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राजस्थान: सरकार बदलने के साथ बदलेगा सिलेबस और साइकिलों का रंग

कांग्रेस को सरकारी स्कूलों की बदली गई यूनिफॉर्म में भी भगवा रंग नजर आ रहा है. इसके अलावा, छात्रों को बांटी जाने वाली साइकिलें भी भगवा रंग की ठहराई गई हैं

Updated On: Dec 30, 2018 07:42 PM IST

Mahendra Saini
स्वतंत्र पत्रकार

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राजस्थान: सरकार बदलने के साथ बदलेगा सिलेबस और साइकिलों का रंग

1857 में स्वतंत्रता की पहली क्रांति के असफल रहने की इतिहासकारों ने एक वजह ये भी बताई थी कि इसमें नेतृत्व बहादुर शाह जफर जैसे बूढ़े राजाओं के पास था. अंदेशा जताया गया था कि क्रांति अगर सफल हो जाती तो भारत में एक बार फिर पुरातनपंथी राजतंत्रीय व्यवस्था कायम हो जाती. हो सकता था कि भारत को प्रगतिशील राष्ट्र बनने में और ज्यादा समय लगता.

सरकारी नीतियों के जरिए राज्य को प्रगति के पथ पर ले जाने या पीछे धकेलने की चर्चा आजकल राजस्थान में भी जोरों से चल रही है. नई बनी कांग्रेस सरकार ने जो शुरुआती फैसले किए हैं, उनमें से कई आगे की ओर ले जाने के बजाए पीछे ले जाने वाले दिखाई देते हैं. राजनीतिक गलियारों में भले ही समर्थक इनका स्वागत करें लेकिन पढ़े-लिखे वर्गों में इनको लेकर सुखद प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिल रही है.

'अनपढ़' फिर से बनेंगे सरपंच-चेयरमैन

2011 की साक्षरता दर में राजस्थान काफी राज्यों से पीछे है. महिला साक्षरता में तो ये सिर्फ बिहार से ऊपर है. इसके बावजूद, 2015 में राजस्थान देश का पहला राज्य बना जिसने चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम पढ़ाई की योग्यता निर्धारित की. तब की बीजेपी सरकार ने राजस्थान पंचायतीराज अधिनियम, 1994 में संशोधन कर पंचायतों में चुनाव लड़ने के लिए 8वीं और नगरपालिकाओं में चुनाव लड़ने के लिए 10वीं तक शिक्षित होना अनिवार्य किया. हालांकि इसमें महिलाओं और आरक्षित वर्गों के लिए कुछ छूट थी.

फाइल फोटो

फाइल फोटो

इस पर तब काफी बवाल हुआ था. मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था. कांग्रेस ने इसे चुनाव लड़ने के लोकतांत्रिक अधिकार का हनन बताया था. तब बीजेपी सरकार ने लोगों को 60 साल के राज के बावजूद साक्षर तक न बना पाने पर कांग्रेस की कड़ी आलोचना भी की थी. इसके अलावा, घर में टॉयलेट और बकाया बिजली बिलों के भुगतान को भी चुनाव लड़ने की न्यूनतम योग्यताओं में शामिल किया गया था.

अब नई आई कांग्रेस सरकार ने इस कानून को पलटने का फैसला किया है. कैबिनेट बैठक में तय किया गया कि राजे सरकार के किए गए संशोधनों को वापस ले लिया जाए. यानी एक बार फिर से निरक्षर या अनपढ़ लोग पंचायती राज संस्थाओं के मुखिया बन सकेंगे. गहलोत सरकार ने नगरपालिका/नगर निगमों के चेयरमैन और मेयर के चुनाव भी सीधे कराने का फैसला किया है.

चुनाव लड़ने की न्यूनतम शैक्षिक योग्यता ने कई पुराने दिग्गजों को घर बैठने पर मजबूर कर दिया था. शायद उन्ही के दबाव में सरकार ने ये फैसला किया हो. हालांकि कई जीते हुए नेताओं पर फर्जी सर्टिफिकेट्स बनवाने के आरोप भी लगे. लेकिन ये भी सच है कि न्यूनतम शैक्षिक योग्यता ने कई बुजुर्ग नेताओं को स्कूल का रास्ता दिखा दिया था.

स्कूली सिलेबस में भी होगा बदलाव!

गहलोत कैबिनेट ने स्कूलों में भी व्यापक बदलाव का फैसला किया है. शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा ने कहा है कि बीजेपी सरकार ने शिक्षा का काफी बड़े स्तर पर भगवाकरण कर दिया था. जिसे अब सुधारा जाएगा. और ये सुधार क्या होंगे, जरा इन पर नज़र डालिए.

कांग्रेस की नजर में स्कूली सिलेबस में वीर सावरकर, हकीकत राय, गुरु गोलवलकर जैसे हिंदुत्ववादी और आरएसएस विचारधारा के नेताओं को सिलेबस में शामिल कर दिया था. इनके चैप्टर अब हटाए जाएंगे. भगवाकरण से मुक्ति के लिए इतिहासकारों की समिति बनाई जाएगी. ये समिति बीजेपी सरकार के किए बदलावों पर विचार करेगी.

कांग्रेस का आरोप है कि सिलेबस में महात्मा गांधी और पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के योगदान को संघ विचारकों की कीमत पर कम कर दिया गया था. कांग्रेस को इसपर भी आपत्ति है कि 11वीं की किताब में उसे अंग्रेजों की पोषित संतान के रूप में लिखा गया है. उदयपुर के प्रोफेसर चंद्र शेखर शर्मा के गहन शोध के आधार पर हल्दीघाटी युद्ध के नतीजे को भी बदल दिया गया था. शायद अब इसे भी पुराने रूप में ही पढ़ाया जाए.

कांग्रेस को सरकारी स्कूलों की बदली गई यूनिफॉर्म में भी भगवा रंग नजर आ रहा है. इसके अलावा, छात्रों को बांटी जाने वाली साइकिलें भी भगवा रंग की ठहराई गई हैं. इन्हें भी बदलने पर विचार किया जाएगा. स्कूलों में अनिवार्य किए गए सूर्य नमस्कार को हटाने पर भी विचार किया जा रहा है.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

दीन दयाल उपाध्याय पर भी गिरी गाज

सरकारी लेटरहेड से अब जनसंघ के पूर्व अध्यक्ष और अंत्योदय चिंतक दीन दयाल उपाध्याय का फोटो हटाने का फैसला किया गया है. राजे सरकार ने पिछले दिसंबर में ही उपाध्याय के लोगों को छापने के आदेश जारी किए थे. वैसे सरकारी पट्टों, भामाशाह कार्ड, स्वास्थ्य बीमा सर्टिफिकेट जैसे कई सरकारी दस्तावेजों पर वसुंधरा राजे की फोटो भी छापी जा रही थी. अब ये सभी हट जाएंगे.

कांग्रेस सरकार ने कैबिनेट की पहली बैठक में कई और अहम फैसले किए हैं. पार्टी के घोषणा पत्र को सरकार के नीतिगत दस्तावेज के रूप में ग्रहण किया गया है. मुख्य सचिव को घोषणा पत्र में किए वादों को समयबद्ध रूप में पूरा करने के लिए कहा गया है. कांग्रेस अध्यक्ष के ड्रीम प्रोजेक्ट मनरेगा और लोक सेवा गारंटी कानून-2011, सुनवाई का अधिकार कानून, 2012 जैसे अशोक गहलोत के शुरू किए नवाचारों को भी और ज्यादा प्रभावी बनाने का फैसला किया गया है.

इसमें कोई दो राय नहीं कि हर पार्टी सत्ता में आने के बाद अपने ऐजेंडे को लागू करती है, लेकिन राजस्थान जैसे पिछड़े राज्य में ये जनता के धन की कीमत पर नहीं किया जाना चाहिए. बीजेपी ने कथित रूप से अपना एजेंडा लागू करने के लिए सार्वजनिक धन का इस्तेमाल किया. अब कांग्रेस उनमें फेरबदल करने के लिए एकबार फिर जनता के रुपए का इस्तेमाल करेगी.

ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि नाम या फोटो बदलने के बजाए राजनीतिक दल जनता के वास्तविक विकास का रोडमैप तैयार करें. फिर विरोध के नाम पर नीतियों में विरोधाभास भी कहां तक उचित है. उत्तर प्रदेश में नाम बदलने का कांग्रेस विरोध करे लेकिन राजस्थान में सत्ता मिलते ही वैसे ही काम करना क्या सही नीति है?

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