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सीबीआई: लालू को सताने लौटा चारा घोटाले का बेताल

सीबीआई के नए कार्यवाहक निदेशक राकेश अस्थाना कभी लालू समर्थकों के बीच काफी मशहूर थे...

Updated On: Dec 03, 2016 10:19 AM IST

Ravishankar Singh Ravishankar Singh

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सीबीआई: लालू को सताने लौटा चारा घोटाले का बेताल

सीबीआई के कार्यवाहक निदेशक राकेश अस्थाना का नाम भले आपके दिमाग में घंटी न बजाता हो लेकिन अस्थाना एक जमाने में लालू प्रसाद यादव के समर्थकों के बीच काफी मशहूर थे.

बात है लालू यादव के 1995 में मुख्यमंत्री बनने के बाद की. सीबीआई चारा घोटाले की जांच शुरू कर चुकी थी. राकेश अस्थाना धनबाद में थे और जांच उनके हवाले थी. तब झारखंड अलग राज्य नहीं था.

जांच के सिलसिले में अस्थाना और उनके साथी अफसर पटना में लालू से पूछताछ करने पहुंचे. पर लालू यादव से पूछताछ तो दूर मुलाकात संभव नहीं हो पा रही थी.

जाहिर है कि अस्थाना पर तरह-तरह के दबाव पड़े. हथकंडे अपनाए गए. अस्थाना कोलकाता में बैठे संयुक्त निदेशक यू एन विश्वास के चहेते थे. विश्वास ने जांच की लगभग पूरी धारा लालू की संलिप्तता की ओर मोड़ दी.

किसी को समझ में नहीं आ रहा था कि बात क्या है. लालू इस कदर क्यों सामने न आने पर अड़े हुए हैं. पूरा मामला तब साफ हुआ जब किसी नेता के कहने पर बिहार सरकार के एक अफसर ने अस्थाना के एक साथी अफसर से किसी बहाने मुलाकात की.

मुलाकात से साफ हुआ कि यादव को दरअसल उनके कुछ समर्थक सीबीआई से मिलने से रोक रहे हैं. लालू के नजदीकी कुछ राष्ट्रीय जनता दल नेता बेहद डरे हुए थे.

उन्होंने सुन रखा था कि सीबीआई पूछताछ के दौरान अस्थाना पीटते हैं. अगर इतना बस होता तो गनीमत थी. इन नेताओं ने जाने कहां से यह सुन रखा था कि सीबीआई के अफसर पजामे के अंदर चूहा छोड़ देते हैं. और तो और खूब मिर्च वाला खाना खिला कर पानी नहीं देते.

जाहिर सी बात थी कि जिस अफसर ने सुना, उसने इन बातों को खारिज किया. राजद नेता को भरोसा दिलाया कि अस्थाना चाहे जितने भी सख्त अफसर हों वे किसी मुख्यमंत्री के साथ तो ऐसा करने की सोच भी नहीं सकते.

अस्थाना चाहे लालू प्रसाद यादव से कितना भी इज्जत से पेश आए हो लेकिन ये भी सच है लालू प्रसाद को चारा घोटाले में जेल का मुंह तो देखना ही पड़ा. चारा घोटाले से बिहार की राजनीति हमेशा के लिए बदल गई.

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राकेश अस्थाना (तस्वीर फेसबुक से)

वैसे अस्थाना का परिचय इतना भर नहीं है.

अस्थाना 1984 के बैच के गुजरात कैडर के अफसर हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विश्वासपात्र माने जाते हैं.

वाजपेयी सरकार आने के बाद अस्थाना गुजरात कैडर वापस चले गए और मनमोहन सिंह सरकार आने के बाद उन्हें लगा कि लालू यादव को लगा का अस्थाना रूपी बेताल का पीछा उनसे छूटा. लेकिन होनी को तो कुछ और ही मंजूर था.

रेलमंत्री रहने के दौरान सूरत के पास एक रेल दुर्घटना हुई, लालू यादव बतौर मंत्री स्पॉट पर मुआयना करने पहुंचे. लालू को इस बात का अंदाजा नहीं था कि अस्थाना वहां पुलिस कमिश्नर थे. अचानक अस्थाना को देखकर लालू यादव का पारा चढ़ गया. वे चिल्लाने लगे.

इसी बीच कुछ नवयुवकों ने बर्फ के पत्थर जैसे टुकड़े लालू पर फेंके. जाहिर है बर्फ को तो पिघलना ही था. सबूत बचने की तो कोई संभावना थी ही नहीं.

लालू घबरा गए और घटनास्थल से भागे. दिल्ली लौट कर उन्होंने आरोप लगाया कि तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी उनकी हत्या कराना चाहते हैं.

यूपीए सरकार में लालू ने हरसंभव कोशिश की जिससे वे चारा केस से बरी हो जाएं लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

कई सालों का वनवास काटने के बाद पिछले चुनावों में लालू प्रसाद यादव का समय बहुरा ही था कि अस्थाना फिर हाजिर हो गए.

चारा घोटाले की जांच अभी चल रही है और ऊपर से इस बीच मोदी की सरकार आ गई है. अस्थाना दिल्ली में अतिरिक्त निदेशक के पद पर काबिज हो गए. मोदी से नजदीकियों की वजह से सीबीआई में उनकी खासी धाक है ही.

अब प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और नेता विपक्ष की कमिटी ने सीबीआई चीफ की नियुक्ति नहीं की बल्कि अस्थाना को अप्रत्याशित रूप से कार्यवाहक निदेशक बना दिया गया.

हाल के दिनों में यह अभूतपूर्व कदम है. अस्थाना वरिष्ठता क्रम में काफी नीचे हैं.

पूर्णकालिक निदेशक की नियुक्ति न होना असाधारण है पर राजनैतिक दलों की चुप्पी उससे ज्यादा चौंकाने वाली है.

आखिरकार सरकार को सीबीआई निदेशक नियुक्त करने के लिए किस वक्त का इंतजार है?

साफतौर पर सीबीआई का निदेशक एक महत्वपूर्ण पद है. कई राजनेताओं की जांच इस एजेंसी के दायरे में है. मसलन मुलायम सिंह यादव, मायावती, ममता बनर्जी और लालू यादव.

निदेशक का चुनाव जब भी हो पर एक बात वो साफ है कि अस्थाना का बैताल लालू पर एक बार फिर सवार हो गया.

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