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जनरल बिपिन रावत के मामले में संदीप दीक्षित गलत क्यों हैं?

पाकिस्तान और चीन जैसे दुश्मनों की तुलना में देश के भीतर ही जनरल रावत के ज्यादा विरोधी हैं

Mayank Singh Updated On: Jun 15, 2017 10:24 PM IST

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जनरल बिपिन रावत के मामले में संदीप दीक्षित गलत क्यों हैं?

सदियों से, समाजविज्ञानी लोगों में एक एक्स फैक्टर की मौजूदगी का जिक्र करते रहे हैं, जो एक खास किस्म के लोगों को उनकी तरफ आकर्षित करता है. सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत के पास लगता है वह एक्स फैक्टर है जो वाम झुकाव वाले ग्रुप और सत्ता से बाहर के राजनीतिज्ञों को उनकी तरफ खींचता है. और जो बिना रुके उन पर अक्सर निशाना साधा करते हैं.

कड़े स्वभाव के लोग जनरल रावत में ‘योद्धा' देखते हैं, तो पार्थ चटर्जी जैसे लोगों को उनमें खराब छवि वाले जनरल डायर जैसी समानता दिखती है. प्रकाश करात को जनरल रावत का स्वभाव 'अनुचित' लगता है. उनके विचार में जनरल रावत के तेवर में मोदी सरकार की झलक दिखती है जो राजनीतिक विरोध की आवाज उठा रहे कश्मीर के लोगों को सिर्फ ताकत के बल पर दबाना चाहती है.

इन बयानों से किसी को भी आश्चर्य हो सकता है कि राष्ट्रहित और लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार के विचारों का समर्थन करना है या फिर भारतीय सेना को जिसे पाकिस्तानी सेना की तरह उन निर्देशों का पालन करना है, जो व्यक्तिगत एजेंडों पर आधारित हैं. जो लोग वाम विचारधारा के अनुयायी हैं, लोकतंत्र से जुड़ी इसकी स्थापित संस्थाओं को लेकर इनकी नफरत हैरत भरी नहीं है.

कश्मीर में पाकिस्तान और उसके छद्म चेहरों का सामना

यहां चीन के अशांत जिनजियांग प्रांत में असंतोष को दबाने की चीनी कार्यशैली पर करात के विचार जानना दिलचस्प है. मुस्लिम बच्चों के कुछ निश्चित नामों पर प्रतिबंध, सार्वजनिक स्थानों पर नकाब पर बैन, मुस्लिमों की दाढ़ी की लंबाई पर अंकुश और सरकारी कर्मचारियों के लिए रमजान में रोजे रखने की मनाही वास्तव में 'मानव स्वतंत्रता’ की अलग कहानी ही कहता है. जिनजियांग में जो संकट है, वह उस समस्या की तुलना में बहुत छोटा है, जिनका भारत लगातार पाकिस्तान सरकार और उसके छद्म चेहरों के रूप में कश्मीर में सामना कर रहा है.

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संदीप दीक्षित के जनरल बिपिन रावत को 'सड़क का गुंडा' कहने से सियासी तौर पर हंगामा मच गया था

राष्ट्र और राष्ट्रवाद के मुद्दों पर वामपंथ के विचार मतदाताओं ने बड़े स्तर पर बार बार खारिज किए हैं. जबकि, किसी लोकतंत्र में, लोकप्रिय जनादेश ही लोगों की उम्मीदों का दर्पण होता है. इसके बावजूद वामपंथ की नकारात्मक आक्रामकता को क्या कहा जाए. ऐसा लगता है कि लोकप्रिय जनादेश न मिलने से संदीप दीक्षित जैसे लोगों ने शिष्टता और नैतिकता खो दी है और हताशा में जनरल रावत को ‘सड़क का गुंडा’ बता रहे हैं.

कुछ अपवादों को छोड़कर अपने राजनीतिक मतभेदों के बावजूद मुख्यधारा की राष्ट्रीय पार्टियां, कांग्रेस और बीजेपी आमतौर पर इस पर एकमत रहे हैं कि सेना प्रमुख के पद को राजनीतिक विवादों से दूर रखा जाए. सत्ता और उससे मिलने वाले प्रभाव से अलग होकर, दीक्षित जैसे शासन करने वाले लोग अपनी राजनीतिक मौजूदगी बनाए रखने के लिए नैतिकता भूल कर हताशा में चले जाते हैं, ताकि वे चर्चा में बने रहें. बाद में दीक्षित की ओर से मांगी गई माफी जन दबाव के कारण मांगी गई माफी लगती है. इसमें कहीं से भी ऐसा नहीं लगता कि उन्होंने खुद अपनी गलती महसूस कर माफी मांगी हो.

विचारों में ठोस जनरल बिपिन रावत 

राजनीति को अलग रखें, तो इस तरह के राजनेताओं और बुद्धिजीवियों की ओर से जनरल रावत पर निशाना साधने और उनकी अवमानना करने के विश्लेषण की जरूरत है. जनरल रावत के जिस बयान के लिए उन्हें ‘गुंडा’ कहा गया, वह जुलाई 2016 से पाकिस्तान के लगातार छद्म हमलों से निपटते हुए उनके सख्त तेवरों का प्रतीक है.

सच समझना इतना आसान नहीं है, जैसा कि अशांति और हिंसा के लिए भड़काने वाले लोग साजिश के तहत पत्थरबाजी की घटना को भी स्वाभाविक प्रकृति बताते हुए इसे भारतीय सुरक्षा बलों के खिलाफ डेविड और गोलिएथ की कहानी की तरह पेश करते हैं.

पत्थरबाजों को जनरल रावत की चेतावनी थी कि 'स्थानीय आबादी में जिन लोगों ने हथियार उठाए हैं, और जो स्थानीय लड़के हैं, अगर वे आतंकी गतिविधियां जारी रखते हैं, आईएसआईएस और पाकिस्तान के झंडे लहराते हैं, तो हम उन्हें राष्ट्रविरोधी तत्व के रूप में देखेंगे और उनसे उसी तरह सख्ती से निपटेंगे.'

कश्मीर घाटी में पिछले साल जुलाई के बाद से शुरू हुई पत्थरबाजी की घटना लगातार जारी है

कश्मीर घाटी में पिछले साल जुलाई के बाद से शुरू हुई पत्थरबाजी की घटना लगातार जारी है

यह बयान उस घटना के बाद आया था जिसमें मेजर सतीश दाहिया और तीन सैनिक बांदीपुरा की मुठभेड़ में शहीद हो गए थे. इन चारों को इसलिए अपनी जान देनी पड़ी क्योंकि पत्थरबाज भीड़ ने उन्हें धोखे में रख कर ऐसा जताया कि वे आतंकियों से घिर गए. इसके बाद सेना ने आतंक विरोधी अभियान चलाया तो उन्हें मुठभेड़ स्थल पर पत्थरबाजों की भीड़ से जूझना पड़ा जो अलग-अलग माध्यमों जैसे व्हाट्सएप और मस्जिदों में लगे लाउडस्पीकर्स से अपील कर के जुटे थे.

इस हाईब्रिड वार को धार्मिक रंग दे दिया गया, जो आईएसआईएस के झंडों और इस्लामिक प्रतीकों की मौजूदगी में साफ नजर आ रहा था.

कश्मीर का संघर्ष ‘कश्मीर में इस्लामी खिलाफत’ का संघर्ष

पाकिस्तान की एजेंसियों ने यह साफ कर दिया है कि 1990 की नस्ली सफाई के बाद धार्मिक रंग अब छुपा नहीं रहेगा. विश्व भर में उभरती इस्लामी शक्तियों ने पाकिस्तान को यह मौका दे दिया कि वह कश्मीरी युवकों को इस्लामी प्रतीकों का इस्तेमाल कर के उन्हें जानबूझ कर आतंक की तरफ धकेले. जाकिर मूसा, जो हिजबुल मुजाहिदीन से दूर चला गया, उसने खुलेआम स्वीकार किया है कि कश्मीर का संघर्ष ‘कश्मीर में इस्लामी खिलाफत’ का संघर्ष है.

जनरल रावत, जो 13 लाख मजबूत सेना के प्रमुख हैं, उनसे यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह राजनीतिक रूप से सही हों और वो अपने सैनिकों को हतोत्साहित होते हुए देखते रहें. साथ ही आतंकियों के अभ्यास और पत्थरबाजों के लिए वे अपनी सेना को एक साथ टारगेट बनने दें.

अपनी सेना के लिए उनकी चिंता उनके बयान में जाहिर है, 'लोग हम पर पत्थर फेंक रहे हैं. लोग हम पर पेट्रोल बम फेंक रहे हैं. अगर हमारे सैनिक मुझसे पूछते हैं कि हमें क्या करना चाहिए, तो क्या मुझे कहना चाहिए कि इंतजार करो और मर जाओ? मैं एक बढ़िया ताबूत के साथ आऊंगा जिस पर राष्ट्रीय झंडा लगा होगा और मैं तुम्हारे शव सम्मान के साथ तुम्हारे घर भेज दूंगा. एक प्रमुख के नाते क्या उनसे कहने की मुझसे यही उम्मीद है.'

ऐसे ही एक सवाल मेजर लीतुल गोगोई को लेकर है, जिनकी तारीफ भी विरोधियों के लिए जनरल रावत की आलोचना का बहाना है. सवाल यह है कि पोलिंग पार्टी को खत्म होने से बचाने के लिए गोगोई वैसी स्थिति में क्या कर सकते थे. लेकिन आलोचकों के पास इस सवाल का कोई माकूल जवाब नहीं है.

Leetul Gogoi

श्रीनगर संसदीय सीट के लिए हुए उपचुनाव के दौरान साहसिक निर्णय लेने के लिए सेना ने मेजर लीतुल गोगोई का सम्मान किया है

वास्तव में जनरल रावत के कश्मीर के वास्तविक हालात और उससे निपटने के सख्त रुख ने राजनीतिज्ञों और बुद्धिजीवियों के उन वर्गों को असहज कर दिया, जो गंभीर हालात को कमतर आंक रहे हैं और मामले को कमजोर कर रहे हैं.

देश के भीतर जनरल रावत के ज्यादा विरोधी हैं

कभी लगता है कि पाकिस्तान और चीन जैसे देशों, जिनके खिलाफ रावत हर मोर्चे पर युद्ध का संकल्प ले चुके हैं, उनकी तुलना में देश के भीतर ही जनरल रावत के ज्यादा विरोधी हैं.

इतिहास गवाह है कि 1947 में विभाजन के समय से, कश्मीर भारत-पाकिस्तान के बीच विवाद की जड़ रहा है. शायद पहले राष्ट्र प्रायोजित आतंकवाद के तौर पर, पाकिस्तान ने ट्राइबल्स की आड़ में राज्य में अपनी सेना की घुसपैठ कर के इसे बलपूर्वक हथिया लिया. भारतीय सेना के देर से ही सही, दखल के बाद ही इस पर अंतर पड़ा, जिसने पाकिस्तान की घुसपैठ से राज्य को सुरक्षित बचाया. तभी से दोनों देशों के बीच कश्मीर को लेकर तीन दफा युद्ध हो चुके हैं. पारंपरिक माध्यमों से अपने मकसद में विफल होने पर पाकिस्तान ने छद्म युद्ध शुरू कर दिया, ताकि वह सहजता से इसे ‘गैर राष्ट्रीय तत्व’ बता सके जिसे जनरल रावत ने ‘डर्टी वार’ कहा.

दीक्षित जैसे राजनीतिज्ञ जिन्होंने सत्ता के मजे लिए हैं, उन्हें समझने की जरूरत है कि भारत कश्मीर में लड़ रहा है. शुतुर्मुर्ग (ऑस्ट्रिच) की तरह आंखें मूंदने वाली उपेक्षा के बावजूद सच्चाई यह है कि देश पड़ोसी के साथ युद्ध जैसी अशांति झेल रहा है, जो अपनी मर्जी से सभी तरह के माध्यम इस्तेमाल कर रहा है, और राष्ट्र के भीतर और बाहर युद्ध की आड़ में कई मोर्चों पर हमले का सामना कर रहा है. सिर्फ कोई भोला-भाला या पाकिस्तानी ही दूसरे बहाने की कोशिश कर सकता है. हालात यह हैं कि विरोधी अब सिर्फ बाहरी सीमा पर ही नहीं, बल्कि देश के भीतर से भी निशाना साध रहे हैं.

जो लोग विश्वास न करें, वे पढ़ सकते हैं कि दिसंबर 1947 में एक बार खदेड़े जाने के बाद, पाकिस्तानी घुसपैठियों से उरी में दोबारा खतरे को देखते हुए पंडित जवाहर लाल नेहरू ने क्या कहा था. सी दासगुप्ता ने अपनी पुस्तक ‘वार एंड डिप्लोमेसी इन कश्मीर, 1947-48’ में 19 दिसंबर 1947 वाले नेहरू के कश्मीर पर नोट का हवाला दिया है.

Arun Jaitley in Kashmir

कश्मीर घाटी का दौरा करते हुए रक्षा मंत्री अरुण जेटली के साथ आर्मी चीफ जनरल बिपिन रावत (फोटो:पीटीआई)

पाकिस्तान की सरकार की प्रोत्साहना पर नियमित युद्ध

इसमें नेहरू ने कड़े शब्दों में लिखा है, 'कश्मीर राज्य में जो कुछ हो रहा है वह सिर्फ सीमावर्ती छापा नहीं, बल्कि एक नियमित युद्ध है, सीमित मात्रा में, घुसपैठियों ने आधुनिक हथियारों का इस्तेमाल किया है. यह साफ है कि पाकिस्तानी सरकार इन्हें हर तरह से प्रोत्साहित कर रही है.'

इसके बाद नेहरू आगे लिखते हैं, 'मुझे ऐसा लगता है, कि हमारा दृष्टिकोण सुरक्षात्मक और क्षमायाची जैसा है, जैसे कि हम शर्मिंदा हों कि हम क्या कर रहे हैं. हमें निश्चित रूप से यह पता न हो कि हमें कितनी दूर जाना चाहिए. मुझे क्षमा याचना जैसा कुछ नहीं दिखता और छापामारों से सुरक्षात्मक तरीके से मिलना मुझे पूरी तरह गलत लगता है. पहली चीज जो समझने की है कि कश्मीर हमारे लिए सबसे जीवंत मुद्दा है और हम इसे लेकर बेहद गंभीर हैं.'

नेहरू इसे इस तरह समाप्त करते हैं, 'क्या हम पाकिस्तान को इजाजत देंगे कि वह घुसपैठ के लिए नई सेना को ट्रेनिंग जारी रखे और उसे इस बात की इजाजत देंगे कि वह अपने क्षेत्र से इस तरह के हमलों के इस्तेमाल के लिए बेस मुहैया कराए?'

उन्होंने आगे लिखा कि 'सीधे तौर से पाकिस्तानी क्षेत्र में संवाद के उन केंद्र और पंक्ति पर हमले की जरूरत है. इसमें पाकिस्तान के साथ युद्ध का रिस्क है. हम युद्ध टालना चाहते हैं. लेकिन यह महज अपने आप को धोखा देने जैसा है कि हम यह कल्पना करते रहें कि हम बहुत दिनों तक युद्ध टाल सकते हैं जबकि दोनों तरफ इस तरह के अभियान जारी हों.'

1947 में शुरू हुई हिंसा धुंधली नहीं हुई

नेहरू ने युद्ध नहीं लड़ा बल्कि संयुक्त राष्ट्र जाकर फंस गए. यह एक अलग कहानी है जिसमें अंग्रेजों का छल और धोखेबाजी शामिल है. 1947 में शुरू हुई हिंसा किसी सूरत में धुंधली नहीं हुई.

पाकिस्तान 1947 से कश्मीर में छद्म तरीके से लगातार युद्ध करता आया है

पाकिस्तान 1947 से कश्मीर में छद्म तरीके से लगातार युद्ध करता आया है

सवाल यह है कि नेहरू जैसे राजनीतिज्ञ पाकिस्तान द्वारा संचालित हिंसा पर आक्रामक रुख के साथ प्रतिक्रिया के लिए मजबूर हुए, तो जनरल रावत से सुरक्षात्मक रवैये की अपेक्षा क्यों, जबकि समस्या 1947 से लेकर अब तक कई गुना बढ़ चुकी है.

क्या संदीप दीक्षित इसका जवाब देने का कष्ट करेंगे?

(लेखक पूर्व आर्मी ऑफिसर हैं)

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