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संभाजी भिडे: जो पीएम को सलाह देने का दावा करते हैं

भिडे पुणे के फर्ग्यूसन कॉलेज में प्रोफेसर रहे हैं. मगर उनकी पहचान इससे कहीं अलग है

FP Staff Updated On: Jan 07, 2018 04:06 PM IST

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संभाजी भिडे: जो पीएम को सलाह देने का दावा करते हैं

कोरेगांव हिंसा के बाद अगर कोई नाम रातों-रात देश भर की खबरों में उभरा है तो वो संभाजी भिडे का है. न्यूक्लियर फिज़िक्स में गोल्ड मेडल के साथ एमएससी करने वाले भिडे पुणे के फर्ग्यूसन कॉलेज में प्रोफेसर रहे हैं. 85 साल के भिडे का नाम भले ही पहली बार हिंदी पट्टी सुन रही हो लेकिन, उनका इतिहास और उनका इतिहास प्रेम बहुत पुराना है.

संभाजी भिडे का नाम मनोहर भिडे है. मनोहर की जगह खुद को संभाजी कहलवाने के कई राजनीतिक निहितार्थ हैं, संभाजी शिवाजी के बेटे का नाम है और भिडे की राजनीति का पूरा तानाबाना शिवाजी महाराज के इर्द-गिर्द बुना गया है. कई लोग भिडे को आरएसएस से जुड़ा बताते हैं. तकनीकी रूप से ऐसा नहीं है. भिडे का एक समानांतर संगठन है. मगर ज्यादातर मुद्दों पर भिडे की राय संघ जैसी ही होती है. कह सकते हैं कि भिडे संघ की विचारधारा में शिवाजी को दैवीय महानायक बनाने का पुट जोड़ देते हैं.

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हिंदुस्तान में इतिहास के किरदारों को महानायक बनाने की परंपरा है. शिवाजी को लेकर महाराष्ट्र में ये कुछ ज्यादा बड़े पैमाने पर हुआ है. शिवाजी के शासन और उनकी नीतियों की तारीफ बड़े पैमाने पर हर वर्ग करता है. हर विचारधारा के इतिहासकारों ने शिवाजी की रणनीतिक कुशलता और उनके स्थापित सिद्धांतों को माना है. मगर महाराष्ट्र के कट्टरपंथ के लिए वो इतिहास के एक नायक नहीं, दैवीय अवतार हो जाते हैं. उनका 144 किलो का सिंहासन बनवाने का संकल्प एक बड़ा उद्देश्य बन जाता है. ‘शिवाजी को तलवार मां भवानी से मिली थी’, जैसे मिथक स्थापित होने लगते हैं. ये सारी मान्यताएं पार्टी और दलों से परे होकर चलती हैं. इसीलिए राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे भिडे से समान रूप से मिलते हैं. नरेंद्र मोदी संभाजी से मिलते समय ‘गुरूजी’ कहकर संबोधन करते हैं.

महाराष्ट्र में गोविंद पानसरे की हत्या सबको याद है. उनकी हत्या चाहे जिस संगठन को मानने वालों ने की हो, ये तथ्य है कि पानसरे ने ‘शिवाजी कोण होता’ किताब के जरिए ‘सबको’ नाराज़ कर दिया. उन्होंने काफी ऐसी बातें कहीं जो न सिर्फ शिवाजी की दैवीय प्रतिमा को तोड़ती हैं, बल्कि चितपावन ब्राह्मण वाले हिंदुत्व और शिवाजी के शासन के बीच के फर्क को भी दिखाती हैं.

महाराष्ट्र का कट्टर हिंदुत्व सिर्फ अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव तक सीमित नहीं है. उसमें दलित हाशिए पर हैं. इस हाशिए पर होने की मुकम्मल वजह भी है. मसलन रमाबाई पंडिता, ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले जैसे समाज सुधारक दलित थे. इसके साथ ही इन सुधारकों ने अंग्रेजी शिक्षा और अंग्रेजों का समर्थन किया. कोरेगांव में मराठों को हराने का उत्सव इसकी एक मिसाल है.

लगातार बढ़ रही हिंसा के बीच ‘विवेकानंद का विरोध करने वाली रमाबाई’ और ‘अंग्रेजी मैया’ को मानने वाली सावित्रीबाई अपने आप नकारात्मक श्रेणी में चली जाती हैं. इसके साथ ही उनको मानने वाले दलित भी विरोधी खेमें में चले जाते हैं. एक पल के लिए मायावती को ले लीजिए, तमाम मूर्तियां लगवाने के लिए देश के सवर्ण मिडिल क्लास ने उनका खूब मजाक उड़ाया है. मगर मायावती के पहले कितने लोग सावित्रीबाई फुले जैसे नायकों को जानते थे? शायद न के बराबर.

संभाजी भिडे दावा करते हैं कि उनके कहने पर नरेंद्र मोदी ने केसरिया साफा पहनकर लाल किले से भाषण दिया. इस तरह के दावों की कोई पड़ताल नहीं की जा सकती. मगर ये भी सच है कि नरेंद्र मोदी (तब वो प्रधानमंत्री नहीं थे) भिडे को गुरूजी कहते भाषण है. लाखों युवा जब भिडे के फॉलोअर बनते हैं, ये दोनों बिलकुल अलग तथ्य एक दूसरे पर सुपर इंपोज़ होकर एक नया मिथक गढ़ देते हैं. फिलहाल मान कर चलिए 2019 तक तमाम नए नाम और नए नायक हमारे सामने आते रहेंगे. राहत इंदौरी का शेर है "सरहद पे बहुत तनाव है क्या? ज़रा पता तो करो चुनाव है क्या?

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