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सरकारी नौकरियों के प्रमोशन में आरक्षण बहाली दलितों को मोदी सरकार के करीब ला पाएगा?

कोर्ट का ये फैसला एससी-एसटी समुदाय के लिए अच्छा तो है ही मोदी सरकार के लिए भी राहत भरा है

Updated On: Jun 08, 2018 12:26 PM IST

Vivek Anand Vivek Anand
सीनियर न्यूज एडिटर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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सरकारी नौकरियों के प्रमोशन में आरक्षण बहाली दलितों को मोदी सरकार के करीब ला पाएगा?

आरक्षण को लेकर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला आया. सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी नौकरियों के प्रमोशन में आरक्षण पर लगी रोक को हटा ली. सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि इस मामले में लार्जर बेंच का फैसला आने तक सरकार प्रमोशन में आरक्षण की सुविधा जारी रख सकती है.

फैसले के बाद अब सरकार सरकारी नौकरियों में एससी/एसटी समुदाय को प्रमोशन में आरक्षण की सुविधा बहाल कर सकती है. कोर्ट का ये फैसला एससी/एसटी समुदाय के लिए अच्छा तो है ही मोदी सरकार के लिए भी राहत भरा है. केंद्र पर ये आरोप लगते रहे हैं कि सरकार आरक्षण को खत्म करने की कोशिश में लगी हुई है. ऐसे में इस फैसले के जरिए सरकार एससी/एसटी और पिछड़ों के बीच छवि सुधारने के प्रयास कर सकती है. और इस तरह की कोशिश शुरू भी हो गई है.

प्रमोशन में कोटा बहाली का फैसला आने के बाद सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलौत ने कहा कि

प्रमोशन में रिजर्वेशन का रास्ता खुल गया है. हालांकि अभी ये अंतरिम आदेश है और सर्वोच्च अदालत की संवैधानिक पीठ के फैसले का इंतजार है. फिर भी सरकार इसे तुरंत अमल में लाएगी. सरकारी नौकरियों के प्रमोशन में एससी एसटी समुदाय को रिजर्वेशन दिया जाएगा. इतना ही नहीं इस संबंध में 1997 के बाद प्रमोशन में आरक्षण वाले जो मामले रद्द हुए हैं, सरकार उन मामलों में भी आरक्षण का फायदा दिलवाएगी.

सरकार का पूरा जोर अब इस फैसले के जरिए दलितों और पिछड़ों के बीच अच्छे संदेश पहुंचाने का है. दलित उत्पीड़न की बढ़ती घटनाओं, एससी-एसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट के फेरबदल और उसके बाद 2 अप्रैल को हुए दलित आंदोलन में प्रशासन की कार्रवाई को लेकर एससी-एसटी समाज पहले से ही नाराज है. दलितों की नाराजगी का असर हाल में हुए उपचुनावों के नतीजों से भी समझा जा सकता है. 2019 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए बीजेपी की कोशिश होगी कि उनकी नाराजगी को खत्म किया जाए.

क्या सरकार दलित हित के मुद्दों पर फिक्रमंद है?

Narendra Modi at Delhi End TB summit

थावरचंद गहलौत इसी कड़ी में कहते हैं कि उन्हें उम्मीद है कि सर्वोच्च अदालत इसी तरह का फैसला एससी/एसटी एक्ट में भी सुनाएगी. इस एक्ट में फेरबदल को लेकर केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पीटिशन दाखिल कर चुकी है. लेकिन सर्वोच्च अदालत ने सुनवाई जुलाई तक के लिए टाल दी है.

हालांकि सरकार की इस सफाई कि हमने तो रिव्यू पीटिशन दाखिल कर दिया पर सवाल किया जाता है कि अगर सरकार एससी/एसटी के अधिकारों के लिए फिक्रमंद दिखना चाहती है तो फिर संसद में अध्यादेश लेकर क्यों नहीं आती? यहीं पर सरकार की नीयत पर संदेह खड़ा होता है.

यही सवाल जेएनयू के प्रोफेसर और दलित मामलों के जानकार गंगा सहाय मीणा भी उठाते हैं. वो कहते हैं कि आरक्षण पर कोर्ट के फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए. लेकिन वो ये भी जोड़ते हैं कि माननीय सुप्रीम कोर्ट से ये भी अपेक्षा की जाती है कि जब तक बेंच का फैसला नहीं आ जाता तब तक इसी तरह से एससी/एसटी एक्ट में फेरबदल और विश्वविद्यालयों में रोस्टर के आधार पर आरक्षण देने के प्रावधान को भी बदले.

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एससी/एसटी एक्ट को भी पुरानी स्थिति में रखा जाए. उनका कहना है कि सरकार ने जैसे इस मामले में पीटिशन दाखिल करके अपनी मंशा जाहिर की है कि प्रमोशन में आरक्षण की व्यवस्था अपने मूल रूप में रहे, ठीक उसी तरह से वो एससी/एसटी एक्ट और रोस्टर के मामले में भी याचिका दाखिल करके एक्ट के मूल रूप में रहने देने की व्यवस्था करे. अगर ऐसा नहीं होता है तो सरकार की मंशा पर संदेह तो होगा.

प्रमोशन में कोटा को एक बार फिर से लागू करवाने का श्रेय बीजेपी लेने की कोशिश करेगी. लेकिन एससी एसटी/एक्ट में फेरबदल और विश्वविद्यालयों में रोस्टर सिस्टम लागू करने की वजह से उन्हें कटघरे में खड़ा किया जाता रहेगा. सवाल ये खड़ा होगा कि अगर सरकार इस फैसले का श्रेय लेगी. तो बाकी के दो मामलों में सरकार क्या करेगी? क्या वो इसकी जिम्मेदारी लेगी कि एससी/एसटी एक्ट के फेरबदल में सरकार की सहमति है या रोस्टर वाले मामले में सरकार के निर्देश पर सबकुछ हुआ है.

सरकार के रवैये पर क्या सोचते हैं दलित?

कोर्ट के एकाध फैसले और सरकार के कुछ कदमों से दलित समुदाय संतुष्ट नहीं दिखता. दलितों की शिकायत है कि सरकार की मंशा नहीं है कि आरक्षण की व्यवस्था अपने मूल रूप में जारी रहे. लेकिन सरकार इसे सीधे-सीधे खत्म नहीं करना चाहती.

इसलिए बैकडोर से चीजों को खत्म करने की कोशिश की जाती है. जमीनी स्तर पर जाकर दलित समुदाय से बात करें तो एससी/एसटी एक्ट में फेरबदल को भी वो सरकार की सहमति से उठाया गया कदम मानते हैं, जबकि ऐसा सुप्रीम कोर्ट के फैसले की वजह से हुआ है.

प्रमोशन में कोटा बहाल होने के फैसले से दलितों के बीच एक संदेश तो जाएगा कि उनके लिए सरकार कुछ कर रही है. दलित मसलों के जानकार गंगा सहाय मीणा कहते हैं कि बीजेपी कोर्ट के इस फैसले का फायदा उठाने की कोशिश करेगी. दलित समुदाय के भीतर इसे प्रचारित किया जाएगा. राजस्थान मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में चुनाव होने वाले हैं.

बीजेपी विरोधी पार्टियों के गठबंधन की बात चल रही है. ऐसे में दलित राजनीति करने वाली पार्टियों के विपक्ष के साथ गठजोड़ से पैदा हुए विरोध की लहर को बीजेपी को मैनेज तो करना ही होगा. इसलिए हो सकता है कि एससी/एसटी एक्ट को लेकर सरकार अध्यादेश भी लेकर आ जाए.

प्रमोशन में आरक्षण को लेकर कोर्ट केसों की भरमार

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हालांकि ये बात भी समझने की जरूरत है कि प्रमोशन में कोटा का मामला कोई मोदी सरकार के राज में नहीं लटका था. सबसे पहले 1955 से सरकारी नौकरियों के प्रमोशन में कोटा की सुविधा प्रदान की गई थी. लेकिन 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार दे दिया. 1995 में संविधान संशोधन के जरिए इसे फिर से लागू किया गया.

नए कानून को 2006 में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. सुप्रीम कोर्ट का विचार था कि प्रमोशन में कोटा लागू करने से पहले राज्य सरकारों को पिछड़ेपन, सरकारी नौकरियों में खास समुदाय के प्रतिनिधित्व में असमानता और उनकी कार्यक्षमता साबित करनी होगी. जबकि ऐसी किसी पॉलिसी को इस तरह से साबित करना आसान नहीं है.

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2011 से लगातार कई राज्यों के हाईकोर्ट ने प्रमोशन में आरक्षण के खिलाफ फैसले दिए हैं. पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के प्रमोशन में कोटा की सुविधा खत्म कर दी. इसी आधार पर कई दूसरे हाईकोर्ट ने भी फैसले सुनाए. अगस्त 2017 में दिल्ली हाईकोर्ट ने 1997 के केंद्र सरकार के ऑफिस मेमोरेंडम को खत्म कर दिया. इसमें प्रमोशन में कोटा का प्रावधान था. साथ ही पिछले 20 वर्षों में दिए गए प्रमोशन में आरक्षण के मामलों को एक किनारे रख दिया.

11 मार्च 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा था कि कोई भी सरकारी कर्मचारी अपनी नौकरी के प्रमोशन में आरक्षण की मांग नहीं कर सकता. ये फैसला एक याचिका की सुनवाई के दौरान आया था, जिसमें याचिकाकर्ता ने यूपी सरकार को ये आदेश देने की अपील की थी कि उसे प्रमोशन में आरक्षण की सुविधा दी जाए. जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस प्रफ्फुल सी. पंत की बेंच ने कहा था कि कोई भी सरकार नौकरियों में प्रमोशन की कोई पॉलिसी संवैधानिक तरीके से नहीं बना सकती.

सात साल से ये मामला लटका था. बेंच का फैसला आना बाकी है. लेकिन फैसले के आने तक प्रमोशन में आरक्षण को बहाल करने का निर्देश देकर एससी एसटी समुदाय को राहत तो दी गई है. लेकिन कोई जरूरी नहीं कि ये प्रभावी तौर पर लागू हो ही जाए. जैसा कि इस मामले का इतिहास रहा है, इसके विरोध में फिर कोई याचिका दाखिल होने से मामला फिर से अटक भी सकता है.

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