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दो अलग विचारधारा वाले रजनीकांत और कमल हासन की राजनीतिक दोस्ती की गुंजाइश कम है

ऐसी कतई उम्मीद नहीं कि रजनीकांत मुख्यमंत्री से कम पर मानेंगे. रजनी अधीर हैं लेकिन कमल लंबी पारी के लिए एजेंडे बना रहे हैं

Updated On: Jan 18, 2018 01:57 PM IST

K Nageshwar

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दो अलग विचारधारा वाले रजनीकांत और कमल हासन की राजनीतिक दोस्ती की गुंजाइश कम है

रजनीकांत के राजनीति में प्रवेश के औपचारिक ऐलान के फौरन बाद ही कमल हासन अपने मित्र से भी एक कदम आगे बढ़ते हुए खुद की राजनीतिक पार्टी लांच करते हुए सीधे एक्शन में आ गए. जबकि रजनी अभी राजनीतिक पहल के लिए अगले विधानसभा चुनाव का इंतजार कर रहे हैं, कमल राजनीति के मैदान में छलांग मारकर ज्यादा तेजी से खुलकर खेल रहे हैं.

तमिल सिनेमा के दो सितारों की साथ-साथ एंट्री ने राजनीतिक पंडिताई को चटखारेदार बना दिया है. इस तरह राजनीति में इन दो नवागंतुक ब्रांड्स के स्टाइल, तरीके और क्षमता की तुलना भी जरूर होगी.

रजनीकांत के पास प्रशंसकों का ज्यादा बड़ा आधार है. वास्तव में उनके फैन क्लब पूरे तमिलनाडु राज्य में काम करते हैं, जिससे उन्हें ज्यादा टिकाऊ बुनियादी ढांचा मिलता है. दूसरी तरफ कमल, रजनी के करिश्मे और फैन सपोर्ट का मुकाबला नहीं कर सकते, हालांकि उनकी अपनी लोकप्रियता को कम करके नहीं आंका जा सकता.

रजनी की 'आध्यात्मिक राजनीति'

द्रविण स्टाइल की राजनीति के उलट रजनीकांत आध्यात्मिक राजनीति का अनुसरण करते हैं और धार्मिक अपील का सहारा लेते हैं. जबकि कमल द्रविण सामाजिक और सांस्कृतिक मान्यताओं की भट्ठी में तपकर निकले हुए लगते हैं. रजनीकांत की स्व-घोषित ‘आध्यात्मिक राजनीति’ स्पष्ट नहीं है. किसी राजनीतिक शब्दकोश में कभी भी आध्यात्मिक राजनीति की व्याख्या नहीं की गई है कि इसका ठीक-ठीक क्या अर्थ है. हालांकि इसकी तरह-तरह की व्याख्याएं दी जा रही हैं, क्योंकि इसका प्रतिपादन करने वाले तो एकदम खामोश हैं. रजनी ने खुद को द्रविड़ विचारधारा की राजनीति से साफ तौर पर अलग कर लिया है. राजनीतिक विश्लेषकों के लिए यह अंदाजा लगाना एक दुस्वप्न है कि क्या तमिलनाडु के लोग द्रविड़ राजनीति से प्रस्थान, जो कि दशकों से राज्य की राजनीतिक विचारधारा को प्रभावित करती रही है, को स्वीकार करेंगे या खारिज कर देंगे.

कमल की द्रविण राजनीति

इसके उलट कमल हासन नास्तिक हैं और किसी भी राजनीतिक-धार्मिक घालमेल को खारिज कर देते हैं. वह द्रविण विचारधारा का पोषण करते हैं. जल्लीकट्टू आंदोलन में एक तरह से वह तमिल अभिव्यक्ति के प्रवक्ता ही थे.

आध्यात्मिक राजनीति की एक स्वाभाविक व्याख्या रजनी की बीजेपी से नजदीकी हो सकती है. तमिलनाडु बीजेपी नेतृत्व के बार-बार के दावे से रजनी की पार्टी और भगवा ब्रिगेड में ऐसे याराने की पुष्टि होती है. इसके उलट कमल राजनीतिक विचारधारा के बिल्कुल दूसरे छोर पर हैं. उन्होंने पहले ही साफ कर दिया है कि उनका रंग निश्चित रूप से भगवा नहीं होगा और उन्होंने वाम नेताओं के प्रति सार्वजनिक रूप से अपनी श्रद्धा जाहिर की. अगर यह तुलना सही साबित होती है तो रजनी और कमल निश्चित रूप से राजनीतिक वर्ग विभाजन में एक दूसरे के विपरीत ध्रुवों पर खड़े होंगे.

अपनी राजनीतिक एंट्री की घोषणा करते हुए रजनीकांत. (पीटीआई)

अपनी राजनीतिक एंट्री की घोषणा करते हुए रजनीकांत. (पीटीआई)

रजनी अधीर, लेकिन कमल के पास एजेंडा

ऐसी कतई उम्मीद नहीं कि रजनीकांत मुख्यमंत्री से कम पर मानेंगे. उनका कद और स्टाइल उन्हें राजनीति में भी सुपरस्टार से कम पर समझौता करने की इजाजत नहीं देता. इस तरह रजनी अधीर हैं और लंबी पारी खेलने के लिए तैयार नहीं हैं. लेकिन कमल पांच दिनी मैच टेस्ट मैच खेलने के लिए ज्यादा तैयार हैं, भले ही उनके मित्र सीमित ओवर का मैच खेलना चाहते हैं.

रजनी की राजनीतिक अभिधारणा ना सिर्फ संदिग्ध है, बल्कि सिर्फ उनको सत्ता की कुर्सी पर बिठाने पर केंद्रित है. लेकिन, कमल तमिल राजनीति और समाज के लिए एजेंडा तय करने की तैयारी में हैं.

रजनीकांत ने हमेशा राजनीति और विवादों से दूरी बनाए रखी. सिर्फ एक मौके को छोड़कर जब उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से डीएमके के प्रति समर्थन जताया था, रजनी हमेशा द्वंद्व में फंसे रहे. लेकिन, कमल निश्चित रूप से निर्णायक और योजनाबद्ध हैं. रजनी ने सामाजिक, राजनीतिक विवादों से हमेशा दूरी बनाए रखी, जबकि कमल राज्य और समाज को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर सक्रिय भागीदारी के लिए जाने जाते हैं.

Kamal-Haasan

कौन है लंबी रेस का घोड़ा?

अपने बेजोड़ करिश्मे के बावजूद, यह तथ्य कायम है कि रजनीकांत एक बाहरी शख्स हैं. यह बात भले ही एक ऐसे राज्य में ज्यादा मायने ना रखती हो जिसने एमजी रामचंद्रन और जयलिता को अपनाया. लेकिन तमिल दलों ने उनकी गैर-तमिल पृष्ठभूमि को लेकर तूफान खड़ा कर दिया है. ये विघ्नकारी उनके राजनीति में प्रवेश के बाद और भी परेशान करेंगे. जबकि कमल तमिलनाडु में स्थानीय बाशिंदे हैं.

कमल एक बुद्धिजीवी हैं और उन्हें मुद्दों की गंभीर समझ के लिए जाना जाता है. वह तमिल में प्रभावशाली वक्ता हैं. रजनीकांत ने कभी ऐसी किसी क्षमता का प्रदर्शन नहीं किया है. लेकिन उनके स्टाइल और लोकप्रियता का कोई मुकाबला नहीं है, ना सिर्फ तमिलनाडु में बल्कि और भी जगहों पर. अपने विशाल फैंस की संख्या को देखते हुए रजनीकांत अकेले ही दम पर चुनाव लड़ सकते हैं, हालांकि ऐसी चर्चाएं हैं कि वह बीजेपी के साथ चुनाव बाद समझौता कर लेंगे. लेकिन विजयकांत का हश्र देखते हुए जो आठ-नौ फीसद वोट हासिल कर पाए, और फिर हाशिए पर चले गए, कमल असर पैदा करने के लिए शायद अपने जैसे विचार वाले दलों के साथ हाथ मिलाएंगे.

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