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दुनिया आगे निकल गई, मोहन भागवत अब भी 1930 में अटके हैं

भागवत क्यों चाहते हैं कि हिंदू महिलाएं लगातार सिर्फ बच्चा पैदा करने में लगी रहें?

Updated On: Nov 18, 2016 12:24 PM IST

Sandipan Sharma Sandipan Sharma

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दुनिया आगे निकल गई, मोहन भागवत अब भी 1930 में अटके हैं

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत की हिंदुओं को ज्यादा बच्चे पैदा करने की सलाह यह बताती है कि उनका संगठन अभी तक समय के जाल में फंसा हुआ है.

दुनिया जिस विचार को नकार कर आगे बढ़ चुकी है वह संघ को प्रेरित करता है. मोहन भागवत अब भी 19वीं सदी में फंसे हुए हैं.

मार्च, 1931 में संघ-विचारक बीएस मुंजे इटली गए और वहां से युवाओं को अपने जाल में फंसाने की फासीवादी कार्यप्रणाली से बहुत प्रभावित होकर लौटे.

रोम में मुसोलिनी से मुलाकात के बाद मुंजे ने कुछ फासीवादी ट्रेनिंग स्कूलों का दौरा किया.

वहां उन्होंने देखा कि बच्चे शारीरिक व्यायाम और किसी व्यक्ति से आमने-सामने की लड़ाई लड़ने के गुर सीख रहे थे. राष्ट्रवाद और उनकी जातीय सर्वोच्चता को लेकर भाषण सुन रहे थे.

भारत लौटकर मुंजे ने तय किया कि वे संघ की शाखाओं में बच्चों को भर्ती करेंगे और उन्हें शिक्षा देने के लिए यह प्रणाली लागू करेंगे.

अर्धसैनिक एकेडेमी

संघ की शाखा को अर्धसैनिक एकेडेमी का रूप देते हुए इसके सदस्यों को मुसोलिनी ब्रिगेड से उधार लिया हुआ यूनीफार्म पहनाया गया और लाठी भांजने का प्रशिक्षण दिया गया, जिसे वे वास्तविक या काल्पनिक दुश्मन के खिलाफ इस्तेमाल कर सकते थे.

मुंजे की यात्रा के कुछ वर्षों बाद ही मुसोलिनी का फासीवाद नकार दिया गया. आधुनिक हथियारों के आने के बाद लाठी और मल्लयुद्ध के प्रशिक्षण का विचार पुराना पड़ गया.

लाठी से दुश्मन को नियंत्रित करने का फार्मूला हास्यास्पद हो गया. क्योंकि अब दुश्मन पड़ोसी दुश्मन देश से आता है, जो देश में मौजूद आतंकी सेल की मदद से अपनी पहचान भी छुपा सकता है, जो आत्मघाती हमला करने के मकसद से आता है और जिसे पहचानना और रोक पाना मुश्किल है.

यह वाकई हास्यास्पद है कि कुंवारों का एक समूह चाहता है कि हिंदुत्व के फायदे के लिए महिलाएं उतने बच्चे पैदा करें, जितने कि संभव हैं. इस नये युग में महिलाओं को बच्चा पैदा करने की मशीन बना देने से भागवत के राष्ट्रवाद के विचार को कैसे फायदा होगा?

क्या सचमुच वे मानते हैं कि किसी धर्म या जाति के लोगों का संख्या में ज्यादा होना, लाठी और खाकी वर्दी से लैस होना देश के विकास की गारंटी है? क्या यह उत्कृष्टता, आतंकी हमलों और दुश्मन देश से सुरक्षा की गारंटी है?

भारत की मौजूदा जनसंख्या करीब 1.3 अरब है जिसका 80 प्रतिशत हिंदू हैं. फिर भी भारतीय सेना स्थायी तौर पर अधिकारियों और सिपाहियों की कमी का सामना कर रही है.

आंकड़ों की जबानी 

इंडियन एक्सप्रेस अखबार की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी आंकड़े कहते हैं कि 2015 में सेना के पास 55000 पद रिक्त थे, जिसमें 11000 पद अधिकारियों के थे.

वास्तव में भारतीयों में राष्ट्रवाद और राष्ट्रभक्ति की भावना सोशल मीडिया और बैठक रूम की बहसों में सिमट गई है.

वह सैनिकों के संख्या में बदलती नहीं दिख रही है. इस तर्क से देखें तो, यदि हिंदू महिलाएं ज्यादा बच्चे पैदा करें भी तो इससे भागवत के लड़ाकू भारत का सपना कैसे पूरा होगा?

दूसरा तर्क है कि देश में जनसांख्यिकीय संतुलन बेहद खराब है, इसे संतुलित करने के लिए भी ज्यादा से ज्यादा हिंदू बच्चों की जरूरत है.

तमाम मौजूदा जन्मदर अध्ययनों से पता चलता है कि भारत में हिंदुओं की संख्या 80 प्रतिशत है. जबकि संघ के वास्तविक शत्रु यानी मुसलमानों की जनसंख्या घट रही है.

मिंट अखबार अपने एक लेख में कहा गया कि 2001 से 2011 के बीच हिंदुओं की वार्षिक वृद्धि दर 1.55% रही, जबकि इस दौरान मुस्लिम वृद्धि दर 2.2% रही. इसके पहले 1991-2001 के दशक में वार्षिक वृद्धि दर 1.8% और 2.6% थी. दोनों की वृद्धि दर में गिरावट दर्ज की गई है.

यदि हिंदू और मुस्लिम दोनों में यह गिरावट जारी रहती है तो 2061 में यह अपने चरम पर होगी. तब मुस्लिमों की संख्या 29.24 करोड़ और हिंदुओं की संख्या 140.25 करोड़ होगी.

उस समय भारत की कुल जनसंख्या 173.03 करोड़ होगी, जिसमें हिंदू 81.06% और मुसलमान 16.89% होंगे.

क्यों है ऐसी चाहत 

MOHAN BHAGWAT

फिर भागवत क्यों चाहते हैं कि हिंदू महिलाएं लगातार सिर्फ बच्चा पैदा करने में लगी रहें?

वह भी तब, जब बेरोजगारी बढ़ रही है, बेकार की डिग्रियों के लिए चूहा दौड़ मची है और प्राकृतिक संसाधनों की पहले से कमी है.

संघ हमेशा कहता रहता है कि हिंदुओं पर खतरा करीब है. वास्तव में आदमी की डर नामक जो बुनियादी भावना है, यह उससे खेलता है.

संघ जानता है कि डर ज्यादातर इंसानों को अंधा बनाता है और उन्हें रूढ़िवादी, धर्मांध और यहां तक कि घृणा की ओर ले जाता है.

डर व्यक्ति को झुंड में तब्दील कर देता है जिनको राजनीतिक और वैचारिक लाभ के लिए हांका जा सकता है.

कांग्रेस के नेता और बाद में भारत के पहले राष्ट्रपति बनने वाले डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने अपने एक पत्र में गृह मंत्री सरदार पटेल को लिखा था कि जब संघ की स्थापना हुई थी, तब इसका सपना था कि अंग्रेजों के जाने के बाद संघ भारत पर शासन करेगा.

प्रसाद ने लिखा, 'महाराष्ट्रीय ब्राह्मण यह सपना देखते रहे हैं कि जब ब्रिटिश शासन हट जाएगा तब एसएस के जरिये वे भारत में पेशवा राज स्थापित करेंगे. आरएसएस का भगवा झंडा पेशवा का झंडा है.

आरएसएस के लोगों का तर्क है महाराष्ट्रीय पेशवा अंतिम शासक थे जिन्हें अंग्रेजों ने हराया था. ब्रिटिश शासन हटने के बाद राजनीतिक शक्ति महाराष्ट्रीयन लोगों के हाथ में आनी चाहिए.'

महात्मा गांधी की हत्या में आरएसएस की भूमिका की जांच कर रहे जेएल कपूर आयोग के समक्ष कुछ गवाहों ने गवाही दी थी कि आजादी के तुरंत बाद संघ, अलवर, भरतपुर और कुछ अन्य जगहों पर प्रशिक्षित की गई गुप्त सशस्त्र सेना की मदद से तख्ता-पलट करके हिंदू भारत की स्थापना करने के बारे में सोच रहा था. यह बात जेएल कपूर आयोग की रिपोर्ट के चौथे खंड में दर्ज है.

कुंठित सपना 

लेकिन भारत पर राज करने का आरएसएस का सपना दो तथ्यों से कुंठित हुआ. पहला, अंग्रेजों ने प्रशासन कांग्रेस को सौंपा.

और दूसरा, जवाहर लाल नेहरू का नेतृत्व, जो भारत को एक धर्मनिरपेक्ष, उदार संस्कृति की ओर ले जा रहा था, जहां पर बहुसंख्या के भीड़तंत्र को मान्यता नहीं मिलनी थी.

हालांकि, संघ ने अपने सपने को छोड़ा नहीं. उसका अब भी यह लक्ष्य है कि विराट हिंदू परिवार भारत पर हजार वर्षों तक राज करेगा.

संघ की रणनीति में एक बुनियादी खोट है. हिंदुओं को एक करने का आरएसएस का सिद्धांत वही है जिसने 1931 में मुंजे को प्रेरित किया था. अब वह विचार पुराना पड़ गया है.

संघ सोचता है कि हिंदू बच्चों को कच्छा, डंडा पकड़ाकर और हिंदुत्व पर भाषण पिला कर एकजुट किया जा सकता है, लेकिन वह ये बात भूल जाता है कि लोगों के लिए भूख, गरीबी, बेराजगारी, गिरती आय, खराब संसाधन, जातिवाद जैसी दिन-ब-दिन की चुनौतियां हिंदू राष्ट्र की स्थापना के बजाय ज्यादा चिंता का विषय हैं.

भारत एक महान राष्ट्र तभी हो सकता है जब सभी नागरिकों के पास बराबर अवसर और अधिकार हों, वे वर्चस्व की भावना या डर के बिना साथ-साथ रहें और पूर्वग्रहों के आधार पर किसी को प्रताड़ित न किया जाए.

जैसा कि इंडियन एक्सप्रेस में आशुतोष वार्ष्णेय तर्क देते हैं कि हमें अपने आंतरिक संघर्षों से निपटना सीखना होगा और मौजूदा खामियों जैसे गाय पर उच्च वर्गीय हिंदू और दलितों में जो अविश्वास है, उस पर ध्यान देना होगा.

वार्ष्णेय कहते हैं, 'दशकों से हिंदू राष्ट्रवादी सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक हिंदू एकता के लिए प्रयासरत हैं. उनकी यह कोशिश हमेशा उनके विचारधारात्मक नजरिये के साथ संघर्ष करती रही है.

उनकी विचारधारा के पास सहिष्णु हिंदुत्व की मौखिक विशेषता भी है लेकिन अतिवादी पहचान का ऐतिहासिक तथ्य भी मौजूद है.

उस पारंपरिक हिंदू समाज के व्यवहार में जातीय उत्पीड़न और दलितों के लिए  गंभीर किस्म के तिरस्कार भी आरक्षित हैं.'

अधिकाधिक बच्चे पैदा करने के लिए हिंदू महिलाओं को मशीन बनाकर जो बच्चे उत्पादित होंगे वे शाखा में प्रशिक्षित होंगे और सप्ताहांत की कवायद में लाठी को तेल पिलाते हुए इस भ्रम में रहेंगे कि अदृश्य दुश्मन बड़ा होता जा रहा है, या उस जनसांख्यिकीय असंतुलन से भयभीत रहेंगे जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं है. यह सब भारत या संघ की कोई मदद नहीं कर सकता.

भागवत के लिए बेहतर होगा कि वे किसी टाइम मशीन में दाखिल हों और 1931 में लौट जाएं.

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