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सुप्रीम कोर्ट के फैसले से प्रमोशन में आरक्षण की बाधाएं खत्म हो जाएंगी !

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई में पांच जजों की बेंच ने पुराने फैसले को लेकर काफी सावधानी बरतने और संतुलन साधने का प्रयास किया है.

Updated On: Sep 27, 2018 12:03 PM IST

Suhit K. Sen

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सुप्रीम कोर्ट के फैसले से प्रमोशन में आरक्षण की बाधाएं खत्म हो जाएंगी !

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में कहा है कि प्रमोशन में आरक्षण मामले में 2006 में पांच जजों की बेंच ने जो फैसला दिया था, उसे 7 जजों की संवैधानिक बेंच को सौंपने की जरूरत नहीं है. हालांकि, चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई में पांच जजों की बेंच ने पुराने फैसले को लेकर काफी सावधानी बरतने और संतुलन साधने का प्रयास किया है. साथ ही, ऐसा लगता है कि इस प्रक्रिया में अदालत ने अस्पष्टता के लिए कुछ गुंजाइश छोड़ दी है.

पहले हम प्रमोशन में आरक्षण के सिलसिले में सर्वोच्च अदालत के 2006 के फैसले के बारे में बात करते हैं. इस मामले की सुनवाई करने वाली सर्वोच्च अदालत की पांच जजों की बेंच ने दो काम किए. जजों की बेंच की तरफ से पहला काम यह किया गया- सुप्रीम कोर्ट के पहले के निर्णयों के मद्देनजर उसने व्यवस्था दी कि प्रमोशन में आरक्षण की सुविधा मुहैया कराने से जुड़े तीन संशोधन और इससे संबंधित वरिष्ठता के मामले वैध हैं. साथ ही, सर्वोच्च अदालत ने प्रमोशन में आरक्षण की सुविधा मुहैया कराते वक्त कुछ शर्तों का पालन करने के भी निर्देश दिए.

2006 के फैसले में अदालत ने सख्त शर्तें भी लागू की थीं

पहला, अदालत ने कहा कि प्रमोशन में आरक्षण का प्रावधान करने से पहले संबंधित सरकार को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदाय से जुड़े लोगों के पिछड़ेपन को लेकर आंकड़े इकट्ठा करने होंगे. दूसरा, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार को निश्चित तौर पर अलग-अलग स्तरों पर प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं होने संबंधी आंकड़े भी जरूरी तौर पर मुहैया कराने चाहिए. इसके अलावा, सर्वोच्च अदालत का यह भी कहना था कि सरकार प्रमोशन में आरक्षण के संदर्भ में प्रशासनिक दक्षता के बारे में भी तथ्य मुहैया कराए.

Supreme Court Caricature

दूसरे शब्दों में कहें तो सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में 'नागराज केस' में सैद्धांतिक तौर पर प्रमोशन में आरक्षण को हरी झंडी दे दी थी. हालांकि, अदालत ने इस तरह के आरक्षण का नियम लागू करने के लिए सख्त शर्तें तय कर दी थीं. इससे सरकारों के लिए इसे लागू करने का मामला जटिल हो गया था और उन्हें इस सिलसिले में परेशानी का सामना करना पड़ रहा था.

बहरहाल, हालिया फैसले के तहत इस मामले को सात जजों की संवैधानिक बेंच को सौंपने की मांग से जुड़ी कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए 2018 की बेंच ने इस तरह की मांग को खारिज कर दिया. हालांकि, सर्वोच्च अदालत ने इस सिलसिले में कुछ टिप्पणियां भी कीं, जो इस मुकदमे का स्वरूप बदल देती हैं. पहला, अदालत ने हालिया फैसले में उस शर्त को अस्वीकार कर दिया, जिसमें पहले दिए गए फैसले में आरक्षण की प्रक्रिया पर आगे बढ़ने से पहले सरकार द्वारा जरूरी तौर पर इन समुदायों के पिछड़ेपन से जुड़े आंकड़े इकट्ठा करने की बात कही गई थी.

दूसरा, सुप्रीम कोर्ट ने जून में जारी किए गए निर्देशों की तर्ज पर ही फैसला सुनाया. अदालत ने उस वक्त सरकार से कहा था कि इस मामले में आखिरी फैसला नहीं आ जाने तक वह पुराने फैसले के आधार पर प्रमोशन में आरक्षण के सिलसिले में आगे बढ़ सकती है. अदालत के मुताबिक, 2006 का फैसला अन्य संदर्भों में भी प्रासंगिक है. इसका मतलब यह है कि कानून के मुताबिक आरक्षण की व्यवस्था की जा सकती है और इस मामले में कानून से आशय 2006 के फैसले में इस संबंध में दिए गए निर्देश से है.

सर्वोच्च अदालत ने दो अन्य शर्तों का जिक्र किया, जो अपर्याप्त प्रतिनिधित्व के बारे में सरकार को तथ्य मुहैया कराने और प्रशासनिक दक्षता पर असर जैसे मामलों से संबंधित हैं. हालांकि, अदालत ने इन शर्तों के सिलसिले में किसी तरह का फैसला या निर्देश नहीं जारी किया है. बहरहाल, ये शर्तें अदालत के उस निर्देश के दायरे में ही शामिल हैं, जिसमें कहा गया है कि मौजूदा नियमों के अनुसार प्रमोशन में आरक्षण मुहैया कराया जा सकता है.

इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने केंद्र सरकार की अनुपात या हिस्सेदारी संबंधी दलील से भी पूरी तरह असहमति जताई. इस दलील के जरिए केंद्र सरकार का कहना था कि अपर्याप्त प्रतिनिधित्व का आकलन कुल आबादी में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की हिस्सेदारी के आधार पर होना चाहिए.

पिछड़ेपन को लेकर सरकार को डेटा इकट्ठा करने की जरूरत नहीं

ऐसा लगता है कि फैसले के इस हिस्से का मतलब यह है कि पिछड़ेपन को लेकर आंकड़े (डेटा) इकट्ठा करने की जरूरत नहीं है. अदालत के फैसले में इस जगह पर अस्पष्टता के संकेत मिलते हैं. दरअसल, सर्वोच्च अदालत की तरफ से दो शर्तों के मामले में खास संदर्भ में गाइडलाइंस नहीं जारी की गई है. हालांकि, कुल मिलाकर फैसले के मायने कुछ इस तरह जान पड़ते हैं: सरकार पिछड़ेपन से जुड़े आंकड़ों को पेश किए बिना प्रमोशन में आरक्षण की नीति पर आगे बढ़ सकती है. साथ ही, इसके बाद वरिष्ठता के बारे में भी तय कर सकती है. हालांकि, उसे अपर्याप्त प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक दक्षता के सिलसिले में तथ्यात्मक स्थिति के बारे में बताना ही पड़ेगा.

इसके अलावा, कुछ खबरों में यह भी संकेत दिए गए हैं कि न तो 2006 के निर्णय और न ही बीते बुधवार (26 सितंबर 2018) को आए फैसले में केंद्र सरकार के लिए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदाय की खातिर प्रमोशन में आरक्षण से जुड़ी समग्र नीति को लागू करना वास्तव में जरूरी किया गया है. हालांकि, दोनों में से किसी भी मामले में संबंधित बेंच से इस सिलसिले में किसी तरह का आह्वान भी नहीं किया गया या न ही इस तरह की मांग की गई. बहरहाल, इस तरह की चीजें ज्यादा प्रासंगिक नहीं हैं और इस पूरे मामले में फोकस मुख्य पहलुओं पर होना चाहिए.

फैसले को हार-जीत की तरह देखना उचित नहीं

दरअसल, इस तरह की परिस्थतियों में अक्सर हम जीतने वाले पक्ष और हारने वाले पक्ष की तलाश करने का प्रलोभन बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं और मामले को हार-जीत के नजरिए से देखने का प्रयास किया जाता है. हालांकि, जब मुकाबला दो सिद्धातों-विचारों के बीच है, तो मामले को इस तरह के नजरिए से देखने का कोई मतलब नहीं रह जाता है. जाहिर तौर पर इस मामले में बहस संवैधानिकता और सामाजिक न्याय को बढ़ाना देने के बीच है. लिहाजा, कुछ तर्कों के साथ यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि फैसले में कुछ बुनियादी न्यायिक सिद्धांतों का सम्मान किया गया है.

The Supreme Court of India in New Delhi on Sept 1, 2014. The government Monday told the Supreme Court that they stood by its verdict holding allocation of coal blocks since 1993 as illegal, and was ready to auction these blocks if they are cancelled but s

साथ ही, अदालत ने पिछड़ेपन की वास्तविक स्थिति के बारे में अपडेट स्टेटस रिपोर्ट मुहैया कराने की जरूरत से सरकार को मुक्त कर प्रमोशन में आरक्षण की नीति को और सुगम बनाया है. जाहिर तौर पर इस तरह के आंकड़ों में अक्सर बदलाव होता रहता है. माना जा रहा है कि इस मामले को अदालत की बड़ी बेंच को सौंपने से इनकार करना बेहद अहम मामला है. अदालत के इस निर्णय को सबसे अहम न्यायिक सिद्धांत से भी जोड़कर देखा जा रहा है.

अब इस मामले की जिम्मेदारी कार्यपालिका के कंधों पर है. न्यायपालिका पर अक्सर गैर-जरूरी 'सक्रियता' के आरोप लगते रहते हैं. खास तौर पर हाल के वर्षों में इस तरह की काफी बातें सामने आई हैं. यहां तक कि न्यायपालिका पर लोकतांत्रिक व्यवस्था के दो अन्य स्तंभों- विधायिका और कार्यपालिका के क्षेत्र में अतिक्रमण करने के भी आरोप लगे हैं.

बहरहाल, यह स्पष्ट जान पड़ता है कि अदालत ने इस मामले में संयम का प्रदर्शन करते हुए कार्यपालिका के पास बहानेबाजी के लिए किसी तरह की गुंजाइश नहीं छोड़ी है. इस मामले में एक स्थिर नीति बनाने और इसे लागू करने में सफलता या असफलता ही कार्यपालिका (केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर) से संबंधित प्रतिनिधियों-कर्मियों के लिए यश या अपयश का मार्ग प्रशस्त करेगी. अनुसूचित जाति और जनजाति अत्याचार रोकथाम कानून को 'कमजोर' किए जाने के मुद्दे पर केंद्र सरकार पहले ही काफी हमले झेल रही है.

ऐसे में कार्यपालिका खास तौर पर केंद्र सरकार को इस मामले में सुसंगत और सक्रिय नीति तैयार करनी होगी. न्यायिक प्रक्रिया ने रास्ता साफ कर दिया है और चुनावों की उल्टी गिनती भी जल्द शुरू होने वाली है. इन परिस्थितियों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि निश्चित तौर पर अनुसूचित जाति और जनजाति समुदाय के लोग इस मुद्दे पर दबाव बनाने की हरमुमकिन कोशिश करेंगे.

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