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रेणुका चौधरी की हंसी पर पीएम मोदी की टिप्पणी ही कांग्रेस का राष्ट्रीय मुद्दा है ?

पीएम की टिप्पणी नहीं बल्कि महिलाओं को तो यह बुरा लगा है कि प्रधानमंत्री का भाषण चल रहा था लेकिन रेणुका चौधरी ने अपने बर्ताव से उसमें बाधा पहुंचाई

Bikram Vohra Updated On: Feb 09, 2018 06:17 PM IST

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रेणुका चौधरी की हंसी पर पीएम मोदी की टिप्पणी ही कांग्रेस का राष्ट्रीय मुद्दा है ?

बुधवार को राज्यसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाषण दे रहे थे और इस दौरान सदन में कांग्रेस की नेता रेणुका चौधरी की तेज हंसी गूंज रही थी. हंसी से भाषण में बाधा पड़ती देख राज्यसभा अध्यक्ष वेंकैया नायडू ने कहा कि वह (रेणुका) खुद को किसी डॉक्टर को दिखा लें.

यह कोई आए दिन की झिड़की या कामचलाऊ चेतावनी नहीं थी बल्कि सीधे शब्दों में सुनाई गई कड़ी फटकार थी और मामला आगे तूल पकड़ सकता था, लेकिन प्रधानमंत्री ने बात संभाल ली, उनकी जुबान से बेसाख्ता यह तंज फिसला कि 'अध्यक्ष महोदय, कृपया रेणुका जी को हंसने से मत रोकिए. हमने पिछली दफे यह हंसी तब सुनी थी जब टेलीविजन पर रामायण आया करता था.'

पीएम मोदी की टिप्पणी को खूब उछाला जा रहा है

दरअसल टिप्पणी में ऐसी भी कोई बड़ी बात नहीं थी और उसे बड़ी आसानी से आया-गया मानकर भुलाया जा सकता था. राज्यसभा, लोकसभा और सूबों की विधानसभाओं में जो रोक-टोक चलती और बोल-वचन सुनाए जाते हैं या फिर जैसी धींगामुश्ती देखने में आती है उसकी तुलना में टिप्पणी बुरे बर्ताव का नामालूम सा नमूना भी नहीं कहला सकती. क्योंकि टिप्पणी को खूब उछाला जा रहा है, सो मसले पर कुछ बातों को दर्ज करना जरूरी है.

अब बात ऐसी तो थी नहीं कि आप किसी स्कूल के परिसर में हों और वहां शरारत के इरादे से कोई खेल चल रहा हो कि आप मजा लेने के इरादे से स्कूली बच्चे की तरह हंसी-ठट्ठा करें. संसद बड़े-सयानों की जगह होती है और वहां आपसे समझदारी की उम्मीद की जाती है. आप चाहें तो अपने स्कूल के साइंस टीचर के साथ हंसी-ठट्ठा कर सकते हैं, क्लास में ‘लाल बुझक्कड़ों’ की सी हरकत को अंजाम दे सकते हैं लेकिन जब आपके सामने देश के प्रधानमंत्री बोल रहे हों और आप खुद जनता के नुमाइंदे हों तो आप सस्ती लोकप्रियता बटोरने के इरादे से एक पल के लिए भी हंसोड़ बच्चों का सा बर्ताव नहीं कर सकते.

Parliament's Budget Session

जान-बूझकर बाधा पहुंचाने की नागवार कोशिश की प्रधानमंत्री अनदेखी कर सकते थे, लेकिन उन्होंने तंज का सहारा लेकर पलटवार किया. अगर कोई आपकी चलती बात को बीच में ही बाधा पहुंचाए तो फिर अपने बचाव में कुछ कहना कैसे गलत है? इसमें धौंस दिखाने की बात कहां से आ गई? वैसे जारी तमाशे में गृह-राज्य मंत्री किरेन रिजिजू के शामिल होकर खुद को अपने बॉस का विश्वासपात्र साबित करने की जरूरत नहीं थी. यह तो दिख ही रहा था कि प्रधानमंत्री ने कांग्रेस के हमले का बिल्कुल उसी की शैली में जवाब देकर बखूबी अपना बचाव किया लेकिन रिजिजू ने अजब-गजब ट्वीट्स की झड़ी लगा दी.

इस मुद्दे को स्त्री बनाम पुरुष बनाया जा रहा है

बेशक रेणुका चौधरी की हंसी की तुलना रामायण के किरदार से की गई लेकिन प्रधानमंत्री के खिलाफ विशेषाधिकार प्रस्ताव लाने के उनके फैसले से शायद ही कोई सहमत हो. उनकी यह मांग किसी भी लिहाज से उचित नहीं थी. वो भी तब जब आप खुद ही बचकाना बर्ताव करते हैं. आप सदन की गरिमा का जरा भी ख्याल नहीं रखते. मजाक उड़ाने और ओछा ठहराने के अंदाज में हंसते हैं मानो कोई माहौल कोई प्राइवेट जोक्स सुनाने का हो जैसा कि कोई किशोर उम्र का व्यक्ति करता है.

यह भी पढ़ें: मोदी ने कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी को क्या कहा कि सब हंस पड़े

फिर आपको इस बर्ताव के लिए फटकारा जाता है तो आप एकदम से संत की मुद्रा में आ जाते हैं और खुद को नेक बर्ताव के मामले में सामने वाले से चार अंगुल ऊंचा बताते हुए स्त्री बनाम पुरुष का मामला बना डालते हैं. बात कुछ इस अंदाज में फैलाई जाती है मानो रेणुका की तरफदारी में देश की हर स्त्री ने खुद को अपमानित महसूस किया हो.

असल में महिलाएं आहत नहीं हैं. दरअसल महिलाओं को बुरा तो यह लगा है कि प्रधानमंत्री का भाषण चल रहा था लेकिन रेणुका चौधरी ने अपने बर्ताव से उसमें बाधा पहुंचाई. रेणुका चौधरी के बचकाना बर्ताव से वेंकैया नायडू का झुंझलाना बिल्कुल संगत जान पड़ता है.

ज्यादा डरावनी बात यह है कि ऐसी तुच्छ बातें तो बड़ी खबर का रूप ले लेती हैं और मुद्दे की बात उनके आगे दब जाती है. रेणुका चौधरी की हंसी अच्छी, बुरी, बहुत शोर करने वाली या फिर जैसी भी हो- वह देश का एजेंडा तो नहीं!

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