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आखिरकार क्यों हो रहा है बीजेपी-शिवसेना का तलाक़

शिवसेना के पास अपनी जमीन बचाने की चुनौती भी है और दूसरे कारण भी

Amitesh Amitesh Updated On: Jan 23, 2018 04:38 PM IST

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आखिरकार क्यों हो रहा है बीजेपी-शिवसेना का तलाक़

मुंबई में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में प्रस्ताव पारित कर शिवसेना ने 2019 का लोकसभा चुनाव अकेले लड़ने का ऐलान कर दिया है. अब अगला लोकसभा चुनाव शिवसेना बीजेपी से अलग होकर लड़ेगी. शिवसेना के इस फैसले ने बीजेपी के साथ उसके संबंधों को लेकर फिर से कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

सबसे बड़ा सवाल यही है कि शिवसेना के साथ बीजेपी का गठबंधन अब कबतक चलेगा? क्या शिवसेना और बीजेपी के बीच गठबंधन के खात्मे की इसे शुरुआत कहा जा सकता है? लगता तो यही है. क्योंकि दोनों ही दलों के बीच खटपट तो पहले से ही थी. अब शिवसेना के इस कदम ने उसकी मंशा को सामने ला दिया है.

इस वक्त केंद्र और राज्य दोनों जगहों में बीजेपी की अगुआई वाली सरकार में शिवसेना शामिल है. केंद्र में लाख हाथ-पैर पटकने के बावजूद भी उसके मंत्रियों की संख्या बढ़ नहीं पाई है. महज एक कैबिनेट मंत्री से उसे संतोष करना पड़ा है. राज्य में भी उसे न ही उपमुख्यमंत्री का पद मिला और न ही मलाईदार मंत्रालय ही हाथ लगा. कम महत्वपूर्ण विभागों को पाकर शिवसेना लगातार मन मसोस कर ही चलती रही है. शिवसेना की निराशा रह-रह कर सामने आती भी रही है.

सरकार में शामिल होने के बावजूद शिवसेना की अपनी ही सरकार के खिलाफ टिप्पणी और सरकार के काम काज की आलोचना विपक्षी दलों की श्रेणी में उसे लाकर खड़ा कर देती है.

कभी सामना के जरिए तो कभी अपने बयानों से मोदी सरकार से लेकर फणनवीस सरकार के काम पर सवाल खड़ा किया जाता रहा है. दूसरी तरफ, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की तारीफ कर शिवसेना की तरफ से बीजेपी के लिए मुश्किलें खडी की जाती रही हैं.

शिवसेना का मकसद क्या है?

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दरअसल, शिवसेना को लगता है कि बीजेपी धीरे-धीरे उसके आधार को खत्म करती जा रही है. बीजेपी के जनाधार में लगातार हो रही बढ़ोत्तरी शिवसेना के आधार को सीमित कर रहा है. इस बात को लेकर शिवसेना लगातार परेशान है.

बात अगर लोकसभा चुनाव 2014 की करें तो उस वक्त बीजेपी और शिवसेना दोनों ने गठबंधन में ही चुनाव लड़ा था. महाराष्ट्र की 48 लोकसभा सीटों में से बीजेपी ने 24 जबकि शिवसेना ने 20 सीटों पर चुनाव लड़ा था. इसके अलावा चार सीटें दूसरे छोटे सहयोगी दलों के खाते में गई थीं. लोकसभा चुनाव 2014 में बीजेपी को 24 में से 23 जबकि शिवसेना को 20 में से 18 सीटों पर जीत हासिल हुई थी.

हालाकि लोकसभा चुनाव 2009 में बीजेपी ने 25 सीटों पर चुनाव लड़ा था जिसमें उसे 9 सीटों पर जीत मिली थी और शिवसेना ने 22 सीटों पर चुनाव लड़कर 11 सीटों पर जीत दर्ज की थी.

2009 के मुकाबले 2014 में बीजेपी का प्रदर्शन जिस तरह बेहतर हुआ, उससे साफ लग रहा था कि बीजेपी की ताकत में जमीनी स्तर पर इजाफा हुआ है. दूसरी तरफ, बाला साहब  ठाकरे के निधन के बाद शिवसेना धीरे-धीरे कमजोर होती गई. लोकसभा चुनाव 2014 के नतीजे के बाद बीजेपी ने लोकसभा चुनाव में सफलता और मोदी मैजिक को आधार बनाकर शिवसेना पर दबाव बनाया.

ज्यादा सीटों की मांग और शिवसेना को कम सीटें देने की जिद में बात नहीं बन पाई और 2014 का विधानसभा चुनाव दोनों दलों ने अलग होकर लड]ने का फैसला कर लिया.

चुनाव नतीजों से साफ हो गया कि बीजेपी के लिए यह कदम कारगर साबित हुआ. 288 सदस्यों वाली महाराष्ट्र विधानसभा में बीजेपी को 122 जबकि शिवसेना को महज 63 सीटें ही मिल सकीं. लेकिन, सरकार बनाने के लिए बीजेपी को फिर से शिवसेना ने समर्थन दे दिया.

महाराष्ट्र में सरकार बनने के वक्त शिवसेना को बीजेपी की तरफ से वो मंत्रालय नहीं दिए गए जिसकी वो मांग कर रही थी. यहां तक कि उप मुख्यमंत्री का पद भी नहीं मिल पाया. यहीं से दोनों ही दलों के बीच अदावत शुरू हो गई.

यह लड़ाई उस वक्त भी जारी रही जब मुंबई महानगर पालिका यानी बीएमसी के चुनाव के वक्त भी शिवसेना और बीजेपी का गठबंधन नहीं हो पाया. अलग-अलग चुनाव लड़ने के बावजूद शिवसेना को 84 और बीजेपी को 82 सीटें मिली. इसके बावजूद बीजेपी ने बीएमसी में शिवसेना को समर्थन देकर संबंध सुधारने की काफी कोशिश की.

ताकत की कमी से चिढ़

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लेकिन, लगता है शिवसेना को अपनी कम हुई ताकत के कारण बीजेपी से जो चिढ़ हुई है उसे इतनी जल्दी वो भुलाने के मूड में नहीं है. शिवसेना ने युवा सेना के प्रमुख और उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे को नेशनल एक्जक्युटिव का सदस्य बनाकर उनके कद को बड़ा कर दिया है. लेकिन, उसकी बीजेपी के साथ अदावत से साफ है कि वो बीजेपी को ही सबसे बडा सियासी दुश्मन मान कर चल रही है.

शिवसेना चाहे लाख दंभ भर ले लेकिन, उसे भी इस बात का एहसास है कि आने वाले दिनों में उसकी एकला चलो की राह आसान नहीं होगी. लेकिन, उसे लगता है कि एकला चलो की राह पर चलकर बीजेपी को राजनीतिक नुकसान पहुंचाया जा सकता है.

खासतौर से लोकसभा चुनाव में शिवसेना के पास खोने के लिए कुछ नहीं है. उसको लगता है कि अलग-अलग चुनाव लड़ने से नुकसान बीजेपी को ही होगा. क्योंकि केंद्र में फिर से सरकार बनाने को लेकर दबाव बीजेपी पर ही होगा.ऐसा करने से हो सकता है विधानसभा चुनाव से पहले शिवसेना की ताकत में इजाफा भी हो जाए. लेकिन, शिवसेना की रणनीति के केंद्र में इस वक्त बीजेपी को ही नुकसान पहुंचाना सबसे उपर है.

शिवसेना को लगता है कि हिंदुत्व की पैरोकार और झंडाबरदार बीजेपी उसके ही वोट बैंक में सेंधमारी कर रही है. अपने 25 सालों से ज्यादा के संबंधों के दरम्यान  शिवसेना प्रमुख बाला साहब ठाकरे के साथ बीजेपी के आला नेतृत्व अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी की केमिस्ट्री काफी बेहतर रही थी. उस वक्त बीजेपी शिवसेना की बी टीम बनकर महाराष्ट्र में काम करती रही थी.

लेकिन, बाला साहब के नहीं रहने और नरेंद्र मोदी के उभार के बाद पूरा समीकरण ही बदल गया है. मोदी-शाह की जोड़ी ने शिवसेना को वो भाव नहीं दिया जिसकी उम्मीद पाल कर शिवसेना बैठी हुई थी. यही बात शिवसेना को नागवर गुजरी है.

लेकिन, अकेले चुनाव लड़ने का शिवसेना का फैसला इतना आसान नहीं होने वाला है. हो सकता है शिवसेना इस वक्त बीजेपी को नुकसान पहुंचाने की कोशिश में है, लेकिन, अति उत्साह में किया गया उसका कदम आत्मघाती भी हो सकता है.

हालाकि बीजेपी अभी भी अपनी तरफ से गठबंधन के दरवाजे बंद नहीं करना चाहती. शिवसेना की तरफ से तलाक के ऐलान के बावजूद बीजेपी अभी तलाक देने से कतरा रही है.

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