठक में तय किया गया कि फरवरी के प्रथम सप्ताह से सामान्य वर्ग के मंत्रियों, सांसदों और विधायकों का घेराव किया जाएगा. राज्य मंत्रालय पर धरने का ऐलान भी किया गया है. अजाक्स को साधने का काम मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान खुद कर रहे हैं. उन्होंने दलित और आदिवासी वर्ग के बच्चों के लिए कई नई योजनाएं भी लागू कर दी हैं. सपाक्स और अजाक्स के बीच स्थिति सीधे टकराव की बन रही है. दोनों ही संगठन हर जिले में रैली और कार्यक्रम कर रहे हैं.

Shivraj Singh

उपचुनाव में बीजेपी को सबक सिखाने की रणनीति

सपाक्स के संरक्षक राजीव शर्मा कहते हैं कि आज समाज को जिस तरह जाति और धर्म मेंं बांटा जा रहा है,उसमें एक आईएएस अधिकारी के नाते उसे रोकना मेरा कर्त्तव्य है. संगठन के अध्यक्ष केएस तोमर कहते हैं कि आरक्षण का लाभ निचले स्तर तक पहुंचे, इसके लिए क्रीमीलेयर की व्यवस्था इसमें की जानी चाहिए.

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मध्यप्रदेश के इतिहास में यह पहली बार है कि दलित,आदिवासी और सामान्य वर्ग के बीच टकराव सड़कों पर देखने को मिल रहा है. सपाक्स ने तय किया है कि कोलारस एवं मुंगावली के विधानसभा उपचुनाव में बीजेपी का समर्थन नहीं करेंगे. अजाक्स का जोर प्रमोशन के नए नियम बनाने पर है. मुख्यमंत्री अजाक्स की इसी मांग को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.

कांग्रेस ने विवाद से दूरी बनाई

आरक्षित और सामान्य वर्ग के बीच उभर रही टकराव की स्थिति में कांग्रेस ने अपने आपको दूर रखा है. कांग्रेस के लिए स्थिति कुंआ और खाई वाली है. कांग्रेसी दबी जुबान से यह जरूर प्रचारित कर रहे हैं कि प्रामेशन में रिजर्वेशन उनकी सरकार ने ही दिया था. लेकिन, चुनाव में इसका लाभ नहीं मिला. दूसरी और भारतीय जनता पार्टी दलित और आदिवासी वोटों को हर सूरत में अपने पक्ष में करना चाहती है. राज्य में 36 प्रतिशत आबादी अनुसूचित जाति और जनजाति की है. ये दोनों कांग्रेस के परंपरागत वोटर माने जाते हैं.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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