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व्यंग्य: लालू को आम तराजू से मत तौलिये हुजूर

जांच एजेंसियां 'खैरा पीपल' लालू यादव के ठौर-ठिकानों पर छापेमारी कर अपनी मिट्टी पलीद करा रही रही हैं

Shivaji Rai Updated On: May 29, 2017 07:27 PM IST

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व्यंग्य: लालू को आम तराजू से मत तौलिये हुजूर

अर्थशास्‍त्रियों की इसे अदूरदर्शिता ही कहेंगे कि वे राजनीति को उद्योग की श्रेणी से अलग मानते हैं. जबकि राजनीति के क्षेत्र में वैश्किव मंदी में भी दिन दूनी, रात चौगुनी बरकत होती रहती है.

महंगाई के दौर में भी नामी और बेनामी स्रोतों से धनवर्षा होती रहती है. सबसे ज्‍यादा तरस तो देश की आर्थिक जांच एजेंसियों की सोच पर आता है, जो राजनेताओं को भी आम आदमी वाले तराजू से तौलती हैं, जबकि अर्थशास्‍त्र का आम गणितीय नियम देश के राजनेताओं पर लागू नहीं होता.

यह हास्‍यास्‍पद ही तो है कि जांच एजेंसियां लालू यादव के घरवालों और रिश्‍तेदारों की आय का स्रोत ढूंढ रही हैं और मूर्खतापूर्ण सवाल उछाल रही हैं कि इतनी जल्‍दी अरबपति कैसे बन गए? किसी पर आय से अधिक संपत्ति और बेनामी संपत्ति का आरोप लगा रही हैं तो किसी को मिट्टी घोटाले से जोड़ रही हैं.

जांच एजेंसियां 'खैरा पीपल' लालू यादव के ठौर-ठिकानों पर छापेमारी कर अपनी मिट्टी पलीद करा रही रही हैं. सियासत की तासीर से अंजान जांच अधिकारियों को यह समझ नहीं कि वंशवाद और परिवारवाद सत्‍ता का संस्‍कार रहा है. उसका पालन-पोषण और उसकी समृद्ध‍ि का ध्‍यान रखना उसका परम कर्तव्‍य है. उस लिहाज से देखा जाए तो न कुछ बेनामी होता है और न कुछ आय से अधिक.

चुनाव खर्च का ब्याज भी तो वसूलना होता है

People wave towards a helicopter carrying Hindu nationalist Modi  after an election campaign rally at Mathura

साधारण नजरिए से भी देखें तो, जितना खर्च चुनाव जीतने के लिए किया गया होता है- यानी की 'इनवेस्‍ट मनी' उसकी ब्‍याज वसूली के मद्देनजर आय से अधिक संपत्ति का मामला प्रथमदृष्‍टया ही खारिज हो जाता है.

वैसे भी कोई नेता जीवन में सिर्फ एकबार चुनाव नहीं लड़ता. उसे अगला और पिछले चुनाव का हिसाब बराबर करने के लिए नामित से अधिक आय के बेनामी स्रोतों की जरूरत पड़ती है.

खर्च का जरिया भी एक नहीं होता हैं. गुंडों और किराए पर जिंदाबाद बोलने वालों की फौज रखनी होती है. रैली, हड़ताल, धरना-प्रदर्शन के भीड़ खींचू नाटक करने होते हैं. इन सभी खर्चों का दारोमदार अज्ञात स्रोतों पर ही होता है. फिर आय से अधिक और बेनामी संपत्ति का मामला कहां बनता है?

राजनीति में 'अकेले ही चला था जानिबे मंजिल मगर, लोग साथ आते गए कारवां बनता गया' का जुमला सबसे अधिक प्रभावी रहा है. तो इसके पीछे का निहितार्थ भी समझना जरूरी है कि कारवां बढ़ेगा, तो कुनबा भी बढ़ेगा. कारवां और कुनबे ने सत्‍ता की कुर्सी दिला दी तो घर के गुल्‍लक का कुबेर के खजाने में तब्‍दील होना तो स्‍वाभाविक है.

अर्थशास्‍त्र भी कहता है कि पैसा पैसे को खींचता है और दूसरा भाग्‍य विधाता राष्‍ट्र में भाग्‍य भी तो कोई चीज होती है. फिर किसी के भाग्‍य पर सवाल उठाना किसी भी लिहाज से जायज नहीं हैं. गांवों में कहावत है कि 'भाग्‍यवाले का खेत भूत जोतता है'.

उसका आशय यही है कि भाग्‍यवाले के घर अज्ञात स्रोत से भी धन-वैभव आता है. कुछ वैसा ही भाग्‍य लालू यादव के घरवालों और रिश्‍तेदारों का है जिनके पैसे में इतनी चुम्‍बकत्‍व शक्ति थी कि देखते ही देखते अरबपति हो गए. इसमें कोई हैरानी की बात नहीं.

राजनीतिक दल को दिया गया गुप्‍त दान कभी व्‍यर्थ नहीं जाता

पूरा उद्योग जगत इस बात पर सहमत है कि राजनेता और राजनीतिक दल को दिया गया गुप्‍त दान कभी व्‍यर्थ नहीं जाता. वह किसी न किसी रास्‍ते लाभ जरूर पहुंचाता है. इसीलिए गुप्‍तदान में कभी कमी नहीं आती है.

लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं कि दान के लिए मशक्‍कत नहीं करनी पड़ती है. विक्रमादित्‍य के बेताल की तरह जनता हमेशा सिर पर चढ़ी रहती है. मीडिया मुश्किल और उलझाऊ सवालों का जवाब मांगती रहती है. नामुमकिन वादे को भी निभाने का वचन देना पड़ता है.

राजेनता की कंपनियों को फर्जी या कागजी कहना भी गलत होगा. आम आंखों से इन कंपनियों का उत्‍पाद भले न दिखता हो. लेकिन इन्‍हीं कंपनियों के जरिए लोकतंत्र का तंत्र बिगाड़ा जाता है. संविधान को ठेंगा दिखाया जाता है. कानून को नजरबंद किया जाता है. ये कंपनियां विरोधी ध्रुवों को मिलाती हैं, दुश्‍मनों को दोस्‍त बनाती हैं. यह कहें तो ज्‍यादा सटीक होगा कि एक नागरिक से अधिक फर्ज निभाती हैं.

फिर इन्‍हें फर्जी और कागजी कहना किसी भी लि‍हाज से ठीक नहीं है. शायद ही कोई राजनेता होगा जिसे अंदाजा होगा कि आगे चलकर कितना कमाएंगे. आमदनी तो कुर्सी और पद पर निर्भर होती है.

राजनेताओं को पूर्वानुमान होता तो निश्चित ही अपनी संपत्ति बढ़ाकर घोषित करते. इन सबके बावूजद बेनामी संपत्ति को अपराध की श्रेणी में रखना ठीक नहीं है. बेनामी संपत्ति के कई फायदे हैं. बेनामी संपत्ति सियासत में कद बढ़ाती है. चंदे पर निर्भरता को खत्‍म करती है, आत्‍मनिर्भरता बढ़ती है. अवधू गुरु का कहना है कि लालू के रिश्‍तेदारों के फंड पर जांच का आम फंडा न अपना जाए. न उनकी फंडिंग पर सवाल उठाया जाए. जनवादी नेता के फ्यूचर का कुछ तो लिहाज रखा जाए.

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