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यूपी में कांग्रेस-एसपी गठबंधन की 1989 की राष्ट्रीय मोर्चा से तुलना बेमानी है!

पूरे देश में एक ऐसा गठबंधन बना जो ढीला ढाला ही सही पर जिसमें कार्यकर्ताओं के मन भी एक मन वाले थे

Ram Bahadur Rai Updated On: Mar 19, 2017 07:39 PM IST

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यूपी में कांग्रेस-एसपी गठबंधन की 1989 की राष्ट्रीय मोर्चा से तुलना बेमानी है!

उत्तर-प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 का परिणाम कई मायनों में याद किए जाएंगे. देश में होने वाले हर चुनाव में एक नया राजनीतिक प्रयोग होता रहा है. हमलोग एक हार और एक जीत से पिछले चुनावों में मिले परिणामों से तुलना करना शुरू कर देते हैं.

लेकिन वह तुलना करना सही नहीं होता क्योंकि, परिस्थितियां अलग होती हैं. नेता अलग होते हैं और लोगों का मन भी अलग होता है.

उत्तर-प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 की कई विशेषताएं हैं. पहली विशेषता यह है कि उत्तर प्रदेश का जो मतदाता है, वह पहले से ज्यादा परिपक्व हुआ है. लोकतंत्र भी परिपक्व हुआ है.

जो लोग यूपी चुनाव से पहले बहुत आग्रहपूर्वक यह कहते थे कि राज्य में त्रिशंकु यानी हंग असेंबली आएगी उस समय भी मैं कहता था कि स्पष्ट बहुमत या स्पष्ट जनादेश की एक प्रवृति देश में चल रही है, तो कोई कारण नहीं है कि त्रिशंकु विधानसभा आने की.

साल 2014 से भारतीय राजनीति में बदलाव 

खासकर, साल 2014 से भारतीय राजनीति की दशा और दिशा बदली है. हर नागरिक के मन में एक उम्मीद पैदा हुई है. यह उम्मीद विकास की है, राष्ट्रीयता की है और यह उम्मीद इस बात की भी है कि हमारा मुल्क आर्थिक और सामरिक दृष्टि से पूरी दुनिया में सबसे उपर हो.

दरअसल, हमारी आकांक्षाओं के कई रूप हैं. मोटे तौर पर कह सकते हैं कि यह दौर हमारी आकांक्षाओं की राजनीति का है. अंग्रेजी में कहें तो यह दौर एक तरह से ऐस्पिरेश्नल पॉलिटिक्स की है. यही इस दौर की प्रकृति है जिसकी धुरी अब नरेंन्द्र मोदी बन गए हैं.

लोगों की आकांक्षाओं का मोदी से जुड़ाव

लोगों को अब यह लगने लगा है कि यह व्यक्ति न केवल हमारी सभी आकांक्षाओं को पूरा करेगा बल्कि भारत को एक ऐसा उम्दा भारत बनाएगा जहां कोई भी व्यक्ति खुद को ठगा हुआ महसूस नहीं करेगा. लोगों में नरेंद्र मोदी के प्रति विश्वास निरंतर बढ़ रहा है.

साल 2014 में तो एक उम्मीद थी, जिस उम्मीद के कारण लोगों ने नरेंद्र मोदी को अपना लिया. अब दो-तीन सालों के अनुभव के बाद लोगों ने यह पाया है कि इस आदमी की कथनी और करनी एक ही है. जैसा नरेंद्र मोदी कहते हैं वैसा ही करते हैं.

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यूपी चुनावों में नरेंद्र मोदी पर विपक्षियों ने चौतरफा हमला किया था

2014 की जीत पर विरोधियों ने गढ़े नए-नए तर्क 

2014 में जब बीजेपी को स्पष्ट बहुमत मिला तो विरोधियों ने नए-नए तर्क गढ़े. विरोधियों ने नरेंद्र मोदी की जीत को स्वीकार नहीं किया. विरोधियों ने माना कि चूंकि कांग्रेस का नेतृत्व बहुत कमजोर था, इसलिए बीजेपी को स्पष्ट बहुमत मिल गया.

दूसरा तर्क यह दिया गया कि देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ जो आंदोलन हुए उससे देश में परिवर्तन की आहट सुनाई दी, जिसके प्रतीक नरेंद्र मोदी बन गए.

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कुल मिला कर यह कहने की कोशिश की गई कि बीजेपी को जो स्पष्ट बहुमत मिला है वह नरेंद्र मोदी के कारण भले ही मिल गया हो, लेकिन देश में 63 प्रतिशत से ज्यादा की जनसंख्या या मतदाता नरेंद्र मोदी के खिलाफ खड़े हैं.

ये वही तर्क देने वाले लोग थे जो बिहार के अनुभव को ध्यान में रख कर उत्तर- प्रदेश को देख रहे थे. ये लोग फिर से एक बार कहने लगे थे कि बीजेपी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलेगा.

अखिलेश को मीडिया में मोदी से ज्यादा तरजीह 

अगर आप अखिलेश यादव और प्रधानमंत्री मोदी की सभाएं देखेंगे तो पाएंगे कि पीएम मोदी की सभाओं में भीड़ काफी जुटती थी. लेकिन अखिलेश यादव की सभाओं में एक खास बिरादरी के लोग इस तरह का माहौल बना रहे थे कि मानो एक स्पष्ट बहुमत अखिलेश को या एसपी-कांग्रेस गठबंधन को मिल रहा है.

मोटे तौर पर आज भी एक-दो मीडिया घरानों को छोड़ दें तो मोटे तौर पर मीडिया नरेंद्र मोदी के खिलाफ है. पहले से ही मीडिया को कल्टीवेट करने का प्रयास हमारे यहां होता रहा है. वह कोशिश इस सरकार या नरेंद्र मोदी के तरफ से हुई ही नहीं.

आप यूं कहें कि हमारे यहां जो पत्रकार प्रधानमंत्री के साथ विदेश दौरे पर जाते थे, उनका समाज में एक विशेष स्थान बन जाता था. माना जाता था कि ये प्रधानमंत्री के करीबी हैं. जवाहरलाल नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक यह परंपरा चलती आ रही थी. जिसको पीएम मोदी ने तोड़ दिया.

मुझे भी पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के साथ एक बार विदेश जाने मौका मिला था. महात्मा गांधी की 125वीं जन्म दिवस मनाई जा रहा थी. उस समय के प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हाराव का यूनेस्को में एक भाषण था.

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प्रधानमंत्री के इस दौरे के साथ जाना था प्रभाष जोशी जी को लेकिन प्रभाष जी ने मुझे जाने को कहा. हालांकि, मेरी इच्छा जाने की नहीं थी. जब मैं प्रधानमंत्री के साथ दौरा खत्म कर आया तो मैने यह पाया कि प्रधानमंत्री के साथ जाना भी एक विशिष्टता प्रदान करता है.

Akhilesh Dimple

लखनऊ में यूपी चुनाव के दौरान पार्टी मैनिफेस्टो जारी करते हुए अखिलेश डिंपल

कांग्रेस-एसपी गठबंधन का कोई मेल नहीं 

ऐसे बहुत सारे ढंग हैं, जो नरेंद्र मोदी नहीं करते हैं. मोटे तौर पर कई कारण हो सकते हैं. वैचारिक कारण हो सकते हैं. नरेंद्र मोदी की नीतियों से असहमती भी एक कारण हो सकती है, लेकिन मेरी अपनी निजी राय है कि मोटे तौर पर मीडिया आज भी नरेंद्र मोदी के खिलाफ है.

एसपी और कांग्रेस के गठबंधन के समय मीडिया कवरेज को आप ध्यान से देखें तो जो माहौल मीडिया ने बनाया और वह माहौल अंत तक बनाए रखने की कोशिश हुई. मीडिया में यहा कहा जाने लगा कि एसपी और कांग्रेस का गठबंधन एक ऐसा गठबंधन जिसकी जीत सुनिश्चित है.

मीडिया ने यह जानने की कोशिश नहीं कि क्या एसपी और कांग्रेस का जो गठबंधन है उसका कोई मेल है भी या नहीं.

1989 का गठबंधन एक दिन का नहीं था

मान लीजिए 1989 में जब विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में एक ढीला-ढाला गठबंधन बना था. एक तरफ जनता दल ने बीजेपी के साथ हाथ मिलाया तो दूसरी तरफ लेफ्ट पार्टियों के साथ हाथ मिलाया. यह गठबंधन कोई एक दिन में या अचानक नहीं हुआ. इसके लिए काफी सालों से प्रयास चल रहे थे.

इस गठबंधन को बनाने के प्रयास 1987 से लेकर 1989 के बीच तक लगातार होते रहे थे. उस समय के कुछ लोगों ने पर्दे के पीछे या बाहर रह कर गठबंधन बनाने की कोशिश की.

1989 में बीजेपी और वामपंथियों में इतनी दूरी थी कि आप सोच भी नहीं सकते हैं. केवल बीजेपी और वामपंथियों में दूरी नहीं थी. बल्कि, बीजेपी और जनता दल में भी दूरी बहुत बड़ी थी.

हम आपको एक घटना से इस बात को समझाते हैं. ये 1988 के मई महीने की बात होगी. सिंधिया हाउस में राजमाता विजयराजे सिंधिया रहती थीं. भीकाजी कामा प्लेस के पास एक कॉम्प्लेक्स में खपरैल के एक मकान में राजमाता विजयराजे सिंधिया रहती थीं.

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उस समय के राजनेताओं का लक्ष्य यह था कि राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को परास्त करना है. उस समय देश में भ्रष्टाचार और बोफोर्स का मुद्दा छाया हुआ था. लेकिन विपक्ष बंटा हुआ था.

विपक्ष के बीच कोई संवाद नहीं था. वे एक-दूसरे को कोई देखना नहीं चाहता था. वैसी सूरत में रामनाथ गोयनका के प्रयास से राजमाता विजयराजे सिंधिया के घर पर 9 विपक्षी नेताओं की बैठक हुई.

इस बैठक में विश्वनाथ प्रताप सिंह, चौधरी देवीलाल, अरुण नेहरू, विद्याचरण शुक्ल, विजयराजे सिंधिया, अटलबिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, डॉ मुरली मनोहर जोशी और गोविदांचार्य शामिल हुए.

मैं उन दिनों जनता दल कवर किया करता था. मैंने मीटिंग खत्म होने के बाद गोविंद जी से बात की. गोविंदाचार्य जी से मेरा मित्रवत संबंध था. एक पत्रकार ने नाते नहीं वह मुझे मित्र के नाते पूरी बात बताते थे.

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1989 में वीपी सिंह की अगुवाई राष्ट्रीय मोर्चा गठबंधन बनाया गया

पांच घंटे चली मीटिंग में बातचीत नहीं

मैंने गोविंदाचार्य से दो सवाल पूछा. पहला कि, मीटिंग शुरू होने पर बातचीत की शुरुआत किसने की. दूसरा सवाल यह पूछा कि विश्वनाथ प्रताप सिंह और लालकृष्ण आडवाणी ने क्या कहा?

उस समय भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख व्यक्ति लालकृष्ण आडवाणी हुआ करते थे. अटल बिहारी वाजपेयी उस समय उतने प्रमुख नहीं थे. दूसरी तरफ देश में हो रहे सत्ता विरोधी आंदोलन के सबसे बड़े नेता थे विश्वनाथ प्रताप सिंह. मैंने गोविंद जी पूछा कि इन दोनो ने बैठक के दौरान क्या कहा.

गोविंद जी का जवाब था कि पांच घंटे की मीटिंग में न तो विश्वनाथ प्रताप सिंह ने एक शब्द बोला न ही लालकृष्ण आडवाणी ने एक शब्द बोला. बातचीत जो होती रही वह राजमाता विजयराजे सिंधिया, अरुण नेहरू, विद्याचरण शुक्ल और हमारे (गोविंदाचार्य) बीच में होता रहा.

इससे आप समझ सकते हैं कि दूरी कितनी थी और अंत में इस तरह की कोशिशों से साल 1989 के नवंबर में लोकसभा के चुनाव हुए. एक तरफ जनता दल या यू कहें कि नेशनल फ्रंट ने बीजेपी से समझौता किया तो दूसरी तरफ लेफ्ट से भी समझौता किया गया.

पूरे देश में एक ऐसा गठबंधन बना जो ढीला ढाला ही सही पर जिसमें कार्यकर्ताओं के मन भी एक मन वाले थे और दिशा भी एक थी.

(फ़र्स्टपोस्ट के रविशंकर सिंह के साथ बातचीत पर आधारित.)

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