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'कश्मीरी पंडितों के पलायन के लिए तत्कालीन राज्यपाल जगमोहन थे जिम्मेदार'

सैफ़ुद्दीन सोज़ ने लिखा, जबरदस्त सबूत हैं कि जगमोहन पंडितों के पलायन के लिए पूरी तरह जिम्मेदार थे, जिन्हें कुछ लोगों ने कथित तौर पर जम्मू और अन्य जगहों पर पंडितों के सुरक्षित मार्ग को व्यवस्थित करने के उनके प्रयास के रूप में बताया

Updated On: Jun 23, 2018 09:35 PM IST

FP Staff

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'कश्मीरी पंडितों के पलायन के लिए तत्कालीन राज्यपाल जगमोहन थे जिम्मेदार'
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कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सैफ़ुद्दीन सोज़ की ओर से कश्मीर पर लिखी गई किताब ने कई विवाद खड़े कर दिए हैं. किताब में सोज़ ने पाकिस्तान के पूर्व तानाशाह परवेज मुशर्रफ की ओर से कश्मीर को 'आजाद' रखने के दावे का समर्थन किया है.

रूपा पब्लिकेशन की ओर से लिखी गई किताब के कुछ हिस्से यहां उनकी अनुमति से प्रकाशित किए गए हैं.

मैंने पंडितों के पलायन के असली कारण को जानने के लिए अपने लिए एक कठिन काम निर्धारित किया था क्योंकि मुझे पलायन पर बहुत निराशा हुई क्योंकि उस स्थिति ने वास्तव में कश्मीरीयत की भावना को प्रभावित किया था. मैंने पहली बार उन लोगों से पूछताछ शुरू की जिन्होंने इस विषय पर अत्यधिक विचार किया. ऐसे लोग थे जिन्होंने गवर्नर जगमोहन को पलायन के लिए ज़िम्मेदार ठहराया था. कुछ लोगों ने कहा कि घाटी में डरावनी स्थिति की वजह से पंडित खुद ही चले गए. ऐसे लोगों ने स्वाभाविक रूप से इस पर जोर दिया कि कैसे सशस्त्र आतंकवाद ने शांति को नष्ट कर दिया और सांप्रदायिक सद्भाव को बर्बाद कर दिया. कुछ लोगों ने कहा कि कश्मीरी मुसलमानों ने पंडित पलायन को रोकने के लिए कुछ भी नहीं किया, हालांकि कई लोगों ने महसूस किया कि बहुसंख्यक समुदाय खुद डर गया था और उनके लिए पलायन रोकना असंभव था.

कुछ भी नियंत्रण में नहीं लग रहा था और 1990 के दशक में हर जगह अराजकता थी.

कई सूत्रों ने विश्वसनीय सबूत दिए कि कश्मीरी पंडितों का पलायन राज्यपाल जगमोहन की वजय से हुआ था. उन्हें 19 जनवरी 1990 को दूसरी बार राज्यपाल नियुक्त किया गया था. उन्हों दो कारणों से कश्मीरी पंडितों का पलायन उचित लगाः पहला- इस तरह अकेले पड़ चुके पंडित सुरक्षित महसूस करेंगे और इससे साम्प्रदायिक हत्याएं समाप्त हो जाएंगी. दूसरा- उन्हें लगा कि आतंकवाद के खिलाफ कड़े कानूनों के चलते पलायन के बाद वह स्थिति से बेहतर तरीके से डील कर पाएंगे क्योंकि इन कानूनों का मिश्रित आबादी पर स्वतंत्र रूप से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता था.

कई लोगों का मानना था कि यह दृष्टिकोण नैतिक रूप से सही नहीं था और वह अटक गया था. कुछ लोगों को संदेह था कि मुसलमानों को एक सबक सिखाने के लिए उन्हें कश्मीर भेजा गया था.

कई लोगों का मानना था कि उनका यह अप्रोच नैतिक रूप से उचित नहीं है और उनसे गलती हुई है. कुछ लोगों को शक था कि उन्हें मुस्लिमों को सबक सिखाने के लिए कश्मीर भेजा गया था. सच यह है कि कई चीजों को लेकर जगमोहन की समझ को देखते हुए उनकी नियुक्ति करना ही गलत था. कश्मीर में जो कुछ भी हुआ उसे उन्होंने बहुसंख्यक समुदाय की तरफ से पैदा किए गए लॉ एंड ऑर्डर सिचुएशन के तौर पर ट्रीट किया.

ऐसा जनवरी 1990 में उनकी नियुक्ति से लेकर उसी साल मई में उनके पद से हटने तक जारी रहा. उन्हें लगा कि उनकी कड़ाई से काम हो जाएगा और वह कम समय में ही शांति स्थापित करने में सफल हो जाएंगे. उनको पद से हटाए जाने के बाद भी अराजकता की स्थिति बनी रही जो हर दिन बढ़ती रही. इसके बाद अफ्स्पा (6 जुलाई 1990) जैसे अधिक घातक कानून भी लागू कर दिए गए.

इन कानूनों खासकर एफ्स्पा ने सुरक्षा बल को गोली चलाने, घर जलाने, गिरफ्तारी और आतंकियों का सहयोग करने वालों के खिलाफ कार्रवाई के अधिकार दे दिए.

***** सच यह है कि कश्मीरी पंडितों का पलायन एक सोची समझी घटना थी और पॉवर में बैठे किसी व्यक्ति ने इसके लिए काफी मेहनत भी की थी.

इस बात के सबूत हैं कि विशेष क्षेत्रों में रहने वाले पंडित परिवारों के लिए योजनाबद्ध तरीके से यातायात की व्यवस्था की गई और इस पलायन में पुलिस भी पूरी तरह से शामिल थी.

इस बात के सबूत हैं कि कश्मीरी पंडितों के पलायन में जगमोहन पूरी तरह से जिम्मेदार हैं.कुछ लोग इसे पंडितों को जम्मू और अन्य जगह सुरक्षित पहुंचाने की उनकी कोशिश करार देते हैं.

जगमोहन के दो सहयोगियों ने मुझे बताया कि कश्मीरी पंडितों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार को लेकर जगमोहन के मन में काफी बेचैनी थी. वह अक्सर अपने विश्वासपात्रों के सामने इस बेचैनी का जिक्र करते थे और कहते थे कि उनके मन की स्थिति गुरु तेग बहादुर से प्रेरित है.

24 दिसंबर 1995 को हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित जगमोहन के लेख 'कश्मीर इन सिख हिस्ट्री' ने एक स्पष्ट छाप छोड़ी कि वह कश्मीर में गुरु तेग बहादुर की भावना का पालन कर रहे थे.

इसमें कोई संदेह नहीं है कि जगमोहन का कश्मीर पर एक सांप्रदायिक दृष्टिकोण था और दुर्भाग्य से, यह स्थिति हर समय उनके दिमाग में बनी रही. 6 अगस्त 1992 के टाइम्स ऑफ इंडिया के अपने लेख 'ब्रेकिंग कश्मीर इंपासे' में प्रफुल्ल बिडवई ने लिखा,'जनवरी, 1990 के क्रूर मोड़ के बाद कश्मीरियों का बड़ा हिस्सा देश से अलग हो गया है. पंडितों को घाटी छोड़ने के लिए प्रोत्साहित करने की नीति व्यापक रूप से जगमोहन को जिम्मेदार ठहराती है. उन पर कट्टरपंथी हमलों ने अंतर-समुदाय संबंधों को भ्रमित कर दिया और दर्दनाक पलायन को बढ़ावा दिया. '

जम्मू में रिफ्यूजी कैंपों में रह रहे कश्मीरी पंडित नेताओं की चिट्ठियों को मिलाकर नगरोटा कैंप में रह रहे केएल कौल ने एक चिट्ठी लिखी थी. इस चिट्ठी को श्रीनगर के अखबारों में प्रकाशित किया गया था. इस चिट्ठी में साम्प्रादायिक तत्वों खासकर जगमोहन को पंडितों के पलायन के लिए जिम्मेदार ठहराया था. उन्होंने इस घटना को कश्मीर के इतिहास की सबसे दुर्भाग्यपूर्ण घटना बताई थी.

हाल ही में सेवानिवृत्त हुए वरिष्ठ कश्मीर पुलिस अधिकारी इसरार खान ने 1990 के शुरुआती महीनों में पंडित पलायन को मैनेज करने के लिए राज भवन से जम्मू-कश्मीर पुलिस विभाग पर बनाए जा रहे दबाव के पक्के सबूत दिए हैं. श्रीनगर से प्रकाशित कश्मीर लाइफ ने 22-28 अक्टूबर 2017 के अपने अंक में इसरार खान का व्यापक साक्षात्कार किया, जिन्होंने ऑन रिकॉर्ड कहा कि अप्रैल 1990 में जब वह श्रीनगर (उन दिनों पुलिस गतिविधि का केंद्र) कोठिबाग पुलिस स्टेशन में उप-मंडल पुलिस अधिकारी (एसडीपीओ) थे, उन्हें राजभवन में बुलाया गया जहां जगमोहन के प्रधान सचिव और एसएसपी श्रीनगर अल्लाह बख्श ने खान से पंडितों को जम्मू ले जाने वाली बसों के सुचारू परिचालन सुनिश्चित करने के लिए कहा. जगमोहन ने निर्देश दिया, 'लोडिंग शोडिंग में मदद करना और कोई अटैक शटैक नहीं होने देना.'

(साभार न्यूज-18)

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