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जितने मुंह, उतने 'जीएसटी': गब्बर सिंह टैक्स से लेकर ग्रेट सेल्फिश टैक्स तक...

आज का यक्ष प्रश्न है जीएसटी क्या है? सवाल इतना पेचीदा है कि युधिष्ठिर होते तो वो भी चकरा जाते कि क्या जवाब दें

Updated On: Nov 07, 2017 08:48 PM IST

Vivek Anand Vivek Anand
सीनियर न्यूज एडिटर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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जितने मुंह, उतने 'जीएसटी': गब्बर सिंह टैक्स से लेकर ग्रेट सेल्फिश टैक्स तक...

आज का यक्ष प्रश्न है जीएसटी क्या है? सवाल इतना पेचीदा है कि युधिष्ठिर होते तो वो भी चकरा जाते कि क्या जवाब दें. यक्ष से गुजारिश करते कि कोई लाइफलाइन ही दे दो भाई! कहीं तो पढ़ा है लेकिन थोड़ा कंफ्यूज हूं. मुझे लग रहा है कि शायद गब्बर सिंह टैक्स होगा.

पिछले दिनों अखबारों में पढ़ा तो था. लेकिन कॉन्फिडेंट नहीं हूं. फोन-ओ-फ्रेंड मिल जाता तो किसी जानकार से पूछ लेता. कहीं न कहीं टैक्स से जुड़ा मसला तो है. हां! जीएसटी मतलब ग्रेट सेल्फिश टैक्स हो शायद. ऑडियन्स पोल क्या लें. 125 करोड़ की ऑडियन्स तो खुद ही कंफ्यूज है.

वैसे हमारे पीएम ने भी तो कुछ कहा था. इतना तो याद है कि संसद के दरवाजे आधी रात को खुलवाकर पीएम ने आजाद भारत में दूसरा जबर ऐलान किया था. भारीभरकम चकाचौंध के बीच कुछ बताया तो था कि इससे जाने क्या बदल जाएगा... ये हो जाएगा, वो हो जाएगा. बोला तो था, जीएसटी मतलब गुड एंड सिंपल टैक्स. दिमाग का दही हो रिया है भाई. जीएसटी के मतलब इतने हैं कि क्या जवाब दिया जाए. जितने मुंह उतने जीएसटी.

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सवाल इतना टेढ़ा है कि इसे केबीसी वाले भी नहीं पूछते. कैसे पूछें. पीएम मोदी कहते हैं कि ये गुड एंड सिंपल टैक्स है. राहुल गांधी कहते हैं कि नहीं.. ये तो गब्बर सिंह टैक्स है. अब बंगाल की अपनी ममता दीदी कह रही हैं कि ये सब छोड़िए. ये अहंकारी लोगों का थोपा हुआ ग्रेट सेल्फिश टैक्स है.

अब किसकी बात मानी जाए. प्रधानसेवक की बात को तवज्जो देना ठीक है. लेकिन ये राहुल गांधी और ममता दीदी भी तो कम नहीं है. इनकी बातों को कैसे वजन न दें. लोकतंत्र में विपक्ष की आवाज को अनसुना करना भी तो ठीक नहीं.

नोट बैन

नोटबंदी के एक साल पूरा होने के मौके पर भी नोटबंदी के साथ जीएसटी को याद किया जा रहा है. सालगिरह है नोटबंदी की और जलवे बटोर रहा है जीएसटी. सरकार कहती है कि जीएसटी आजाद भारत का सबसे बड़ा टैक्स रिफॉर्म है, विपक्ष कहता है जीएसटी टैक्स टेररिज्म है. सरकार कहती है इससे अर्थव्यवस्था में चुस्ती आएगी. विपक्ष कहता है अर्थव्यवस्था तो चरमरा गई है, नोटबंदी और जीएसटी की दोहरी मार से उबरने में देश को वर्षों लग जाएंगे.

सरकार कहती है कि हमने टैक्स देने वालों का दायरा बढ़ा दिया है, सरकार के खजाने में अब ज्यादा पैसे आएंगे. पैसे आएंगे तो विकास होगा, पुल बनेंगे, गांवों में बिजली आएगी, सड़कें बनेंगी, फ्लाईओवर बनेगा, मेट्रो दौड़ेगी, बुलेट ट्रेन आएगी, स्मार्ट शहर बसेंगे. विपक्ष कहता है जीएसटी एक जुमला है. इसके चलते नौकरियां जा रही हैं, छोटे-मोटे कारोबारियों की हालत खस्ता है, अपने कारोबारियों को चोट पहुंचाकर हम चीन को फायदा पहुंचा रहे हैं, आयात बढ़ता ही जा रहा है.

अब आप खुद दिमाग की बत्ती जलाइए और अपनी सुविधा के मुताबिक सरकार या विपक्ष के पलड़े में से एक को चुन लीजिए. पर इतना जान लीजिए. जीएसटी वो बला है जिसे बड़े-बड़े अर्थशास्त्री तक समझ नहीं पा रहे हैं. एक एक्सपर्ट की बात को दूसरा काट रहा है.

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फिलहाल जीएसटी पर अपनी ममता दीदी लाल-पीली हैं. नोटबंदी के एक साल पूरा होने के मौके पर ब्लैक डे मना रही हैं. दो दिन पहले उन्होंने अपने ट्विटर अकाउंट का डीपी ब्लैक कर लिया. लिखा- 'जीएसटी ग्रेट सेल्फिश टैक्स है. ग्रेट सेल्फिश टैक्स लोगों को परेशान करने के लिए है, रोजगार छीनने के लिए है, अर्थव्यवस्था को तबाह करने के लिए है. जीएसटी पूरी तरह से फेल हो गया है.'

अपने दूसरे ट्वीट में ममता दी ने सरकार के नोटबंदी के फैसले पर विरोध जताया. लिखा, ‘नोटबंदी एक आपदा है. इसने हमारी अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया है. इस घोटाले के खिलाफ हमें ट्विटर के डीपी को काले रंग में बदल लेना चाहिए.' जो सरकार के लिए उजाले का संदेश लेकर आई है वो जीएसटी विपक्ष के लिए अंधेरा है और अंधेरा है कि कायम है.

बात-बात पर अपने राहुल गांधी भी जीएसटी पर जीभरके जुमले उछालते रहते हैं. जिनकी आलू की फैक्ट्री के किस्से को लोग रस ले-लेकर सुना करते थे, वो अब राहुल के जीएसटी के फुलफॉर्म सुनकर वाह-वाह करते हैं.

पिछले दिनों वो गुजरात चुनाव में प्रचार करने गांधीनगर गए थे. वहां कहने लगे- अजी! हमसे सुनिए जीएसटी क्या है. जीएसटी वो बला है जिसे हम लेकर आए थे. सोचा था कि सिंपल टैक्स के तौर पर लागू करेंगे. सिर्फ 18 फीसटी काटेंगे ताकि आपको अपने कटने का अहसास ना हो. लेकिन इस बीच हमारी गलतियों का फायदा मोदीजी उठा ले गए. जीएसटी को जिस अंदाज में लागू किया, उससे यह गब्बर सिंह टैक्स बन गया. मितरों हम आपको इतना नहीं काटते जितना मोदीजी काट रहे हैं.

राहुल गांधी ने कहा कि मोदीजी ने पहले नोटबंदी की कुल्हाड़ी से आपको काटा, फिर जीएसटी की कुल्हाड़ी ले आए. हमने सोचा था कि आपको धीरे से काटेंगे ये तो आपको जमकर काटे जा रहे हैं. राहुल गांधी के इस क्रूर कठोर आक्षेप पर मरहम लगाने वित्तमंत्री अरुण जेटली सामने आए. आते ही कहने लगे- किस बच्चे की बात को आप दिल से लगा रहे हैं. वो तो नासमझ हैं. आप समझिए जीएसटी से खरीददारी में ही आप सबकी भलाई है.

हालांकि इसके बाद भी जनता जीएसटी के पेच को समझ नहीं पाई. सो इसका आसान जवाब देने केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री धर्मेंद्र प्रधान सामने आए. बिल्कुल आम जनता की भाषा में उन्होंने समझाना शुरू किया. अजी! जीएसटी क्या है, जूता है जूता. जी हां आप आसान शब्दों में यूं समझिए कि जीएसटी जूता है. जैसे नया जूता भी तीन दिन काटता है, फिर आपके पांव में सेटल हो जाता है.

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तस्वीर: धर्मेंद्र प्रधान के फेसबुक से

उसी तरह आपको लग रहा है कि जीएसटी आपको काट रहा है. लेकिन ये है बस तीन दिनों की बात. उसके बाद तो मच-मच की आवाज निकालते हुए आप मजे से चल निकलेंगे. बस इंतजार कीजिए चौथे दिन का. जीएसटी नाम का जूता देश के पैरों में फिट हुआ नहीं कि देश दौड़ने लगेगा. एक पल में यहां और दूसरे पल में वहां...दे दनादन प्रगति.

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वैसे दिवाली के शुभ-लाभ वाले मौके पर हमने भी जीएसटी को समझने की कोशिश की थी. एक मिठाई के दुकानदार से पूछा कि भाईसाब बताएं कि अगर मैं आपसे एक किलो गुलाबजामुन खरीदूं तो कितना जीएसटी देना पड़ेगा. दुकानदार बोला- मामला कंडिशन अप्लाइड वाला है.

मैंने पूछा- मतलब. तो कहने लगा- एक ही गुलाबजामुन पर अलग-अलग रेट से जीएसटी लग सकता है. जैसे अगर आपको गुलाबजामुन पैक करवा के घर ले जाना है तो 5 फीसदी टैक्स लगेगा. अगर उस मिठाई पर चांदी का वर्क लग जाए तो टैक्स बढ़कर 18 फीसदी हो जाएगा. अगर आपको गुलाबजामुन यहीं बैठकर खाना है तो 12 फीसदी टैक्स लगेगा. वो भी आप किस्मत वाले हैं कि मेरे यहां एसी नहीं लगा है अगर आपने एसी रेस्टोरेंट में बैठकर गुलाबजामुन खाया तो 18 फीसदी टैक्स लगेगा.

सुनकर मेरी सांसें फूलने लगी. दुकानदार बोला- थोड़ा सब्र कीजिए. इतना ही नहीं. अगर आप गुलाबजामुन के साथ समोसा कचौड़ी खाना चाहें तो 12 फीसदी टैक्स लगेगा. और अगर कहीं चॉकलेट बरफी लेने का दिल किया तो 28 फीसदी की दर से आपकी जेब कटेगी.

इतना सब सुनकर मेरा सिर चकरा कर रह गया. फिर मैंने जीएसटी से तौबा कर ली. तबसे कटता जा रहा हूं, बिना आह निकाले...आहिस्ता...आहिस्ता...वैसे जाते-जाते जीएसटी तो नहीं समझा पाया इसका फुलफॉर्म ही जान लीजिए. तमाम जुमलेबाजियों के बीच जीएसटी मतलब- गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स.

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