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शिवसेना सांसद की हरकत पार्टी की फ्रस्ट्रेशन का नतीजा तो नहीं?

दहशत को बरकरार रखने का फॉर्मूला शिवसेना की सियासत के मूल में है.

Amitesh Amitesh Updated On: Mar 25, 2017 03:01 PM IST

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शिवसेना सांसद की हरकत पार्टी की फ्रस्ट्रेशन का नतीजा तो नहीं?

शिवसेना के सांसद की हरकत को लेकर आजकल चर्चा खूब हो रही है. रवींद्र गायकवाड की बदतमीजी को लेकर सवाल हो रहे हैं. जनाब की हरकतों को देखकर तो यही लग रहा है कि रस्सी टूट गई लेकिन बल नहीं गया.

शिवसेना का कभी महाराष्ट्र में जलवा होता था. बाला साहब ठाकरे के एक इशारे पर मुंबई की रफ्तार थम जाती थी. लेकिन महाराष्ट्र के भीतर शिवसेना की हैसियत में दिनोदिन आ रही कमी को शिवसेना पचा नहीं पा रही है.

महाराष्ट्र में बालासाहब के रहते बड़े भाई की भूमिका में रहने वाली शिवसेना की हैसियत अब छोटे भाई की हो गई है, जो लाख छटपटाने के बावजूद आखिरकार बीजेपी का हाथ छोड़ने का साहस जुटा नहीं पाता.

रही-सही कसर बीएमसी चुनावों ने पूरी कर दी. अब शिवसेना को आगे की राह सूझ नहीं रही है. न बीजेपी का साथ छोड़ पा रही है और न ही उसके साथ ठीक से निभा पा रही है.

ऐसी सूरत में किंकर्तव्यविमूढ़ शिवसेना का फ्रस्टेशन बढ़ना तो लाजिमी है. लेकिन फ्रस्टेशन में आकर इस कदर कोई अपना आपा ही खो बैठे तो आप क्या कहेंगे. लेकिन, यही हकीकत है.

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शिवसेना सांसद रवींद्र गायकवाड़ (तस्वीर साभार एएनआई)

कुछ लोगों को माननीय सांसद रवींद्र गायकवाड के आचरण से अचरज भी हो रहा है. शायद उन्हें इसके पहले के ट्रैक रेकार्ड की जानकारी न रही हो. तो आईए पहले के इनके कारनामों से आपको रू-ब-रू करा दें.

शिवसेना के 11 सांसदों के ऊपर तीन साल पहले महाराष्ट्र सदन में एक मुस्लिम कैटरिंग स्टाफ के मुंह में रमजान के दौरान जबरन रोटी ठूंसने का आरोप भी लग चुका है. इस घटना के सामने आने के बाद काफी बवाल भी हुआ था. लेकिन, इन्हें अपने सुप्रीमो उद्धव ठाकरे का इस पूरे मामले में भरपूर साथ मिला.

गायकवाड तो यही सोच रहे होंगे कि जबरन रोटी ठूंस कर किसी का रोजा तुड़वा दिया तो क्या हुआ. जब अपने आका का ही आशीर्वाद साथ हो तो फिर किस बात की परवाह. अब एक एयर इंडिया के कर्मचारी को पीट ही दिया तो चलिए ठीक है कोई फर्क नहीं पड़ता हम सांसद हैं, हमारे रोब में कमी आ गई तो फिर क्या किया जाए.

अब तैयारी हो रही है उल्टे एयर इंडिया के कर्मचारी और अधिकारी को लपेटे में लेने की. अपनी गलती मानने को तैयार नहीं लेकिन, जो पीट गया उसे फिर से कठघरे में तैयार करने की एक और कोशिश.

ये सुनने में अटपटा भी लग रहा हो, लेकिन, शिवसेना के एजेंडे और शिवसैनिकों की कार्यशैली इस हरकत को कभी मुंह चिढ़ाती नजर नहीं आएगी. क्योंकि ऐसी हरकत तो उनकी फितरत रही है.

कभी मराठी मानुष के नाम पर दक्षिण भारतीयों पर हमले तो कभी उत्तर भारतीयों की ताबड़तोड़ पिटाई का मामला हो. अपने हिंसक तेवर और सरेआम गुंडागर्दी के दम पर मुंबई के भीतर अपनी दहशत को बरकरार रखने का फॉर्मूला शिवसेना की सियासत के मूल में है.

सभी आलोचनाओं से बेपरवाह, किसी की न सुनने की जिद और अपने तरीके से मुंबई के भीतर अपनी समानांतर सरकार चलाने की कोशिश को शिवसेना ने काफी हद तक परवान भी चढ़ाया.

वीर शिवाजी को अपना आइकान मानने वाली पार्टी ने अपने विचारों में हिंदुत्व का तड़का लगाकर एक ऐसी ताकत के रूप में उभारा जिसने भले ही महाराष्ट्र में सत्ता में कम वक्त रही हो, लेकिन, अपने कदम से चर्चा के केंद्र में अपने-आप को हमेशा से ही रखा है.

हिंदुत्व के नाम पर ही बीजेपी के साथ उसकी गलबहियां भी हुईं. लेकिन, हमेशा दबदबा अपना ही कायम रखा. अब गलबहियों में खत्म होते दबदबे के बीच अपने वजूद को लेकर भी चिंता होती दिख रही है. महाराष्ट्र की पार्टी मुंबई तक सिमटती चली आ रही है.

मराठी मानुष के गढ़ में उसकी पार्टनर अब उससे ज्यादा पैठ बना चुकी है जो उसे रास नहीं आ रहा. ऐसी सूरत में अपनी पैठ बढ़ाने के बजाए अपने पुराने अंदाज में अपने कारनामों से एक माहौल बनाने की कोशिश कितना कारगर होगी ये कह पाना मुश्किल है. क्योंकि जनता ने इन कारनामों को पहले ही खारिज कर दिया है.

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