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संघ को नया रंग दे रहे हैं मोहन भागवत, जल्दी ही आरक्षण, समलैंगिकता जैसे मुद्दों पर करेंगे खरी-खरी बात

भागवत की अगुवाई में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नई दिल्ली के विज्ञान भवन में 17,18 और 19 सितंबर को 'भविष्य का भारतः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण' विषय पर सम्मेलन कराने जा रहा है

Updated On: Sep 08, 2018 01:08 PM IST

Sanjay Singh

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संघ को नया रंग दे रहे हैं मोहन भागवत, जल्दी ही आरक्षण, समलैंगिकता जैसे मुद्दों पर करेंगे खरी-खरी बात
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इतिहास में अब तक किसी सरसंघचालक ने एक ही कार्यक्रम में, एक ही जगह पर और एक ही श्रोताओं को लगातार तीन दिनों तक संबोधित नहीं किया है. हालांकि, अब बदलाव की बयार बह रही है. दरअसल, संघ के कार्यक्रम का मामला सिर्फ संगठन की ड्रेस को खाकी निकर से खाकी फुलपैंट के रूप में बदलने और पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को नागपुर के अपने मुख्यालय बुलाने से ही जुड़ा नहीं रह गया है. संघ के लिए अब बड़ा मुद्दा इस बात के लिए प्रयास करना है कि उसके संगठन से बाहर के लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को किस तरह से देखें यानी जिनका आरएसएस से कोई लेनादेना नहीं है, उन्हें इस संगठन के बारे में किस तरह की धारणा रखनी चाहिए.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की ओर से वैसे विषय पर तत्काल बयान भी जारी किए जा रहे हैं, जिस पर उसकी राय को लेकर काफी उत्सुकता रहती थी और जिसके लिए आम तौर पर किसी शख्स को विभिन्न मीडिया इकाइयों के अपरिपक्व 'सूत्र आधारित' सूचना पर निर्भर रहना पड़ता है. जाहिर तौर पर इस तरह का बयान जारी करना आरएसएस के लिए सामान्य बात नहीं है. सुप्रीम कोर्ट की तरफ से बीते गुरुवार को समलैंगिकों के अधिकार के बारे में ऐतिहासिक फैसला सुनाए जाने के तुरंत बाद आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख ने इस सिलसिले में आधिकारिक बयान जारी किया. इस बयान के जरिए संघ ने इस बात की झलक पेश की कि इस फैसले और समलैंगिकों की शादी को मान्यता देने को लेकर उसकी क्या राय है.

तीन दिन तक लगातार तीन सत्रों को संबोधित करेंगे भागवत

संघ प्रमुख मोहन भागवत इस संगठन का दायरा बढ़ाने की कोशिशों के तहत एक और अहम कदम उठाने जा रहे हैं. दरअसल, भागवत की अगुवाई में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नई दिल्ली के विज्ञान भवन में 17,18 और 19 सितंबर को 'भविष्य का भारतः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण' विषय पर सम्मेलन कराने जा रहा है. इस सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए संघ परिवार से बाहर के 800 प्रमुख बुद्धिजीवियों और शख्सियतों को निमंत्रण भेजा गया है. सम्मेलन में जिन्हें बुलाया गया है, उनमें विदेशी राजनयिक, सेना और सुरक्षा विभाग से रिटायर्ड अधिकारी, बिजनेस समुदाय से जुड़े लोग, पूर्व नौकरशाह, उत्तर-पूर्व और अन्य सीमावर्ती इलाकों से विभिन्न जाति-धर्मों के लोग, लेखक, वरिष्ठ पत्रकार आदि शामिल हैं. इस मौके पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं की भूमिका सिर्फ कार्यक्रम के आयोजन संबंधी इंतजाम करने तक सीमित होगी.

आरएसएस से जुड़े एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया कि 'इसका मकसद दुनिया को न सिर्फ संघ को लेकर हमारे दृष्टिकोण के बारे में जानकारी देना है, बल्कि उन तमाम मुद्दों पर अपनी राय पेश करना है, जिनके बारे में लोग जानना चाहते हैं...मसलन हम क्या करते हैं और हम भारत का कैसा भविष्य देखना चाहते हैं. इन मुद्दों पर सबसे प्रामाणिक दृष्टिकोण पेश करने के लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति हमारे सरसंघचालक मोहन भागवत हैं.'

जिस तरह से तीन दिनों के लिए भागवत का कार्यक्रम तय किया गया है, इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि खबरों के लिहाज से भी यह सम्मेलन काफी अहम हो सकता है. सरसंघचालक तीनों दिन दो-दो घंटे तक अपनी बात रखेंगे और श्रोताओं से भी संवाद करेंगे.

पहचान आधारित राजनीति और धर्मांतरण पर भी होगी बात

सम्मेलन के दूसरे दिन यानी 18 सितंबर को आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत खुद तीन विवादास्पद सामाजिक मुद्दों पर बात कर सकते हैं. ये मुद्दे देशभर में लोगों को उद्वेलित कर रहे हैं. पहला मुद्दा सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटते हुए अनुसूचित जाति/जनजाति संशोधन बिल को पास करने, दलित पहचान और आरक्षण समेत उसके संरक्षण से जुड़े कानूनों का है. दूसरा, इस घटनाक्रम के खिलाफ सवर्ण समुदाय की ओर से मध्य प्रदेश, राजस्थान जैसे चुनावी राज्यों समेत उत्तर भारत के विभिन्न हिस्सों में गुस्से के प्रदर्शन से जुड़ा है. हालांकि, इस संबंध में न तो चुनाव और न ही इन राज्यों का जिक्र किया गया है. तीसरा मुद्दा सुप्रीम कोर्ट के उस ऐतिहासिक फैसले से जुड़ा है, जिसमें आईपीसी की धारा 377 को खारिज करते हुए समलैंगिक समुदाय को कानूनी कवर मुहैया कराया गया है. सम्मेलन में यह बताया जाएगा कि इस विषय और समलैंगिक विवाह पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का क्या दृष्टिकोण है. इसके अलावा, मोहन भागवत के भाषण में पहचान की राजनीति और धर्मांतरण का भी जिक्र हो सकता है. इसी दिन भागवत सार्वजनिक सरोकारों से जुड़े समकालीन मुद्दों पर भी बोल सकते हैं और इससे उन्हें इस मुद्दे पर संघ की स्थिति साफ करने का मौका मिलेगा.

केंद्र के अलावा देश के 20 राज्यों में भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगियों की सरकार है और ऐसे में इन तमाम ज्वलंत मुद्दों पर आरएसएस के मुखिया की राय काफी अहम है. गौरतलब है कि अनुसूचित जाति के लिए आरक्षण जारी रहने के संबंध में भागवत के बयान से राजनीतिक बवाल खड़ा हो गया था और बिहार विधानसभा के चुनावों में आरजेडी-जेडी(यू)-कांग्रेस गठबंधन ने इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बना दिया था. साथ ही, माना जाता है कि इससे बीजेपी को उस चुनाव में नुकसान भी झेलना पड़ा. आरएसएस का नेतृत्व अक्टूबर-नवंबर 2015 के इस अनुभव से पूरी तरह वाकिफ है. लिहाजा, इस बार भागवत के शब्द ज्यादा नपे-तुले होने की उम्मीद है.

संघ के सम्मेलन में खुद भागवत देंगे श्रोताओं के सवालों के जवाब

सम्मेलन के अंतिम दिन भागवत श्रोताओं के 100 से भी ज्यादा सवालों के जवाब देंगे. हालांकि, सूत्रों ने बताया कि सवाल-जवाब के इस सत्र को 'प्रेस कॉन्फ्रेंस' भी में बदलने की इजाजत दी जाएगी. श्रोताओं की तरफ से सवाल कुछ भी हो सकता है, लेकिन निश्चित तौर पर कार्यक्रम के संचालन का एक सिस्टम होगा. अगर भागवत की तरफ से कोई मुद्दा छूट जाता है या श्रोताओं में से किसी शख्स को ऐसा लगता है या वे किसी विषय पर और स्पष्टीकरण चाहते हैं, तो वे सवाल पूछ सकते हैं.

सम्मेलन के पहले दिन यानी 17 सितंबर को आरएसएस प्रमुख इस संगठन के दर्शन, इसके विकास और आधुनिक भारत को लेकर संघ के दृष्टिकोण के बारे में बताएंगे. भागवत ने एक साल पहले यानी पिछले साल सितंबर में पश्चिमी और इस्लामी देशों के 50 शीर्ष राजनयिकों से मुलाकात की थी. इस मुलाकात में उन्होंने आरएसएस से जुड़े इन राजनयिकों के तमाम सवालों के जवाब दिए थे.

हाल में उद्योगपति रतन टाटा को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक कार्यक्रम में बुलाया गया था. वह पहली बार संघ के नागपुर स्थित मुख्यालय पहुंचे थे. इस दौरान मोहन भागवत के साथ टाटा की गर्मजोशी भरी मुलाकात हुई थी. जाहिर तौर पर संघ अपनी पहुंच का दायरा बढ़ा रहा है और वैसे लोगों से जुड़ने की कोशिश कर रहा है, जिनका इस संगठन से किसी तरह का जुड़ाव नहीं था. संघ के एक सीनियर नेता के मुताबिक, 'हम यह उम्मीद नहीं करते कि जो हमसे संवाद करते या जुड़ते हैं, वे हमारे दर्शन और विचार से सहमत हो जाएं. हालांकि, महत्वपूर्ण यह है कि मिथकों और दुष्प्रचार वाली धारणों में उनका भरोसा जारी रहे, इसके बजाय हम ऐसे लोगों को यह समझने की कोशिश में मदद करें कि संघ का क्या नजरिया है.'

दलितों-सवर्णों के 'टकराव' के मुद्दे पर BJP कार्यकारिणी की बैठक में भी हो सकती है चर्चा

अनुसूचित जाति/जनजाति की सुरक्षा के लिए संशोधित कानून और उसके बाद विभिन्न जगहों पर सवर्ण समुदाय के लोगों के विरोध-प्रदर्शन को लेकर भागवत संघ की राय पेश करें, इससे पहले ही बीजेपी इस पर तवज्जो देने में जुटी है. पार्टी उसके नेतृत्व वाली सरकार के बारे में लोगों की राय दुरुस्त करने के लिए इस मुद्दे पर प्राथमिकता के आधार पर काम कर संबधित जाति और समुदायों की चिंताओं को दूर करने की कोशिश कर रही है.

बीजेपी की 8-9 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाली राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में इस मुद्दे पर बात हो सकती है. एक सूत्र ने बताया कि इस पर पार्टी के एजेंडे के तौर पर चर्चा हो सकती है या कार्यकारिणी के समापन सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने भाषण में इस पर बोल सकते हैं. पार्टी में एक राय है कि अलग-अलग दलित समूहों द्वारा इस साल 2 अप्रैल को भारत बंद का आह्वान किए जाने के बाद सामाजिक तनाव का माहौल उभरकर सामने आया है और अब बीजेपी के सामाजिक समर्थन का आधार माने जाना वाला सवर्ण समुदाय दलितों और ओबीसी की तरफ सरकार के 'ज्यादा झुकाव' को लेकर गुस्से का इजहार कर रहा है.

बीजेपी के कुछ नेताओं के मुताबिक, ऐसे में इस मुद्दे पर पार्टी को चीजें साफ करने की जरूरत है. अनुसूचित जाति से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ दलितों ने बीते 2 अप्रैल बंद का आह्वान किया था. पार्टी नेतृत्व जनता की नाराजगी और उभरते सामाजिक तनाव को दूर करने के लिए जल्द ही जरूरी कदम उठा सकता है.

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