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बीजेपी का फर्जी प्रोपेगेंडा: गांधी-नेहरू पर हमला करने की आदत!

हिंदुत्ववादी और संप्रदायवादी संगठनों के निशाने पर गांधी और नेहरू हमेशा रहेंगे क्योंकि जिस उदार भारत के लिए वो जीवनभर संघर्षरत रहे, वह उग्र-राष्ट्रवाद को हमेशा आड़े हाथों लेता रहेगा

Updated On: Oct 10, 2017 03:41 PM IST

Ragini Nayak

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बीजेपी का फर्जी प्रोपेगेंडा: गांधी-नेहरू पर हमला करने की आदत!

गांधी जी की हत्या की दोबारा जांच, दूसरे हत्यारे और चौथी गोली के मामले में हिंदी के एक प्रमुख न्यूज़ चैनल द्वारा आयोजित बहस में मैं कांग्रेस का पक्ष रखने के लिए जुड़ी. डिबेट में संघ और भाजपा के प्रवक्ता तथ्यों की शामत लाने पर तुले थे.

यूं तो टीवी डिबेट में मेरी मुर्गी की डेढ़ टांग को साबित करने वाला उनका प्रलाप और कोहराम कोई नई बात नहीं है लेकिन जब उन्होंने यह तर्क दिया कि तत्कालीन सरकार ने जानबूझ कर गांधी जी की सुरक्षा में कोताही बरती थी और बापू की मृत्यु का सबसे ज़्यादा राजनैतिक लाभ पंडित नेहरू को मिला, तो इस मूर्खतापूर्ण धृष्टता पर कुछ पल के लिए बुद्धि चकरा गई.

'पोस्ट ट्रुथ' के इस युग में तथ्य और तर्क हाशिये पर खिसकते जा रहे हैं. हिंदू कट्टरपंथ की बहुकोणीय राजनीति अपने विचार, विद्रूप विचारधारा और संकुचित सोच को ही 'सच' के रूप मे प्रस्तुत करती है. उनका ये सच अफ़वाहों, भ्रामक जानकारियों और कॉन्सपिरेसी थ्योरीज़ पर पनपता है. ये कुतर्क को ही बुद्धिमत्ता का प्रमाण बताता है. यह साइंटिफ़िक टेंपर पर धार्मिक उन्माद को हावी करता है.

इतिहास को सांप्रदायिक नज़र से देखना इसके लिए अनिवार्य है और ये ऐतिहासिक घटनाओं को साज़िश का चोगा पहनाता है. कुछ समय पहले नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मृत्यु से संबंधित फ़ाइलों को लेकर भी इसी सच की दुहाई दी गई थी. तत्कालीन सरकार पर नेता जी को गायब करने से ले कर जान से मारने के निराधार आरोप लगाए गए. खोदा पहाड़ निकली चुहिया. अब गांधी जी की मृत्यु के संदर्भ में भी ऐसे ही किसी दिल दहला देने वाले सच के खुलासे का दावा किया जा रहा है.

गोडसे की छवि चमकाने की साजिश

संघ -बीजेपी और उनके परिवारजन अपने असत्य के प्रयोगों में लिप्त हैं. देश की विभूतियों के साथ संघ परिवार का खिलवाड़ और अपने दोयम दर्जे के नेताओं को देश पर लादने की उनकी कसरत पुरानी है. पर मामला अब बहुत संगीन है. यहां महात्मा गांधी की शहादत पर प्रश्नचिन्ह लगाने और नाथूराम गोडसे की छवि चमकाने करने की, गांधी जी को गद्दार और गोडसे को शहीद घोषित करने की और 'नो वन किल्ड गांधी' को शाश्वत सत्य के रूप में स्थापित करने की साज़िश साफ़ नज़र आती है.

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प्रमाणों और तथ्यों के आधार पर आकलन हो तो प्वाइंट ब्लैंक रेंज से चली गोलियों की संख्या में और चलाने वाले/वालों की संख्या में गलतफ़हमी होने की गुंजाइश न के बराबर है. एफ़आईआर-कानूनी जिरहों से ले कर बीबीसी की रिकार्डिंग तक, प्रत्यक्षदर्शियों-चश्मदीद गवाहों से लेकर मनु-आभा के वृतांतों तक सभी गांधीजी को तीन गोलियां लगने की पुष्टि कर चुके हैं.

प्यारेलाल जी महात्मा गांधी की पूर्णाहुति के चौथे सेक्शन (पेज 467) में लिखते हैं, 'पहली गोली पेट में दायीं तरफ नाभि से ढाई इंच ऊपर और मध्यरेखा की दाहिनी ओर साढ़े तीन इंच पर लगी. दूसरी गोली मध्यरेखा से एक इंच दाईं ओर सातवीं पसली के नीचे लगी और तीसरी गोली छाती से एक इंच ऊपर और मध्यरेखा से चार इंच दूर वक्ष की बायीं ओर लगी."

इतनी विस्तृत जानकारी के बाद शक और शुबे का तो सवाल ही नहीं उठता है. यदि एक बार मान भी लें कि गोडसे ने नहीं किसी दूसरे व्यक्ति ने गांधी जी को मारा है, तो इससे क्या फ़र्क पड़ेगा? गांधीजी की हत्या करने वाला व्यक्ति महत्वपूर्ण नहीं है, कारण महत्वपूर्ण है. बंदूक का ट्रिगर किसकी उंगलियों से दबा ये महत्वपूर्ण नहीं हैं, किस विचारधारा के दबाव के कारणवश दबा वह महत्वपूर्ण है.

नाथूराम गोडसे हिन्दुत्ववादी, कट्टरपंथी विचारधारा के रंगमंच का केवल एक पात्र था. वह संघ और हिंदू महासभा की दशकों की सुनियोजित ब्रेनवॉशिंग का परिणाम था. गोडसे की जगह मदनलाल पाहवा भी हो सकता था या फिर कोई और भी. गांधी जी के कातिल का नाम बदल जाने से सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने वाली, सामाजिक समरसता को आघात पहुंचाने वाली और हिंसा को राजनैतिक हथियार बनाने वाली हिन्दुत्ववादी विचारधारा का पाप नहीं धुलेगा.

झूठ को बार-बार दोहरा कर सच बनाने की कोशिश करने वाले संघ और बीजेपी, पंडित नेहरू और महात्मा गांधी के आत्मीय रिश्ते पर कीचड़ तो उछालेंगे ही क्योंकि महापुरुषों के वैचारिक मतभेदों को व्यक्तिगत द्वंद के रूप में प्रस्तुत करना उनके राजनीतिक प्रॉपोगेन्डा का अभिन्न अंग है.

अनेक मतभेदों के बावजूद नेहरू गांधी जी के चहेते

जब गांधी जी से पूछा गया कि नेहरू से उनके विचारों की भिन्नता से क्या रिश्तों में कड़वाहट आ गई है तो 15 जनवरी, 1941 को दिए गए अपने एक बयान में गांधी जी कहते हैं, 'कुछ लोग कहते हैं पंडित नेहरू और मुझमें मतभेद हैं. हमें एक-दूसरे से विमुख करने के लिए वैचारिक मतभेद से बहुत अधिक की ज़रूरत है. हमारे बीच तो मतभेद तब से हैं जब से हम ने साथ काम करना शुरु किया और मैं अब भी वही कह रहा हूं जो मैं पिछले कुछ सालों से कह रहा हूं कि मेरे उत्तराधिकारी राजाजी नहीं बल्कि पंडित जवाहरलाल नेहरू होंगे.'

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जो नेहरू गांधी जी के भारत आने पर 'द डिस्कवरी अॉफ़ इंडिया' में 'गांधी का आना' शीर्षक वाले भाग में लिखते हैं, 'गांधी जी उस हवा की तरह आए जो ताज़गी देती है. हम सब हरे-भरे हो उठे. हम में जान आ गई. वे सूरज की किरणों की तरह आए जो अंधेरा दूर कर देती है. हमारी आंखों के सामने से पर्दा हट गया.' जो नेहरू गांधी जी की मृत्यु की घोषणा करते हुए बिड़ला भवन में रुंधे कंठ से कहते हैं, 'हमारे जीवन से प्रकाश चला गया और सर्वत्र अंधकार ही अंधकार छा गया...जो ज्योति इस देश में प्रगटी और जली, वह साधारण ज्योति नहीं थी...वह ज्योति हज़ार वर्ष के बाद भी इस देश में दिखाई देगी. दुनिया उसे देखेगी और असंख्य हृदयों को वह सांत्वना देगी.'

वो जवाहरलाल नेहरू जो निर्भीकता से आजीवन गांधी जी के दिखाए सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलते रहे, देश को, समाज को नफ़रत और वैमनस्य से बचाते हुए प्रगति और आधुनिकता के मार्ग पर ले जाते रहे, उन पर जानबूझ कर गांधी जी की सुरक्षा में कोताही करने का लांछन केवल कुत्सित मानसिकता वाले लोग ही लगा सकते हैं. नेहरू और गांधी के प्रेम और विश्वास पर आधारित भावनात्मक और प्रागाढ़ संबंधों को समझ पाना इनके बस की बात नहीं.

जो संघ विचारक गांधी जी की सुरक्षा को ले कर नेहरू पर सवाल उठा रहें हैं, वो जान लें कि वे अप्रत्यक्ष रूप से उस समय के गृह मंत्री वल्लभ भाई पटेल को भी कटघरे में खड़ा कर रहे हैं. लेकिन इन आरोपों का असलियत से कोई लेना-देना नहीं हैं. सन् 1934 से 1948 तक गांधी जी पर 6 बार हमले हुए. गांधी जी किसी भी तरह की सुरक्षा लेने का हमेशा विरोध करते रहे. 'गांधी की सिखावन' नामक अपने लेख में विनोबा कहते हैं, ‘गांधी जी ने ऐसे देह-रक्षक कभी नहीं रखे. देह को वे तुच्छ समझते थे... निर्भयता उनका व्रत था. जहां किसी फ़ौज को भी जाने की हिम्मत न हो, वहां अकेले जाने की उनकी तैयारी थी... वे कहते थे, मृत्यु से डर का कोई कारण नहीं है; क्योंकि हम सब ईश्वर के ही हाथ में हैं.’

गांधी जी सुरक्षा बिना रहते थे निडर

20 जनवरी के बम विस्फोट के बाद नेहरू और पटेल दोनों ने गांधी जी के सुरक्षा प्रबंध को कड़ा करने की पुरज़ोर कोशिश की लेकिन गांधी जी ने एक न मानी. हार कर उन्होंने निवेदन किया कि गांधी जी कम से कम प्रार्थना सभा में आने वालों की तलाशी लेने की अनुमति तो दें. गांधी जी ने पूछा कि मंदिर में जाने वाले की तलाशी ली जाती है भला? तो प्रार्थना सभा में आने वालों की कैसी तलाशी? प्यारेलाल जी भी पूर्णाहुती के चौथे सेक्शन में इस वाकये का ज़िक्र करते हैं (पेज 444). वे लिखते हैं कि गांधी जी ने कहा, ‘मेरी श्रद्धा मुझे प्रार्थना के समय किसी मानव रक्षा के अधीन रहने की अनुमति नहीं देती, जब कि मैंने एकमात्र ईश्वर की ही रक्षा के अधीन अपने को कर लिया है.’ महात्मा गांधी अपनी धुन के पक्के थे. उनकी इच्छाशक्ति पर्वत के समान अटल थी. जो उन्होंने ठान लिया था उससे उन्हें डिगाना नेहरू और पटेल के बस की बात भी नहीं थी.

Jawahar Lal Nehru and Sardar Patel

जवाहर लाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल की साथ की तस्वीर (फोटो : फेसबुक से साभार)

संघ और बीजेपी के कुतर्कों की महिमा अपरंपार है. आज नाथूराम गोडसे और सावरकर का (जिसे कपूर कमीशन ने गांधी हत्या के षड़यंत्र का दोषी पाया था) महिमामंडन हो रहा है. संघ और हिंदू महासभा के माथे से गांधी जी की हत्या का कलंक मिटाने की पुरज़ोर कोशिश हो रही है. भले ही मोदी जी ट्वीट कर गांधी जी को श्रद्धांजलि देना न भूलते हों, पर उनके द्वारा ट्विटर पर फॉलो किए जा रहे लोग, 'गोडसे को भगवान ने भेजा था', 'गांधी को फांसी पर लटका देना था', 'गांधी को मारने को लिये गोडसे के पास प्रयाप्त कारण थे' जैसे कॉमेन्ट्स पोस्ट करते हैं.

हिंदुत्ववादी और संप्रदायवादी संगठनों के निशाने पर गांधी और नेहरू हमेशा रहेंगे क्योंकि जिस आज़ाद, एकीकृत, उदार, सहिष्णु और मानवतावादी भारत के लिए गांधी-नेहरू जीवनभर संघर्षरत रहे, वह उग्र-राष्ट्रवाद पर आधारिक पितृभूमि और पुण्यभूमि को हमेशा आड़े हाथों लेता रहेगा. महात्मा गांधी और पंडित नेहरू के मन, वचन और कर्म का सर्वधर्म-समभाव, धर्म के नाम पर अधर्म फैलाने वाली हिंदू अतिवादी विचारधारा के गले के नीचे कभी नहीं उतरेगा.

(रागिनी नायक कांग्रेस नेता हैं)

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