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संपूर्ण समाज को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ क्यों बनाना चाहते हैं मोहन भागवत ?

पश्चिमी यूपी के साथ-साथ देश भर में संघ अपना विस्तार करने में लगा है. कोशिश है देश के हर गांव-कस्बे तक संघ की जड़ों को मजबूत करने की

Updated On: Feb 26, 2018 12:04 PM IST

Amitesh Amitesh
विशेष संवाददाता, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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संपूर्ण समाज को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ क्यों बनाना चाहते हैं मोहन भागवत ?

मेरठ में आयोजित संघ के राष्ट्रोदय समागम को संबोधित करते हुए संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि संपूर्ण समाज को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ बनाना होगा. हालाकि संघ प्रमुख ने संघ के समर्थक माने जाने वाले लोगों के लिए भी एक संदेश दिया. उन्होंने साफ-साफ शब्दों में संघ के हितैषी बनने के बजाए, सीधे-सीधे संघ की साधना से जुड़ने की अपील भी कर दी.

संघ प्रमुख के बयान का निष्कर्ष निकाला जा रहा है. आखिरकार संघ प्रमुख ने ऐसा बयान क्यों दिया ? उनके बयान के मायने क्या हैं ? क्या संघ प्रमुख एक बार फिर से हिंदू राष्ट्र के सिद्धांत को ही थोपना चाहते हैं ? क्या उनका बयान हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना के संदर्भ में है ?

हिंदू समाज की एकजुटता पर संघ का फोकस

मतलब जो भी निकाला जाए. लेकिन, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के करीब तीन लाख से ज्यादा स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए संघ के मुखिया के संदेश में बड़ा संकेत छिपा है, क्योंकि मोहन भागवत ने पूरे भारत में विकल्पहीनता की बात कह कर संघ को ही एकमात्र विकल्प बताया है.

उनका कहना था ‘संपूर्ण समाज को आरएसएस बनना होगा, दूसरा विकल्प नहीं है.’

हिंदू समाज में एकजुटता का आह्वान करते हुए मोहन भागवत ने कहा, ‘हमें यह मानना होगा कि हिंदू मेरा अपना भाई है. चाहे किसी भी जाति का हो, वो अपना भाई है. हम हिंदूओं को एक होना है.’

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मोहन भागवत का बयान ऐसे वक्त में आया है जब देश के अलग-अलग हिस्सों में दलितों पर हो रहे जुल्म को लेकर आवाजें बुलंद हो रही हैं. कभी गुजरात के ऊना की घटना हो या फिर महाराष्ट्र के कोरेगांव की घटना या फिर मेरठ से ही सटे सहारनपुर में दलितों और ठाकुरों में पिछले साल हुई लड़ाई की घटना. इन सभी जगहों में फैली हिंसा ने एक ऐसा स्वरूप ले लिया है, जिसमें विरोधी पक्षों ने सत्ताधारी बीजेपी के साथ-साथ पूरे संघ परिवार को निशाने पर ले लिया था. संघ परिवार पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाकर हमला तेज किया गया.

भले ही इस तरह के वाक्ये से संघ का कोई लेना-देना नहीं था. लेकिन, बीजेपी शासित राज्यों में हुई इन घटनाओं से संघ परिवार की उस कोशिश को झटका लगा था, जिसमें संघ दलितों को समाज में बराबरी का हक दिलाने के लिए एक कुंआ, एक मंदिर और एक श्मशान के फॉर्मूले को जमीन पर उतारने की कोशिश कर रहा है.

दलितों के साथ भेद-भाव खत्म करने की कवायद

संघ का पूरा फोकस दलित समाज को अपने साथ जोड़ने पर रहा है. समाज में बराबरी का हक दिलाने के लिए छुआ-छूत और ऊंच-नीच के भेदभाव को खत्म किए बगैर हिंदू समाज को एकता के सूत्र में बांधने का रहा है. ऐसे में संघ प्रमुख का बयान संघ की उसी सोच को परिलक्षित करता है.

हिंदू समाज को जाति के बंधन से ऊपर उठकर एक जुट होने को ही एकमात्र विकल्प बताने वाले संघ प्रमुख पूरे हिंदू समाज को आगाह करना चाहते हैं. उनके बयान पर कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है. इस बात का आभास मोहन भागवत को भी है. वरना हिंदू समाज की एकजुटता की बात कहते-कहते कट्टर हिंदुत्व को अपनाने की कुछ इस अंदाज में सलाह नहीं देते.

कट्टर हिंदुत्व के नाम पर संघ को घेरने की कोशिश करने वाले लोगों को भी उनकी तरफ से पाठ पढ़ाया गया. मोहन भागवत ने कहा कि ‘सत्य की राह पर कट्टरता से चलना है कट्टर हिंदुत्व, कट्टर अहिंसा है कट्टर हिंदुत्व.' उदारता के प्रति कट्टरता को भी भागवत ने कट्टर हिंदुत्व का पर्याय बताया.

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मोहन भागवत ने मेरठ के सम्मेलन में हिंदू समाज को ताकत का एहसास कराने की कोशिश की. उन्होंने विविधता में एकता के बजाए एकता में विविधता के सिद्धांत को अपनाने पर जोर दिया. लेकिन, अपने तीन लाख से ज्यादा स्वयंसेवकों की मौजूदगी में हिंदू समाज को अपने सारे मतभेद भुलाकर अपनी ताकत को महसूस करने की उनकी नसीहत को देखकर लग रहा है कि संघ पश्चिमी यूपी में अपनी जड़ों को मजबूत करने में लगा हुआ है.

मोदी राज में संघ का विस्तार

पश्चिमी यूपी के साथ-साथ देश भर में संघ अपना विस्तार करने में लगा है. कोशिश है देश के हर गांव-कस्बे तक संघ की जड़ों को मजबूत करने की. इसीलिए संघ प्रमुख देश भर में हिंदू समाज को संघ से जोड़ना चाहते हैं. उनकी तरफ से संदेश यही दिया जा रहा है कि संघ से पूरा हिंदू समाज जुड़ेगा तभी हिंदू समाज की एकता भी बने रहेगी और भारत की सभ्यता और संस्कृति को संजोए एक बेहतर राष्ट्र का निर्माण भी होगा.

लेकिन, मोहन भागवत के बयान का मतलब महज इतना ही भर नहीं है. सूत्रों के मुताबिक अगले साल के लोकसभा चुनाव से पहले संघ ने एक बार फिर से कमर कस ली है. एक साल का वक्त बचा है लिहाजा फिर से संघ की कोशिश इस तरह के आयोजन से स्वयंसेवकों को तैयार करना है.

पश्चिमी यूपी पहले से संवेदनशील इलाका रहा है. पिछले लोकसभा चुनाव में भी इस इलाके में वोटों का ध्रुवीकरण हुआ था, जिसका सीधा फायदा बीजेपी को हुआ था. इसी इलाके से अब संघ परिवार के मुखिया की हुंकार को 2019 की लड़ाई के पहले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के स्वयंसेवकों को कमर कसने के लिए तैयार रहने के लिए दिया गया संदेश माना जा रहा है.

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