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इस ‘नूरा-कुश्ती’ में अखिलेश बड़े नेता बनकर उभरे

क्या इस युद्ध विराम के बाद सपा के सारे अंतर्विरोध खत्म हो जाएंगे?

Updated On: Dec 31, 2016 04:22 PM IST

Pramod Joshi

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इस ‘नूरा-कुश्ती’ में अखिलेश बड़े नेता बनकर उभरे

अंततः यह सब ड्रामा साबित हुआ. गुरुवार की रात एक अंदेशा था कि कहीं यह नूरा-कुश्ती तो नहीं थी? आखिर में यही साबित हुआ.

मुलायम परिवार के झगड़े का अंत जिस तरह हुआ है, उससे तीन निष्कर्ष आसानी से निकलते हैं. पहला, यह कि यह अखिलेश की छवि बनाने की एक्सरसाइज़ थी. दूसरा, मुलायम सिंह को बात समझ में आ गई कि अखिलेश की छवि वास्तव में अच्छी है. तीसरा, दोनों पक्षों को समझ में आ गया कि न लड़ने में ही समझदारी है.

कुल मिलाकर निष्कर्ष यह है कि अखिलेश यादव ज्यादा बड़े नेता के रूप में उभर कर सामने आए हैं. और शिवपाल की स्थिति कमजोर हो गई है. टीप का बंद यह कि रामगोपाल यादव ने 1 जनवरी को जो राष्ट्रीय प्रतिनिधि सम्मेलन बुलाया था, वह भी होगा.

पार्टी की परम्परागत समझ कहती है कि अखिलेश नौसिखिया बालक है. उसे पता नहीं कि चुनाव कैसे जीता जाता है. अखिलेश की समझ कहती है कि नया वोटर गवर्नेंस और नेता के सौम्य व्यवहार को पसंद करता है. उसकी जातीय और साम्प्रदायिक पहचान पीछे है.

सारे अंतर्विरोध एक झटके में खत्म नहीं हो सकते, पर नए साल की पूर्व-संध्या पर पार्टी ने एक बड़ा कदम उठाया है. देखना होगा कि समाजवादी पार्टी अब अखिलेश यादव की रणनीति के मुताबिक चलेगी भी या नहीं. और यह भी कि क्या उसका कांग्रेस के साथ गठबंधन होगा, जैसाकि अखिलेश चाहते हैं.

सवाल है कि ऐसे ड्रामे की नौबत क्यों आई और क्या अब पार्टी के उम्मीदवारों की सूची बदली जाएगी और उसमें अखिलेश यादव के समर्थकों के नामों को शामिल किया जाएगा?

इस पूरे घटनाक्रम से बार-बार भगवती चरण वर्मा की कहानी ‘दो बांके’ याद आती है, जिसकी ज़मीन लखनऊ की ही है. इसमें खून बहाने का दावा करने वाले बांकों का मौखिक संग्राम खत्म होने के बाद एक देहाती कहता है, “मुला स्वांग खूब भरयो.”

मतदाता को भी यह स्वांग समझ में आता है. पर क्या इस युद्ध विराम के बाद सपा के सारे अंतर्विरोध खत्म हो जाएंगे? बहुत से लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि सपा में आखिर झगड़ा किस बात का है.

यह विवाद तब शुरू हुआ, जब मुलायम सिंह यादव ने विधानसभा चुनावों की के लिए बुधवार को पार्टी के 325 उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की. इस फेहरिस्त में अखिलेश यादव को किनारे कर शिवपाल यादव की तरजीह दी गई थी.

कई ऐसे नाम शामिल किए गए, जिन पर अखिलेश को सख्त एतराज है. उन पूर्व मंत्रियों को टिकट दिया गया था, जिन्हें अखिलेश यादव ने मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया था.

अखिलेश ने अपनी जवाबी लिस्ट जारी कर दी. दोनों लिस्टों में तीस-बत्तीस नामों का अंतर बताया जाता है. इसके बाद शिवपाल यादव ने 68 लोगों की एक लिस्ट और जारी कर दी.

शुक्रवार की शाम दोनों तरफ से पूर्ण युद्ध की घोषणा हो गई थी. फिर भी  कुछ लोगों को यकीन था कि कल तक बर्खास्तगियाँ वापस हो जाएंगी. और ऐसा ही हुआ. शायद अखिलेश को यकीन था कि उनकी बर्खास्तगी वापस होगी.

अखिलेश ने अपने समर्थकों को सख्त हिदायत दी थी कि नेताजी के खिलाफ नारे नहीं लगेंगे. शुक्रवार की शाम मुलायम सिंह ने पहले केवल रामगोपाल को ही बर्खास्त करने की घोषणा की थी. बाद में किसी संकेत पर उन्होंने अखिलेश का नाम भी ले लिया.

उन्होंने अपने बेटे को बर्खास्त करके क्या यह साबित किया कि वे वंशवाद के खिलाफ हैं? शायद यह उनकी बेटे से नाराजगी थी. यदि वे वंशवाद के विरोधी होते तो उनके परिवार के कम से कम 17 सदस्य केंद्र और राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण ठिकानों पर नहीं पहुँचे होते.

अखिलेश पार्टी को परम्परागत ढर्रे से बाहर निकालना चाहते हैं. उनका विवाद शिवपाल यादव से था, पर इस चक्कर में पिता के प्रतिस्पर्धी बन गए. पर इससे उनका कद बढ़ा. और हर टकराव के बाद बढ़ा.

एक अरसे से मुसलमान ‘टैक्टिकल वोटिंग’ कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश में वे कमोबेश सपा के साथ हैं. पर सपा का साथ तभी तक देंगे, जब तक वह जीतने की स्थिति में होगी. पार्टी के सिर पर इसबार ‘मुसलमानों का साथ खोने की तलवार’ लटकी है. मुलायम सिंह उस परिस्थिति को बेहतर समझते हैं.

अभी कहना मुश्किल है कि पार्टी का विवाद सुलझा है या नहीं. अलबत्ता इतना स्पष्ट है कि अखिलेश ने इस दौर में भी जीत हासिल की है. सन 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की जीत के बाद से अखिलेश को अपनी रणनीति बदलने पर विचार करना पड़ा.

उन्हें समझ में आया कि पार्टी के परम्परागत तरीकों को अपनाने के बजाय गवर्नेंस पर ध्यान देना चाहिए. उन्होंने नीतीश कुमार, अरविंद केजरीवाल, नवीन पटनायक, जयललिता और ममता बनर्जी की तरह ‘लोकप्रिय छवि’ बनाने की कोशिश की है. युवा होने से उन्हें नौजवानों का साथ मिलता ही है.

उत्तर प्रदेश की सरकारें प्रशासनिक कुशलता के बजाय जातीय और साम्प्रदायिक पहचान की मदद से काम करती रहीं हैं. अखिलेश ने अपनी सौम्य और ‘कार्य-प्रिय’ छवि को बनाना शुरू किया.

गाँवों में एम्बुलेंस गाड़ियाँ चलने लगीं, लखनऊ के निवासी अपनी मेट्रो की प्रगति देखते रहे, गोमती नदी के तट को आकर्षक बनाया गया, शहरों में होने वाली बिजली कटौती में कमी आई, समाजवादी पेंशन, समाजवादी आवास जैसी योजनाएं आईं.

मीडिया के सामने भी अखिलेश अपेक्षाकृत आत्मविश्वास के साथ आते हैं. साफ बात करते हैं. इन बातों से उनकी छवि बेहतर बनी है. फिलहाल उन्होंने इसकी राजनीतिक कीमत वसूल की है.

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