S M L

लचर सरकारें देख चुकी नौकरशाही को मजबूत सरकार के साथ काम करना सीख लेना चाहिए

अफसरशाही को जल्द से जल्द अपना बर्ताव सुधारने और एक मजबूत सियासी नेतृत्व से तालमेल बनाने की आदत सीख लेनी होगी

Updated On: Nov 27, 2018 02:06 PM IST

Ajay Singh Ajay Singh

0
लचर सरकारें देख चुकी नौकरशाही को मजबूत सरकार के साथ काम करना सीख लेना चाहिए

'जल्द ही आप नए विदेश सचिव से मुखातिब होंगे'. तब के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने टीवी चैनल पर लाइव दिखाई गई प्रेस कांफ्रेंस में उस वक्त के विदेश सचिव की बर्खास्तगी का ऐलान करते हुए कहा था.

उस वक्त के विदेश सचिव ए पी वेंकटेश्वरन एक शानदार राजनयिक थे. उनका 36 साल लंबा करियर बेदाग और उपलब्धियों से भरपूर था. लेकिन, कई मुद्दों पर उनकी प्रधानमंत्री राजीव गांधी से नहीं बन रही थी. इसीलिए उन्हें तत्काल प्रभाव से हटाने का ऐलान किया गया. वेंकटेश्वरन ने तुरंत इस्तीफा दे दिया था.

वेंकटेश्वरन को ऐसे हटाने पर कुछ युवा आईएफएस अफसरों ने नाखुशी जताई थी. मगर, जल्द ही ये विरोध ठंडा पड़ गया. ये शायद आखिरी बार था, जब एक प्रधानमंत्री ने अपनी कुर्सी की ताकत का इस तरह से खुलेआम और अहंकारी तरीके से प्रदर्शन किया था. राजीव गांधी ऐसा करने की हैसियत में इसलिए थे क्योंकि वो ऐसी पार्टी के नेता थे, जिसके लोकसभा में 404 सांसद थे.

गठबंधन सरकारों की कमजोरी ने नौकरशाही को मजबूत कर दिया

तब से राजनैतिक नेतृत्व और अफसरशाही के संबंध में जमीन-आसमान का बदलाव आ गया है. इस दौरान देश ने एक के बाद एक गठबंधन सरकारें देखीं. एक सरकार तो अल्पमत वाली भी रही थी. गठबंधन के सहयोगी सियासी मुनाफावसूली के लिए लगातार सरकार में खींचतान और मोलभाव करते रहे. ऐसी सरकारों के प्रधानमंत्री अक्सर दबाव में रहते थे. प्रधानमंत्री का पद कमजोर होने का नतीजा ये हुआ कि सत्ता में एक शून्य उभरा. जिसे भरने के लिए होड़ मच गई. गठबंधन सरकारें चलाने के लिए प्रधानमंत्रियों ने सियासी समझौते किए, विरोधाभासों में संतुलन बैठाने की कोशिश की. नतीजा ये हुआ कि मनमोहन सिंह जैसे प्रधानमंत्री को ये दिन भी देखना पड़ा कि राजीव गांधी के सुपुत्र राहुल गांधी ने 2013 में एक अध्यादेश को सरेआम फाड़ दिया. इस अध्यादेश को मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली कैबिनेट ने मंजूरी दी थी.

ये भी पढ़ें: CBI Vs CBI की लड़ाई में NSA अजित डोवाल की हुई फोन टैपिंग?

उस वक्त राहुल गांधी ने केवल अध्यादेश को सरेआम नहीं फाड़ा था, बल्कि प्रधानमंत्री के पद की गरिमा को नीचा दिखाया था.

पिछले तीन दशकों में अफसरशाही को कमजोर राजनीतिक नेतृ्त्व के साथ काम करने की आदत पड़ गई थी. जो दबाव में रहती थी. इस सिलसिले में एक-दो बार ही अंतराल आया. मिसाल के लिए, याद कीजिए कि किस तरह केंद्रीय मंत्रियों ने ऐसे अफसरों को निजी सचिव नियुक्त किया, जो 'जी मंत्री जी' कहने के बजाय उद्योगपतियों से वसूली करने के उस्ताद माने जाते थे. मंत्रियों के निजी स्टाफ में आईआरएस अफसरों को तरजीह दी गई. ये इस बात का सबूत है कि अफसरों की जिम्मेदारी और रोल किस तरह बदल रहे थे और कितने अहम होते जा रहे थे.

नौकरशाही बदलाव को स्वीकार नहीं कर पा रही

दिक्कत अब ये हो रही है कि अफसरशाही, कार्यपालिका के सियासी हलके में आए बदलाव को स्वीकार नहीं कर पा रही है. अफसरान ये हकीकत पचा नहीं पा रहे हैं कि आज बीजेपी जिस सरकार की अगुवाई कर रही है, उसके पास बहुमत है. वो गठबंधन के सहयोगियों के दबाव से आजाद है.

हमें इसी संदर्भ में सरकार के तमाम अंगों, जैसे प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई, रॉ, आईबी और सीबीडीटी के बीच छिड़ी जंग को समझना होगा. इसी दौरान जिस तरह से रिजर्व बैंक और सरकार के बीच टकराव हुआ, वो नई राजनीतिक संस्कृति के पनपने का संकेत है. अफसरशाही का रोल जो पहले राजनीतिक नेतृत्व को सलाह देने का हुआ करता था, उसे अगुवाई करने की आदत पड़ चुकी है.

सीबीआई विवाद और सियासी मोहरे

सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा की ही मिसाल लीजिए. सूत्रों के मुताबिक, उन्होंने शपथ लेकर दावा किया है कि उनके मातहत राकेश अस्थाना और बिहार के डिप्टी सीएम सुशील मोदी ने पीएमओ के एक अधिकारी के साथ मिलकर चारा घोटाले में लालू प्रसाद यादव को फंसाने की साजिश रची. ताकि वो इसका सियासी फायदा उठा सकें. (नीतीश ने लालू का साथ छोड़कर एनडीए का दामन थाम लिया) इसीलिए वो 'सतर्क' थे.

ये भी पढ़ें: CBI vs CBI: दो अधिकारियों की लड़ाई के अंत का इंतजार कर रहा है देश

किसी भी जांच एजेंसी के प्रमुख का ऐसा दावा करना निहायत वाहियात बात है. जांच एजेंसी का काम अपराध की तफ्तीश करना होता है, न कि उसके सियासी असर को जांचना. पूरे मामले में आलोक वर्मा ने जिस तरह का बर्ताव किया है, वो एक जांच अधिकारी के बजाय राजनेता का ज्यादा लगता है. वर्मा की राजनीतिक पसंद उनके अधिकारी के तौर पर कर्तव्य पर भारी पड़ गई, ये उनके बर्ताव से साफ है. राफेल घोटाले की जांच की मांग को लेकर पहुंचे अरुण शौरी और प्रशांत भूषण से सीबीआई प्रमुख वर्मा ने जिस तरह मुलाकात की, वो उनके राजनीतिक बर्ताव को साफ उजागर करती है. सीबीआई के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ था कि एजेंसी के निदेशक ने खुद को ऐसे सियासी दांव-पेंच में मोहरे के तौर पर इस्तेमाल होने दिया.

इस काम में आलोक वर्मा अकेले नहीं थे. उनके मातहत काम कर रहे कई अफसरों ने इस सियासी एजेंडे में उनका साथ दिया. जैसे कि प्रवर्तन निदेशालय के प्रमुख करनाल सिंह ने वित्त मंत्रालय के खिलाफ ही मुहिम छेड़ दी थी. दागी छवि वाले प्रवर्तन निदेशालय के एक जूनियर अफसर ने जिस बेशर्मी से वित्त सचिव हंसमुख अधिया पर आरोप लगाने वाली चिट्ठी लिखी और अधिया पर चालबाजों से हेल-मेल का आरोप लगाया, उसकी दूसरी मिसाल कम ही मिलती है. हंसमुख अधिया बेदाग और भरोसेमंद अफसर की छवि के लिए जाने जाते हैं. जांच एजेंसियों की आपसी जंग में उनके जैसा ईमानदार अफसर भी घसीट लिया गया.

जिस तरह से आलोक वर्मा के डिप्टी राकेश अस्थाना ने अपने बॉस के खिलाफ खुली बगावत की उसकी भी दूसरी मिसाल नहीं मिलती. इसके बाद तो सरकार के पास कोई और चारा नहीं बचता था कि वो पूरी सियासी ताकत से जंग में मुब्तिला अधिकारियों पर काबू करे.

 

रिजर्व बैंक में भी बन रहा था माहौल

रिजर्व बैंक की बात करें तो वो धीरे-धीरे सरकार विरोधी रुख अख्तियार करता जा रहा था. यहां पर वैसे तो संदर्भ अलग है. यहां मसला अफसरशाही और सियासी नेतृत्व के बीच टकराव का नहीं है. जैसे कि रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'मेक इन इंडिया' मिशन का मजाक बनाया था और ऐसे तमाम मुद्दों पर टिप्पणी की थी, जो आर्थिक नहीं बल्कि सियासी मायने रखने वाले थे. 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद रघुराम राजन को मीडिया और बुद्धिजीवियों का एक तबका, देश की अर्थव्यवस्था का इकलौता तारणहार बताते नहीं थकता था. लेकिन, जब सरकार ने रघुराम राजन को दोबारा रिजर्व बैंक का गवर्नर नहीं बनाया तो इसी वर्ग ने ऐलान किया था कि रघुराम राजन को हटाकर सरकार ने अर्थव्यवस्था की तबाही का मार्ग प्रशस्त किया है.

ये भी पढ़ें: एमके सिन्हा के खुलासे से पता चलता है कि CBI ताकतवर लोगों के हाथ का 'तोता' बन चुकी है

मोदी सरकार ने बड़ी मजबूती से रिजर्व बैंक का गवर्नर चुनने के अपने अधिकार का इस्तेमाल किया और रघुराम राजन की जगह उर्जित पटेल को कमान दी. रिजर्व बैंक में सत्ता का हस्तांतरण बड़ी शांति से हो गया. लेकिन, गुजरे हुए दौर की विरासत ने उर्जित पटेल को भी अपनी जद में ले लिया है. अब वो वित्त मंत्रालय के सलाहकार के बजाय निर्देशक बनना चाहते हैं. इसकी बड़ी वजह है कि पिछले तीन दशकों में रिजर्व बैंक का पाला कमजोर सरकारों से पड़ता रहा है. उर्जित पटेल के हालिया बर्ताव के पीछे यही बड़ी वजह रही. लेकिन, उर्जित पटेल को जल्द ही ये एहसास करा दिया गया कि मौजूदा सरकार उन्हें अपनी मर्जी चलाने देकर खुद मूकदर्शक बनकर बैठने वाली नहीं है.

सबसे ज्यादा परेशान करने वाली बात तो ये है कि कांग्रेस और खास तौर से इसके अध्यक्ष राहुल गांधी ने ब्यूरोक्रेसी में सरकार के खिलाफ बगावत को हवा दी, ताकि मोदी सरकार को नीचा दिखा सकें. जिस तरह से राहुल गांधी ने उर्जित पटेल के समर्थन में ट्वीट किए और उन्हें रीढ़ वाला इंसान बताया. या फिर जिस तरह से आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजे जाने का ताल्लुक राफेल सौदे की जांच से बचने को बताया, उससे साफ है कि वो निजाम के भीतर उठा-पटक को बढ़ावा दे रहे थे. पिछले तीन दशकों में कमजोर सरकारें होने की वजह से जिन अफसरों ने खूब तरक्की की थी, वो राहुल गांधी और कांग्रेस की सियासी झांसे में आकर सरकार के खिलाफ मोहरे बनने को तैयार हो गए.

ये भी पढ़ें: PM मोदी और उर्जित पटेल की मुलाकात में इस तरह सुलझी सरकार और RBI के बीच उलझी बात

आज कांग्रेस और राहुल गांधी का मोदी सरकार के प्रति जो बर्ताव है, ये यूपीए सरकार के उस दौर के रोल से बहुत मिलता-जुलता है, जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे. तब यूपीए सरकार और कांग्रेस ने राज्य की अफसरशाही को मोदी के खिलाफ बगावत के लिए उकसाया. कुछ आईएएस और आईपीएस अफसरों को उनके खिलाफ खड़ा कर दिया. लेकिन, मोदी ने अफसरों की बगावत को कामयाबी से न सिर्फ कुचला बल्कि और मजबूत बनकर उभरे. साफ है कि जब भी अफसरशाही बगावत का सिर उठाएगी तो मोदी प्रधानमंत्री पद की पूरी ताकत से उसे कुचल देंगे.

अफसरशाही को जल्द से जल्द अपना बर्ताव सुधारने और एक मजबूत सियासी नेतृत्व से तालमेल बनाने की आदत सीख लेनी होगी. अब अफसरशाही को सलाहकार का रोल निभाना सीखना होगा. खुद को सर्वशक्तिमान समझने के अफसरशाही के दिन लद गए.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
Jab We Sat: ग्राउंड '0' से Rahul Kanwar की रिपोर्ट

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi