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तमिलनाडु में जयललिता की जगह लेने आ रहे हैं रजनीकांत!

सियासत के मैदान में रजनीकांत के उतरने के तमिलनाडु के लिए क्या मायने निकलते हैं? चाहे वे कामयाब रहें या नाकाम, सियासत के मैदान में उनका आना किसी बुलबुले की तरह नहीं, वह बड़ी हिलोर पैदा करेगा

T S Sudhir Updated On: Jan 01, 2018 10:01 AM IST

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तमिलनाडु में जयललिता की जगह लेने आ रहे हैं रजनीकांत!

इशारे 2016 में रिलीज हुई फिल्म कबाली से ही मिल गए थे. इस फिल्म में उस्तादों के उस्ताद यानी डॉन कबाली की भूमिका में रजनीकांत एक विलेन (खलनायक) की हेकड़ी दुरुस्त करने के बाद उससे उसके बॉस को संदेश देने को कहते हैं:

'नान वंथुतेनू सोल्लू. थिरुम्बी वंथुतेनू. 25 वर्षथुकू मुन्नाडी इप्पाडी कबाली अप्पाडिए थिरुम्बी वंथुतान्नू सोलू (जाओ, जाकर उनलोगों से कह दो कि मैं लौट आया हूं और मैं वैसा ही हूं जैसा 25 साल पहले जाते वक्त था).'

जयललिता से मुकाबला

आइए, पीछे लौटते हैं, 1992 के साल में. उन दिनों रजनीकांत पोस गार्डन में तब की मुख्यमंत्री जे. जयललिता के पड़ोसी थे. एक पुलिसिए ने उन्हें इलाके में गाड़ी चलाने से रोका. द नेम इज रजनीकांत नाम की जीवनी में लेखिका गायत्री श्रीकांत ने इस वाकये का जिक्र करते हुए लिखा है कि एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने रजनीकांत से कहा कि आपको 30 मिनट तक रुकना होगा. जब तक मुख्यमंत्री की गाड़ियों का काफिला इलाके से गुजर नहीं जाता किसी को जाने नहीं दिया जाएगा.

रजनीकांत कार से उतरे, एक गुमटी (छोटी सी दुकान) पर गए, सिगरेट का पैक खरीदा, एक लैंपपोस्ट पर टेक लगाते हुए सिगरेट सुलगाई. इतने ही वक्त में डॉ. राधाकृष्णन रोड पर मौजूद लोग उनके चारों तरफ जमा हो गए और हिफाजती इंतजाम में लगी पुलिस के लिए और भी ज्यादा मुश्किल खड़ी हो गई.

जब घबड़ाए हुए पुलिसिए ने उनसे कहा कि आप अपनी गाड़ी बढ़ा लीजिए तो रजनीकांत का जवाब था 'सर, मैं इंतजार कर रहा हूं कि मुख्यमंत्री का काफिला गुजर जाए. मुझे इंतजार करने में कोई परेशानी नहीं है.'

साल 2017 के आखिर दिन इसी अंदाज में तमिल सुपरस्टार ने वापसी की है. हां, सिर के बाल कुछ कम हो गए हैं और दाढ़ी पक गई है. और जैसा कि उन्होंने कबाली के संवाद में कहा था, सचमुच उनकी वापसी 25 साल बाद हुई है.

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नए 'थेलापति' रजनीकांत

सियासत के मैदान में रजनीकांत के उतरने के तमिलनाडु के लिए क्या मायने निकलते हैं? चाहे वे कामयाब रहें या नाकाम, सियासत के मैदान में उनका आना किसी बुलबुले की तरह नहीं, वह बड़ी हिलोर पैदा करेगा. और इसकी वजह भी है, रजनीकांत जयललिता के वक्त के गुजर जाने के बाद मैदान में उतरे हैं यानी एक ऐसे समय में जब सूबे में सियासी तौर पर एक खला (शून्य) मौजूद है. इसमें इतना और जोड़ लें कि करुणानिधि की तबियत खराब चल रही है और एम के स्टालिन मतदाताओं को लुभाने में नाकाम हैं (आरके नगर सीट पर उपचुनाव हुए तो डीएमके को जमानत तक गंवानी पड़ी). चेन्नई में मजाक चल रहा है कि ‘थेलापति” स्टालिन की जगह रील-लाइफ के ‘थेलापति’ रजनीकांत लेने वाले हैं. (थेलापति का अर्थ होता है सेनापति. इस नाम से 1991 में मणिरत्नम ने फिल्म बनायी थी. फिल्म में रजनीकांत मुख्य भूमिका में थे)

रजनीकांत के प्रशंसक जश्न मनाते हुए. (पीटीआई)

रजनीकांत के प्रशंसक जश्न मनाते हुए. (पीटीआई)

सत्ताधारी एआईएडीएमके के भीतर बगावती तेवर अपनाने वाले टीटीवी दीनाकरण के साथ कलह चल रही है, दीनाकरण पार्टी के भीतर सत्ता के एक अलग छोर बनकर उभरे हैं. ऐसे में 2017 का पूरा साल एआईएडीएमके भीतर अंदरुनी कलह में गुजरा है, प्रशासन का मामला पीछे हो गया है. अभिनेता से नेता बने रजनीकांत का स्वागत इसी कारण जोर-शोर से हो रहा है, लोगों को उनके भीतर उम्मीद की किरण नजर आ रही है.

हालांकि तमिलनाडु की सियासत पर दो द्रविड़ पार्टियां का दबदबा है लेकिन इसका मतलब यह कत्तई नहीं कि सूबे में किसी तीसरी पार्टी के लिए गुंजाइश ही नहीं है. एक दशक पहले एक्टर विजयकांत ने सूबे की सियासत में कदम रखा था और उन्हें 2006 के विधानसभा चुनावों में जयललिता और करुणानिधि के मैदान में होते कुल 10 फीसदी वोट मिले थे. लेकिन विजयकांत अपने बुनियादी जनाधार को देर तक थामे नहीं रह सके और इसी कारण वे अपनी बढ़त गंवा बैठे. रजनीकांत किसी भी पैमाने पर उनसे बड़े स्टार हैं और विजयकांत की तुलना में लोगों में उनकी अपील भी ज्यादा है.

रजनीकांत की छवि करेगी मदद

रजनीकांत को तमिलनाडु में तकरीबन देवता-सरीखा माना जाता है. और यह बात एकदम तय है कि उन्होंने जनसंपर्क अभियान चलाया, मिसाल के लिए पदयात्रा जैसा कोई कार्यक्रम बनाया तो लोग उनसे जुड़ेंगे. एक ब्रांड के तौर पर तमिलनाडु में रजनीकांत के नाम का समझिए कि सिक्का चलता है. लोगों में रजनीकांत को लेकर सदभाव है और लोग रजनीकांत के प्रभामंडल को उनकी सादगी के विस्तार के तौर पर देखते हैं. अगर उन्होंने पार्टी बनाकर उसे पटरी पर दौड़ाए रखा तो फिर चाहे वे राजा बनकर ना उभरें लेकिन बाकी महारथियों के रथ का चक्का जाम करने से उन्हें कोई नहीं रोक सकता.

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लेकिन अभी जो नजर आ रहा है वह मीडिया का रचा हुआ जादू है. शुक्रवार के दिन रिलीज होने वाली रजनीकांत की फिल्मों पर होने वाली चर्चा से ज्यादा इसे नहीं माना जा सकता. रविवार के दिन चेन्नई के राघवेन्द्र कल्याण मंडपम् में जो लोग जुटे थे, उनमें से ज्यादातर सुपरस्टार रजनीकांत के मोहपाश में बंधकर अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे थे, उनके मन में रील-लाइफ के रजनीकांत और रियल-लाइफ के रजनीकांत का फर्क गड्मड्ड हो गया था. लेकिन शुरुआती आतिशबाजी से पैदा गुब्बार जब थमेगा तो रजनीकांत को विवादास्पद मुद्दे पर अपना मत स्पष्ट करना पड़ेगा. अभी तमिलनाडु समेत पूरे भारत में लोगों को नहीं पता कि किस विवादास्पद मुद्दे पर रजनीकांत की क्या सोच है.

अपनी राजनीतिक एंट्री की घोषणा करते हुए रजनीकांत. (पीटीआई)

अपनी राजनीतिक एंट्री की घोषणा करते हुए रजनीकांत. (पीटीआई)

'बाहरी आदमी' से सवाल

रजनीकांत को ‘बाहरी आदमी’ के ठप्पे से भी निपटना होगा. रजनीकांत का जन्म कर्नाटक में हुआ है और इस नाते अभी ही उनसे यह सवाल पूछा जा रहा है कि कावेरी जल-विवाद पर आपका क्या रुख है. ऐसे सवाल पूछने वाले लकीर के फकीर नेताओं को यह बात समझनी होगी कि वे जितनी बारीक नुक्ताचीनी करेंगे रजनीकांत को उतनी ही अहमियत मिलती जाएगी और मोल-तोल करने की रजनीकांत की ताकत बढ़ती जाएगी.

रजनीकांत के प्रशंसकों की जश्न की तस्वीरों को देखकर आपको ऐसा लग सकता है मानो तमिलनाडु को कोई नया मुख्यमंत्री मिलने जा रहा है. रजनीकांत ने रविवार को दावा किया कि अगर मैं चाहता तो 1996 में मुख्यमंत्री की गद्दी हासिल कर सकता था. उस वक्त रजनीकांत ने जयललिता की सरकार की निन्दा की थी और डीएमके की सत्ता में वापसी की राह खुली थी.

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यह बड़ी दिलचस्प बात है क्योंकि गायत्री श्रीकांत की लिखी जीवनी (रजनीकांत की) में जिक्र आता है कि रजनीकांत और उनकी पत्नी लता ने जे. जयललिता के 1991 में मुख्यमंत्री बनने पर उनसे भेंट की थी. उस वक्त एक खुफिया अधिकारी जयललिता के कान में फुसफुसाया था कि ‘इस आदमी से सावधान रहिए, यह एक दिन मुख्यमंत्री बनना चाहता है.’

माना जाता है, उस वक्त जयललिता ने खुफिया अधिकारी से कहा था, 'क्या सचमुच ऐसी बात है? मुझे तो यह आदमी ऐसा नहीं लगता.' वह खुफिया अधिकारी आज जरूर मन ही मन मुस्कुरा रहा होगा कि उसकी बात आखिर को सच निकली.

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