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राजस्थान बीजेपी: अपनों की 'बगावत' में चैन की सांस कैसे लेंगी महारानी?

पूर्व उपराष्ट्रपति और राजस्थान में बीजेपी के कद्दावर नेता रहे भैरों सिंह शेखवात के दामाद नरपत सिंह राजवी की एक चिट्ठी ने राजस्थान की सियासत में उबाल ला दिया है.

Updated On: Jul 18, 2018 06:58 PM IST

Mahendra Saini
स्वतंत्र पत्रकार

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राजस्थान बीजेपी:  अपनों की 'बगावत' में चैन की सांस कैसे लेंगी महारानी?

पूर्व उपराष्ट्रपति और राजस्थान में बीजेपी के कद्दावर नेता रहे भैरों सिंह शेखावत के दामाद नरपत सिंह राजवी की एक चिट्ठी ने राजस्थान की सियासत में उबाल ला दिया है. चिट्ठी में भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए हैं. राजवी की ये चिट्ठी यूं तो जयपुर नगर निगम से संबंधित है लेकिन इसे सीधे मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को लिखा गया है. हालांकि मीडिया में मामला खुलने से पहले तक इस पर कोई चर्चा नहीं थी लेकिन अब मामला संभाले नहीं संभल रहा है.

राजस्थान में केंद्रीय नेतृत्व की आवाजाही बढ़ रही है. इन सबके बीच मुद्दा बनी चिट्ठी ने प्रादेशिक नेतृत्व के हाथ पांव फुला दिए हैं. इसी हफ्ते अमित शाह जयपुर आ रहे हैं. 7 जुलाई को ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जयपुर में रैली कर के गए हैं. पार्टी, सरकार और नगर निगम अब इसी उधेड़बुन में हैं कि इस तूफान को शाह के आने से पहले शांत किया जाए तो कैसे?

क्या है चिट्ठी में?

नरपत सिंह राजवी जयपुर शहर की विद्याधर नगर विधानसभा सीट से विधायक हैं. उन्होंने बीजेपी शहर अध्यक्ष संजय जैन, शहर मंत्री हिम्मत सिंह और यहां के वार्ड नम्बर 8 के पार्षद भगवत सिंह देवल पर सिंडिकेट बनाकर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं.

आरोप है कि इन तीनों ने मिलकर एक कंपनी बनाई और अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर जयपुर के आधा दर्जन से ज्यादा मेट्रो स्टेशन की पार्किंग का ठेका हासिल कर लिया. इस कंपनी में हिम्मत सिंह का रिश्तेदार भी शामिल है जो युवा मोर्चा का पदाधिकारी है.

आरोपों की फेहरिश्त यही तक सीमित नहीं है. आरोप है कि गुप्ता एंड कंपनी को शहर के नालों की सफाई का ठेका भी दिलाया गया. राजनीतिक रसूख से ठेके हासिल करने का खुलासा तब हुआ जब सफाई न होने की शिकायत की गई. राजवी के मुताबिक जब उन्होंने मेयर अशोक लाहोटी से कार्रवाई न होने के बारे में पूछा तो मेयर ने अपनी लाचारी जता दी.

narpat singh

नरपत सिंह राजवी

राजवी के मुताबिक मेयर ने कहा कि तमाम अनियमितताओं के बावजूद इस कंपनी पर कोई कार्रवाई नहीं हो सकती. ऐसा इसलिए क्योंकि इससे बीजेपी के पदाधिकारी जुड़े हुए हैं. राजवी का दावा है कि मेयर ने उन्हें बातोंबातों में इशारा भी दिया कि ठेकेदार फर्मों द्वारा भ्रष्टाचार होता कैसे है. बेमानी ठेके लेने वाले 10-12 महीने बाद बिल लगाते हैं. इतने लंबे वक्त के कारण मामला ठंडा पड़ जाता है, ठेके में जमा सिक्युरिटी राशि का समय भी निकल जाता है और इस तरह भुगतान फौरन करा लिया जाता है.

अवैध इमारतों से वसूली!

राजवी के मुताबिक निगम पार्षद जोन उपायुक्तों को पहले अवैध इमारतों के बारे में चिट्ठी लिखते हैं. इनको नोटिस जारी करवाते हैं. और इसके बाद शुरू होता है, इमारतों के मालिकों से वसूली का खेल. बताया जा रहा है कि इसी साल फरवरी में पार्षद देवल ने 23 इमारतों को अवैध बताते हुए इनकी लिस्ट निगम को सौंपी. इनमें से सिर्फ 4 को नोटिस जारी किए गए. आरोप है कि भगवत सिंह देवल और उनके पड़ोसी जेईएन धर्मसिंह की मिलीभगत से ये खेल चल रहा है.

हालांकि जिन पर आरोप लगाए गए हैं, वे इसे विधायक की हताशा बताते हैं. पार्षद देवल का कहना है कि इसबार राजवी को शायद टिकट नहीं मिलने वाला है. इसीलिए वे पार्टी पर दबाव बनाने की नीति के तहत काम कर रहे हैं. बीजेपी शहर अध्यक्ष संजय जैन ने भी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए पूरे मामले की जांच कराने की मांग की है.

बीजेपी में अब बवाल थामने की भागदौड़

इस पूरे विवाद ने विपक्ष को भ्रष्टाचार के मुद्दे को भुनाने का मौका दे दिया है. कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट ने आरोप लगाया कि बीजेपी संस्थागत भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रही है. पायलट के मुताबिक कांग्रेस के बाद अब खुद बीजेपी वाले भी अपनी ही सरकार की पोल खोलने में लगे हैं. पायलट ने घनश्याम तिवाड़ी की मिसाल देते हुए कहा कि बीजेपी नेतृत्व बजाय शुचिता के पालन के, भ्रष्टाचार उजागर करने वालों को ही बाहर जाने पर मजबूर कर देता है.

कांग्रेस के मुद्दा लपकते ही बीजेपी में ऊपर से लेकर नीचे तक बैठकों के दौर शुरू हो गए हैं. संगठन मंत्री चन्द्रशेखर और नरपत सिंह राजवी के बीच लंबी बातचीत हुई. प्रदेशाध्यक्ष मदन लाल सैनी की तरफ से भी मीडिया में सफाई दी गई. पार्टी आफिस में ही जयपुर शहर से आने वाले कई विधायकों और मंत्रियों, मसलन कालीचरण सराफ, अरुण चतुर्वेदी, मेयर अशोक लाहौटी और शहर अध्यक्ष संजय जैन के बीच लंबी मंत्रणा हुई.

पार्टी की कोशिश है कि 2 दिन बाद हो रहे अमित शाह के दौरे से पहले इस मामले को किसी भी तरह निबटा लिया जाए. अगर ऐसा नहीं हो पाया तो शाह के सामने गलत संदेश जा सकता है. सरकार को ये डर है कि मुख्यमंत्री के विरोध में कई और नेता भी हैं जैसे रामगढ़ विधायक ज्ञानदेव आहूजा. अगर इस मामले को ठीक से हैंडल नहीं किया गया तो आहूजा जैसे दूसरे विधायक भी नई परेशानी खड़ी कर सकते हैं.

राजवी से रही है वसुंधरा की रार

vasundhara raje

हालांकि बीजेपी में क्राइसिस मैनेजमेंट शुरू हो गया है लेकिन लगता नहीं कि नरपत सिंह राजवी इतनी आसानी से झुक पाएंगे. उनके श्वसुर भैरों सिंह शेखावत के देहावसान के बाद से ही वसुंधरा राजे ने उनसे दूरी बना रखी है. इस साल बजट में भैरों सिंह शेखावत के नाम से एक नई योजना जरूर चलाई गई है. लेकिन इसके सिवा अब तक वसुंधरा पर उनका अनादर करने के ही आरोप लगे हैं.

खुद राजवी भी अब नई पार्टी बना चुके घनश्याम तिवाड़ी के साथ असंतुष्ट गुट में रहे हैं. कई राजपूत संगठन राजवी से खुलकर वसुंधरा विरोध का नेतृत्व करने का आह्वान कर चुके हैं. ऐसे में अब देखने वाली बात ये होगी कि क्या परेशानियों से घिरी बीजेपी के लिए राजवी एक और परेशानी बनते हैं या फिर बीजेपी इस संकट का हल निकाल पाने में कामयाब रहती है. वैसे, राजवी मान भी जाएं तो भी लगता नहीं कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस, घनश्याम तिवाड़ी या हनुमान बेनीवाल इतनी आसानी से वसुंधरा सरकार को चैन की सांस लेने देंगे.

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