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राजस्थान चुनाव 2018: मिशन 59 की राह पर समता आंदोलन समिति, क्या मंजिल तक पहुंचेगी

यह सही है कि 1950 में बाबा साहेब अंबेडकर की सहमति से आरक्षण को सिर्फ 10 साल के लिए लागू किया गया था. लेकिन हकीकत ये भी है कि 68 साल बाद भी आरक्षण का फायदा सीमित लोगों तक ही पहुंच पाया है.

Mahendra Saini Updated On: May 25, 2018 04:58 PM IST

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राजस्थान चुनाव 2018: मिशन 59 की राह पर समता आंदोलन समिति, क्या मंजिल तक पहुंचेगी

देश के सबसे बड़े राज्य में आरक्षण पर राजनीति अब चरम पर पहुंचती नजर आ रही है. विशेषकर 2 अप्रैल की अनुसूचित जाति और जनजातियों की रैली और इस पर राज्य सरकार के रुख के बाद आरक्षण विरोधी सुर बुलंद हो रहे हैं. पिछले कुछ साल में जातिगत आरक्षण को खत्म करने की लड़ाई लड़ रही समता आंदोलन समिति अब और ज्यादा मुखर हो गई है.

समता आंदोलन समिति ने आने वाले विधानसभा चुनाव में आरक्षित वर्गों की सीटों पर ताल ठोंकने का ऐलान कर दिया है. राजस्थान में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए विधानसभा की 59 सीटें आरक्षित हैं. समिति का तर्क है कि इन सीटों से चुनाव जीतने वाले राजनेता दलितों के कल्याण के नाम पर सिर्फ अपना स्वार्थ पूरा करते हैं. इन 59 सीटों पर कांग्रेस और बीजेपी से जुड़े बमुश्किल 120 परिवार ऐसे हैं जो बदल-बदल कर जीतते रहते हैं. ये अपने बेटे-बहुओं के अलावा और किसी का मौका ही नहीं आने देते.

समता आंदोलन समिति का तर्क है कि वे आरक्षित वर्गों के ऐसे लोगों का चुनाव में समर्थन करेंगे जिन्हे आरक्षण से अब तक कोई फायदा नहीं मिल पाया है. हालांकि समिति खुद को गैर राजनीतिक बताती है लेकिन दावा किया जा रहा है कि लोकनीति के लिए गैर राजनीतिक होते हुए भी वे उन राजनीतिक दलों/व्यक्तियों से जुड़ जाएंगे जो उनकी मांगों का समर्थन करेंगे. समिति ने कांग्रेस, बीजेपी और बीएसपी समेत सभी राष्ट्रीय पार्टियों को अपनी मांगों पर पत्र लिखकर कहा है कि अगर वे इन पर सहमति जताते हैं तो समिति उनका समर्थन करेगी.

क्या समता के लिए मिलेगा समर्थन ?

समता आंदोलन समिति अरसे से आरक्षण विरोध की मुहिम चला रही है. ये लड़ाई सड़क से कोर्ट तक, हर जगह लड़ी जा रही है. लेकिन जहां तक समर्थन का सवाल है तो राजस्थान में समता आंदोलन समिति के साथ ठीक वैसा ही व्यवहार हो रहा है जैसा दिल्ली में आम आदमी पार्टी के साथ किया गया था. शुरुआती दौर में दिल्ली में 'आप' को कांग्रेस ने बीजेपी की बी टीम बताया था तो बीजेपी ने कांग्रेस के लिए वोट कटुओं की संज्ञा दी थी.

समता आंदोलन समिति को भी कांग्रेस ने बीजेपी समर्थक करार दे दिया है तो बीजेपी ने कांग्रेस के पक्ष में वोट काटने के लिए खड़ा किया गया आंदोलन बता दिया है. समता आंदोलन समिति के अध्यक्ष पाराशर नारायण शर्मा का दावा है कि 2013 विधानसभा चुनाव के बाद तब के कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष ने हार के पीछे समता आंदोलन को भी बड़ी वजह बताया था. तब उसे बीजेपी समर्थक कहा गया. लेकिन अब जब वे चुनावी राजनीति में आने का ऐलान कर रहे हैं तो बीजेपी वाले उन्हे कांग्रेस का पिछलग्गू बता रहे हैं.

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पटियाला में कार्यक्रम के दौरान समता आंदोलन समिति के अध्यक्ष पाराशर नारायण शर्मा. ( बाएं से तीसरे )

हो सकता है सवर्ण वोटों पर समता आंदोलन समिति का असर हो लेकिन फिलहाल कांग्रेस उसे तवज्जो देने के मूड में नजर नहीं आती. कांग्रेस को लग रहा है कि राजस्थान में एंटी इनकमबैंसी फैक्टर बहुत जबरदस्त है और वे आसानी से बीजेपी को पछाड़ देंगे. यही वजह है कि कांग्रेस की प्रदेश उपाध्यक्ष अर्चना शर्मा विशेष सहानुभूति न दिखाते हुए कहती हैं- सभी के पास चुनावी राजनीति में भाग लेने का लोकतांत्रिक अधिकार है और कांग्रेस को समता आंदोलन से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है.

कांग्रेस की ही तरह फिलहाल बीजेपी भी समता आंदोलन समिति को लेकर कोई सक्रियता दिखाने के मूड में नजर नहीं आती. नगरीय विकास मंत्री श्रीचंद कृपलानी का कहना है कि चुनावी साल में अपनी खिचड़ी पकाने के लिए ऐसे बहुत से लोग और संगठन तेजी से पैदा हो जाते हैं.

क्या है समता आंदोलन ?

जवाहर लाल नेहरू को अपना प्रेरणास्रोत बताने वाली समता आंदोलन समिति देश में जातिगत आरक्षण को खत्म करने के उद्देश्य से आंदोलन चला रही है. समिति अपने मुखपत्र में नेहरू के 1961 के पत्र का वो अंश जरूर उद्धृत करती है, जिसमें उन्होने मुख्यमंत्रियों को लिखा था कि जातिगत आरक्षण के रास्ते चलना मूर्खता ही नहीं बल्कि विध्वंसकारी भी है. समिति अपना उद्देश्य वाक्य, 'हर इंसान एक समान' बताती है. तर्क है कि आरक्षण के जरिए इंसानों के बीच भेदभाव किया जा रहा है.

जातिगत आरक्षण के साथ ही समता आंदोलन समिति पदोन्नति मे आरक्षण का भी विरोध करती है. इसके अलावा, समिति एससी/एसटी आरक्षण में क्रीमीलेयर लगाने का समर्थन करती है. समिति का कहना है कि आरक्षित वर्ग के अंदर ही नया शोषक वर्ग पैदा हो चुका है. ये वर्ग अपने ही सजातीय लोगों को आरक्षण के फायदों से महरूम कर रहा है. हालात ये हो गए हैं कि आरक्षित वर्ग में सिर्फ 5 फीसदी लोग ऐसे हैं जो 'विकसित' हुए हैं. सिर्फ यही लोग पीढ़ी दर पीढ़ी आरक्षण का फायदा ले रहे हैं और बाकी 95% लोगों को अपने स्वार्थ के लिए पिछड़ा बने रहने को मजबूर कर रहे हैं. समिति की तरफ से एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर लागू करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं भी लगाई गई हैं.

समता आंदोलन समिति के अध्यक्ष जयपुर के पाराशर नारायण शर्मा हैं और कई पूर्व न्यायाधीशों, सैन्य अफसरों, प्रशासन और पुलिस अधिकारी इस समिति में गार्जियन के तौर पर सेवाएं दे रहे हैं. राजस्थान के बाहर हरियाणा, दिल्ली, छत्तीसगढ़, कर्नाटक जैसे देश के कई राज्यों तक समिति का फैलाव है. अध्यक्ष का कहना है कि समिति में बने एससी/एसटी प्रकोष्ठ में उन्हीं वर्गों के लोग शामिल किए गए हैं. लेकिन यही पर समिति के विरोधी कई सवाल भी उठाते हैं. विरोधियों का कहना है कि समिति के दलितों को प्रमुख सदस्यों में शामिल नहीं करके मुखौटा सदस्य बनाया गया है. कम से कम समिति के वेबपेज पर दर्ज नामों से तो ये समिति ऊंची जातियों के ऐसे लोगों का जमावड़ा लगता है जिन्हे आरक्षण नहीं मिला हुआ है. आमतौर पर आरक्षण से महरूम ऊंची जातियों द्वारा ही आरक्षण विरोधी आंदोलन चलाए जा रहे हैं.

मीणाओं के लिए बन गया था खतरा !

समता आंदोलन समिति अब तक नौकरियों और पदोन्नति में आरक्षण के खिलाफ आंदोलन छेड़ती रही है. पिछले दिनों मीणा/मीना विवाद का आधार भी समता आंदोलन समिति के उठाए तर्क ही बताए जाते हैं. तर्क दिया गया था कि अनुसूचित जनजाति में मूल आरक्षण भील मीनाओं को प्रदान किया गया था न कि मीणाओं को. संविधान लागू होने के 68 साल बाद भी मूल मीना आज भी विकास नहीं कर पाए हैं. जबकि शहरों में रहने वाले मीणा लगभग ऐसी स्थिति में पहुंच गए हैं जहां दूसरे समुदाय मजाक में कहते हैं कि सरनेम मीणा है तो सरकारी नौकरी जन्म सिद्ध अधिकार है.

मीणा/मीना विवाद कोर्ट में भी चला गया था. एक समय ऐसा लग रहा था कि मीणाओं को आरक्षण से महरूम किया जा सकता है. इसकी आहट सुनते ही अब बीजेपी में घरवापसी कर चुके डॉ. किरोड़ी लाल मीणा ने आरक्षण बचाने के लिए आंदोलन की चेतावनी देना शुरू कर दिया था. कई प्रशासनिक अधिकारी तक अपने सरनेम को मीणा से बदलकर मीना लिखने लगे थे. हालांकि, वसुंधरा सरकार ने बड़ी ही चतुराई से मीणा और मीना को एक ही मानने के आदेश जारी कर दिए. सरकार के बचाव में मीणा और मीना के लिए अंग्रेजी में इस्तेमाल होने वाला समान शब्द (MEENA) काम आया.

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बीजेपी को पता है कि चुनावी साल में आरक्षण का मुद्दा कितना फायदा और नुकसान करा सकता है. यही वजह है कि 2 अप्रैल की रैली के दौरान आरक्षित वर्गों के लोगों पर दर्ज हुए आपराधिक मामलों को खत्म करने का मन बना लिया गया है. राजे सरकार जेलों में बंद एससी/एसटी युवाओं को रिहा करने जा रही है. इससे दलितों के बीच उसे अपने लिए सहानुभूति पैदा होने के आसार लग रहे हैं.

क्या कहते हैं आरक्षण समर्थक ?

लेकिन ऐसा लगता है कि चुनाव नजदीक आते-आते समाज का तेजी से ध्रुवीकरण होता जा रहा है. एक तरफ आरक्षण विरोधी अपनी मुहीम तेजी से आगे बढ़ा रहे हैं तो आरक्षण का फायदा ले रहे लोग भी एकजुट हो रहे हैं. आरक्षण समर्थकों का कहना है कि आरक्षण विरोधियों के तर्क कुछ वैसे ही है जैसी कि पुरानी देसी कहावत- जाके पैर न फटे बिवाई, वो क्या जानें पीर पराई. यानी ऊंची जातियों ने कभी दलितों की जिंदगी जी ही नहीं तो उन्हे इनकी पीड़ा का अंदाज़ा भी कैसे हो सकता है.

जयपुर में प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी कर रहे सत्यनारायण मीणा का तर्क है कि आज़ादी के 70 साल बाद भी दलितों को घोड़ी पर बैठने, मूंछें रख लेने या नाम में सिंह लगा लेने मात्र से पीट-पीट कर मार दिया जाता है. लोकतंत्र के अभाव में हजारों साल तक दलितों पर जो अत्याचार हुए होंगे, उनका अंदाज़ा लगा पाना भी मुश्किल है.

ऐसे में अगर इन दबे-कुचले, पीड़ितों को आरक्षण के जरिए अतीत के उस अत्याचार की क्षतिपूर्ति की जा रही है तो भी सवर्णों को ये पच नहीं रहा है. हजारों साल के अत्याचार के बदले अभी तो आरक्षण को 70 साल भी पूरे नहीं हुए हैं. अगर आरक्षण को 100 या 200 साल हो जाते तो सवर्ण शायद गृहयुद्ध पर ही उतर आते.

एससी/एसटी, ओबीसी कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष रामस्वरूप मीणा का कहना है कि दलितों को आरक्षण हटाए जाने से तब कोई आपत्ति नहीं होगी जब प्राकृतिक संसाधनों का समतापूर्वक बंटवारा कर दिया जाएगा. जनजातियां हजारों साल से जंगलों में रहती आई हैं लेकिन वनौपज पर अधिकार जमा रखा है ऊंची जातियों के ठेकेदारों ने. खेती की जमीन पर सबसे ज्यादा कृषक-मजदूर हैं निम्न वर्गों के लेकिन मुनाफा बटोरते हैं सवर्ण किसान. ऐसे में 'हर इंसान, एक समान' का उद्देश्य तो तभी पूरा हो सकता है जब प्राकृतिक संसाधनों पर मूल जातियों का अधिकार हो.

Ambedkar

यह सही है कि 1950 में बाबा साहेब अंबेडकर की सहमति से आरक्षण को सिर्फ 10 साल के लिए लागू किया गया था. लेकिन हकीकत ये भी है कि 68 साल बाद भी आरक्षण का फायदा सीमित लोगों तक ही पहुंच पाया है. ऐसे में हो सकता है कि एससी/एसटी वर्ग में क्रीमीलेयर ही पिछड़े रह गए लोगों का कल्याण कर पाए. बहरहाल, इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई जुलाई में है और तब देखा जाएगा कि केंद्र सरकार पिछड़ों को फायदा पहुंचाने के कौनसे रास्ते न्यायालय के सामने रखती है.

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