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खत्म होने को है रमजान का महीना, लेकिन इस बार इफ्तार से दूर तमाम राजनीतिक पार्टियां

चूंकि इफ्तार अब मौजूदा राजनीतिक शिष्टाचार से जुड़े चलन के दायरे से बाहर हो गया है, इसलिए प्रधानमंत्री, कैबिनेट मंत्रियों से लेकर विपक्ष ने भी इससे दूरी बना ली है

Rasheed Kidwai Updated On: Jun 07, 2018 11:25 AM IST

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खत्म होने को है रमजान का महीना, लेकिन इस बार इफ्तार से दूर तमाम राजनीतिक पार्टियां

रमजान का महीना खत्म होने पर है, लेकिन अभी भी राजनीति के मैदान में इफ्तार का मामला फीका ही नजर आ रहा है. रमजान के दौरान दिनभर रोजा (उपवास) रखने और सूरज के ढलने के बाद इफ्तार के जरिए ही रोजा तोड़ने की परंपरा है.

इस साल रमजान में इफ्तार के ज्यादातर आयोजन पारंपरिक मुस्लिम महफिलों के दायरे में ही सीमित हैं. धार्मिक कट्टरपंथ के कारण मौत का शिकार बने युवा अंकित सक्सेना के पिता यशपाल सक्सेना ने अद्भुत मिसाल पेश करते हुए अपने बेटे की याद में इस रमजान के दौरान इफ्तार का आयोजन किया. इस तरह से उन्होंने सांप्रदायिक सौहार्द का दुर्लभ नमूना पेश किया. दरअसल, मुसलमान लड़की से प्यार करने पर कुछ महीने पहले ही उनके बेटे की निर्ममतापूर्वक हत्या कर दी गई थी.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने मुंबई में किया इफ्तार का आयोजन

मुंबई में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने भी इस बार मुसलमानों के दिनभर के उपवास की इस परंपरा का सम्मान करने का फैसला किया. इस भगवा संगठन की अपेक्षाकृत कम मशूहर इकाई मुस्लिम राष्ट्रीय मंच (एमआरएम) ने मुंबई के सह्याद्रि गेस्ट हाउस में इफ्तार का आयोजन किया. उधर, अयोध्या में सरयू नदी के तट पर मौजूद मंदिर सरयू कुंज ने भी व्यापक स्तर पर शांति और सहअस्तित्व का संदेश फैलाने के लिए इफ्तार की मेजबानी की. यह मंदिर अयोध्या स्थित रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद स्थल से महज कुछ मीटर की दूरी पर मौजूद है.

हालांकि, दिल्ली में राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री निवास और तमाम कैबिनेट मंत्रियों के आवास ने इस आयोजन से पूरी तरह से दूरी बनाए रखी. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जब सोमवार को जब इफ्तार पार्टी का आयोजन किया, तो कांग्रेस समेत बाकी विपक्ष ने कुछ अंदरूनी वजहों से इस आयोजन से दूरी बनाए रखी.

कांग्रेस, समाजवादी पार्टी समेत अन्य विपक्षी दलों की भी अब इसमें नहीं रही दिलचस्पी

बहरहाल, इफ्तार पार्टी के आयोजन को लेकर कोई औपचारिक और शासकीय मामला नहीं है, लेकिन इससे पहले राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, बाकी केंद्रीय मंत्री और मुख्यमंत्री मुसलमान समुदाय के लिए सद्भावना के इजहार के तहत इफ्तार पार्टियों का आयोजन करते रहे हैं. इफ्तार पार्टी के आयोजन के लिए अतिथियों की सूची में मुस्लिम धर्मगुरु (मौलाना), प्रमुख मुसलमान समुदाय से जुड़ी अहम शख्सियतें, इस्लामी देशों के राजदूत के अलावा अलग-अलग राजनीतिक शख्सियतें भी शामिल होती थीं.

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चूंकि इफ्तार अब मौजूदा राजनीतिक शिष्टाचार से जुड़े चलन के दायरे से बाहर हो गया है, इसलिए सोनिया और राहुल गांधी, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बाकी विपक्षी दलों ने भी इसे पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया. हालांकि, रमजान का महीना खत्म होने में अभी भी हफ्ताभर से ज्यादा का वक्त बाकी है, लेकिन मुसलमान समुदाय के नेताओं को अब किसी भी पार्टी के बड़े नेता की तरफ से इफ्तार के आयोजन की उम्मीद नहीं नजर आ रही है.

राजनीतिक हलकों में बदलते इसी ट्रेंड की तर्ज पर चलते हुए हिंदी खबरिया चैनलों और कई अखबारों ने भी पट्टी के तौर पर इफ्तार और सहरी (सूरज उगने से पहले रोजा शुरू करने का समय) के वक्त के बारे में बताना बंद कर दिया है. यह शायद इत्तिफाक ही था कि रायसीना हिल्स (केंद्र) में सरकार बदलने के कुछ महीनों के बाद इफ्तार को लेकर घटनाक्रमों में इस तरह का बदलाव देखने को मिला.

इंदिरा गांधी ने शुरू किया था राजनीतिक इफ्तार का चलन!

राजनीतिक इफ्तार के आयोजन के चलन को शुरू करने का श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को जाता है. उन्होंने 1980 में इस पंरपरा की शुरुआत की थी. हालांकि, गैर-कांग्रेसी पार्टियों का धर्मनिरपेक्ष कुनबा इफ्तार को लेकर इस दावे को गलत बताता है. उनका दावा है कि 'रोजेदारों' की मेजबानी करने की शुरुआत सबसे पहले उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवंती नंदन बहुगुणा ने 1973 से 1975 के दौरान किसी वक्त में की थी.

बहरहाल, मुस्लिम धर्मगुरु राजनीतिक हलकों में इफ्तार के आयोजन को लेकर बदल रहे ट्रेंड को ज्यादा तवज्जो नहीं दे रहे हैं. पिछले कुछ सालों में कई मुस्लिम धर्मगुरुओं का राजनीतिक स्तर पर होने वाले इस तरह के आयोजनों से मोहभंग हो चुका है और वे इसे महज धन की नुमाइश करने वाला राजनीतिक तमाशा करार देने से भी परहेज नहीं करते हैं. यहां तक कि कई मुस्लिम संगठनों, इमामों, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्यों ने राजनीतिक स्तर पर होने वाली इस तरह की इफ्तार पार्टियों का 'बहिष्कार' करने को लेकर आह्वान भी किया था. इन लोगों ने मुसलमानों से 'राजनीतिक इफ्तार' में नहीं जाने की गुजारिश की थी. उनका कहना था कि रजमान का महीना राजनीतिक गतिविधियों और सामाजिक स्तर पर मिलने-जुलने के लिए नहीं होता है, बल्कि यह पवित्र महीना इबादत, मजहब और प्रायश्चित के लिए होता है.

वाजपेयी और मनमोहन सिंह ने भी कुछ साल नहीं की थी इफ्तार की मेजबानी

अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह जैसे पूर्व प्रधानमंत्रियों ने भी अपने कार्यकाल में कुछ मौकों पर इफ्तार का आयोजन नहीं किया. हालांकि, इसकी वजह राष्ट्रीय आपदा-दुख या किसी तरह की इमरजेंसी आदि रही. बहरहाल, जब-जब इस तरह की नौबत आई, तो इन नेताओं ने हमेशा यह सुनिश्चित किया कि अगर वह इसका आयोजन नहीं कर रहे हैं, तो उनके बदले कम से कम उनकी कैबिनेट का कोई सहयोगी इसकी मेजबानी करे.

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने 1996 में इफ्तार का आयोजन किया था. बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण उदार मेजबान थे और पार्टी के 11, अशोका रोड, नई दिल्ली स्थित मुख्यालय में इसका आयोजन हुआ था. हालांकि, यह इफ्तार पार्टी कुछ अलग और दिलचस्प वजहों से चर्चा का विषय बन गई. दरअसल, दिनभर उपवास रखने के बाद रोजा तोड़ने से पहले की जाने वाली मगरिब नमाज के लिए किसी तरह का इंतजाम नहीं किया गया था. हालांकि, जब जल्दबाजी की हालत में इसके लिए व्यवस्था की गई, तो पश्चिम दिशा की बजाय अलग-अलग दिशाओं में नमाज अदा की गई.

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जहां तक कांग्रेस सरकारों का सवाल है, तो उन्होंने इस सिलसिले में इंदिरा गांधी द्वारा पहल किए जाने के बाद से इस 'पंरपरा' को जरूरी शिष्टाचार के तौर पर लिया. हालांकि, कांग्रेस पार्टी में अध्यक्ष पद पर रहते हुए सोनिया गांधी ने आखिरी बार 2001 में इफ्तार का आयोजन किया था. इसके बाद पार्टी अध्यक्ष के तौर पर उन्होंने इस संबंध में मेजबानी नहीं की.

मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री रहते हुए तकरीबन हर साल अपने तत्कालीन आवास 7, रेस कोर्स रोड पर इफ्तार का आयोजन किया. हालांकि, उत्तराखंड में आई भयंकर बाढ़ के कारण अपने प्रधानमंत्री काल के आखिरी साल में वह इसकी मेजबानी नहीं कर सके.

अटल बिहारी वाजपेयी ने भी अपने प्रधानमंत्रित्व काल में एक साल इफ्तार का आयोजन नहीं किया था. 2004 के आम चुनाव से पहले 2003 में वह ऐसा नहीं कर सके थे. विदेशी दौरे में व्यस्त रहने का हवाला देते हुए उन्होंने ऐसा किया था. हालांकि, वाजपेयी ने उस वक्त अपने जूनियर मंत्री शाहनवाज हुसैन को इसकी मेजबानी करने को कहा था.

उस साल, तत्कालीन राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम (जो खुद मुसलमान थे) ने भी इस संबंध में राष्ट्रपति भवन की सालाना परंपरा को तोड़ते हुए कहा था कि इफ्तार का आयोजन नहीं होने से जो पैसे की बचत होगी, उसे तीन अनाथ आश्रमों को दान कर दिया जाएगा. कलाम के इस कदम की सबने जमकर तारीफ की थी.

दिल्ली के राजनीतिक हलकों में इफ्तार के गुम होने का असर बॉलीवुड पर भी दिख रहा है. अब तक ऐसी कोई इफ्तार पार्टी नहीं हुई, जहां इफ्तार के आयोजन स्थल पर से विदा लेने से पहले सलमान खान को शाहरूख खान से गले मिलते देखा गया हो.

(लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में विजिटिंग फेलो और हाल में आई किताब 'बैलटः टेन एपिसोड्स दैट शेप्ड इंडियाज डेमोक्रेसी'के लेखक हैं)

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