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व्यंग्य: हरिश्चन्द्र के जैविक पुत्रों के बीच विरासत की जंग

जेडीयू नेता शिवानन्द तिवारी, लालू-नीतीश के बनते बिगड़ते रिश्तों में 'हरिश्चन्द्र' को लेकर आ गए हैं

Shivaji Rai Updated On: Jul 13, 2017 12:00 PM IST

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व्यंग्य: हरिश्चन्द्र के जैविक पुत्रों के बीच विरासत की जंग

महाराजा हरिश्चन्द्र ने कितने जैविक पुत्रों को अपना नाम दिया, इसका ठीक-ठीक आंकड़ा सरकारी दस्तावेजों में भी उपलब्ध नहीं है. गाहे-बगाहे खुद को पुत्र स्थापित करने के दावे होते रहे हैं. फिलहाल बिहार की महागठबंधन की सरकार में हरिश्चन्द्र की औलाद होने के दावे भी हो रहे हैं और इनकी पहचान सुनिश्चित करने की मांग भी पुरजोर तरीके से उठ रही है.

नीतीश गौतम बुद्ध की धरती पर बुद्ध बने हुए हैं

कुछ लोग पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव के बेटे तेजस्वी यादव को हरिश्चन्द्र की संतति बता रहे हैं. तो कुछ सुशासन बाबू यानी नीतीश कुमार को जन्मजात जैविक दावेदार घोषित कर रहे हैं. अपने अपने नामी-बेनामी दावों और नेताओं को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है. जेडीयू नेता शिवानन्द तिवारी ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से ही सफाई मांगी है कि अपने अगल-बगल बैठने वालों के बारे में स्पष्ट करें कि वो हरिश्चन्द्र की औलाद हैं या नहीं?.

फिलहाल नीतीश गौतम बुद्ध की धरती पर बुद्ध बने हुए हैं. मौन हैं फिर भी शिवानन्द तिवारी को समझना चाहिए कि राजनीति में कुछ बातें होती हैं जो बताई नहीं जाती. सिर्फ विवेक के आधार पर महसूस की जाती हैं. वैसे भी किसी नेता की सत्यवादिता पर शक करना सत्य और ईमानदारी पर शक करने जैसा है. क्योंकि नेता की सत्य और ईमानदारी की अपनी ही परिभाषा होती है. जो समय, काल और हालात के मुताबिक रंग रूप बदलती रहती है. लेकिन परिभाषा बदलने का मतलब यह नहीं कि नेता बदल गया. नेता तात्कालीन परिभाषा के अनुसार सत्यवादी और ईमानदार था और चिरकाल तक रहेगा. सो सवाल उठाना नैतिक नहीं.

तुलसीदास जी भी कहते हैं कि 'सठ सुधरहिं सत संगति पाई, पारस परस कुधात सुहाई'. मतलब संगति में आकर दुष्ट सज्जन और पारस के संपर्क से लोहा सोना हो जाता है...फिर सुशासन बाबू के संपर्क में रहने वाले लोगों की ईमानदारी पर शक करना किसी लिहाज से उचित नहीं होगा. महाभारत काल का भी उदाहरण लें तो, धृतराष्ट्र की नीयत पर भले ही शक हो उनकी ईमानदारी पर किसी को शक नहीं होगा. धृतराष्ट्र ने पुत्र और पद के मोह में भ्रष्टाचार को अनदेखा किया, लेकिन खुद कीचड़ में पांव नहीं डाले. नीतीश जी भी आंख मुदे और मौन साधे हैं पर खुद के पांव 'बरसाती जूते' में डाले हुए हैं.

Bihar govt cabinet meet

भारतीय समाज में ईमानदार होना जोखिम का काम है

पुरखे भी कहते रहे हैं कि गठबंधन में ईमानदारी से उपजी नैतिकता स्वादहीन होती है. न सहयोगियों में सार्थक भय पैदा करती है और ना ही खुद के प्रति आदर का भाव विकसित कर पाती है. ज्यादातर मामलों में दोहरेपन का शिकार हो जाती है. व्यक्तिगत ईमानदारी का प्रभाव ना कहीं दीखता है और ना ही इसका कोई राज्यनुकुल परिणाम मिलता है.

ज्यादातर मामलों में प्रतिकूलता ही दिखती है. वैसे भी देखा जाए तो भारतीय समाज में सौ फीसदी ईमानदार होना और आंखें खोलकर चलना जोखिम का काम है. इसमें टूटने का खतरा होता है. इसके उलट लचीला होना बौद्धिकता और समझदारी का पर्याय है.

राजनीति के कैलेंडर के हिसाब से बिहार में फिलहाल पहली बारिश के साथ ही एकदूसरे पर कीचड़ उछालने का मौसम चल रहा है. कोई मौन साधे दांव चल रहा है तो कोई बयानों से बखिया उधेड़ने में लगा है. लीलाधर का महागठबंधन के नेताओं से कहना है कि आप की ईमानदारी अगर जनहितैषी अपेक्षित परिणाम देने में सहायक नहीं हो रही है तो कृपया हरिश्चन्द्र के संतति का दावा छोड़कर भ्रष्ट हो जाइए. कम से कम मौसेरे भाई का रिश्ता कायम तो रहेगा!

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