S M L

राजस्थान: बीजेपी के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं बागी नेता

राज्य की 50 से अधिक सीटों के परिणाम राजपूत मतदाता प्रभावित करते हैं ऐसे में मानवेंद्र और अन्य राजपूत नेताओं की नाराजगी बीजेपी को भारी पड़ सकती है

Updated On: Oct 01, 2018 03:35 PM IST

Bhasha

0
राजस्थान: बीजेपी के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं बागी नेता

पिछले पांच सालों में किए गए विकास कार्यों के दम पर राजस्थान की सत्ता में फिर से वापसी का दावा कर रही बीजेपी के लिए राहें उतनी आसान नहीं होंगी क्योंकि मानवेंद्र सिंह, घनश्याम तिवाड़ी, हनुमान बेनीवाल और किरोड़ी सिंह बैंसला जैसे बागी नेता उसकी जीत के रास्ते में बड़ा रोड़ा बन सकते हैं.

बीजेपी समर्थकों को भी डर है कि बागी हुए ये नेता आने वाले विधानसभा चुनाव में राजनीतिक समीकरण बिगाड़ सकते हैं और पार्टी को नुकसान पहुंचा सकते हैं. हालांकि राज्य में पार्टी के नेताओं को ऐसा नहीं लगता.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि चाहे राजपूत हों या गुर्जर, ब्राह्मण हों या जाट, राजस्थान की सियासत में अहम माने जाने वाला शायद ही कोई समुदाय है जिसमें बीजेपी के बागी नहीं हैं. विशेषकर पार्टी के प्रदेश नेतृत्व से नाराजगी के कारण इन समुदायों के कई बड़े नेता बगावती तेवर अख्तियार कर चुके हैं.

बीजेपी को क्यों भारी पड़ सकती है मानवेंद्र सिंह की नाराजगी?

सत्ताधारी बीजेपी के बागी नेताओं की फेहरिस्त में सबसे नया नाम राजपूत समुदाय के मानवेंद्र सिंह जसोल का है. पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह के बेटे और शिव से विधायक मानवेंद्र ने इसी महीने पार्टी छोड़ दी. ‘राजपूतों के स्वाभिमान’ को मुद्दा बनाकर बीजेपी से अलग हुए मानवेंद्र लोकसभा चुनाव लड़ सकते हैं जबकि उनकी पत्नी विधानसभा चुनाव में शिव से ताल ठोक सकती हैं.

राजपूत समुदाय बीजेपी का पारंपरिक वोट बैंक माना जाता है. भैरोंसिंह शेखावत इस समुदाय का बड़ा नाम हैं, जो दो बार मुख्यमंत्री बने और इस समुदाय के वोटरों को पार्टी से जोड़ने में बड़ी भूमिका निभाई. राज्य की 50 से अधिक सीटों के परिणाम राजपूत मतदाता प्रभावित करते हैं ऐसे में मानवेंद्र और अन्य राजपूत नेताओं की नाराजगी बीजेपी को भारी पड़ सकती है.

vasundhara raje 3

इसी तरह, छह बार से विधायक घनश्याम तिवाड़ी ने भी बीजेपी के लिए मुश्किलें पैदा की हुई हैं. आरएसएस विचारक, ब्राह्मण नेता और लंबे समय तक बीजेपी से जुड़े रहे तिवाड़ी ने पार्टी से किनारा कर भारत वाहिनी पार्टी बना ली है. उन्होंने खुद सांगानेर से चुनाव लड़ने की घोषणा की है जबकि उनकी पार्टी हनुमान बेनीवाल जैसे अन्य बागियों से मिलकर ‘बीजेपी सरकार के कुशासन से लड़ना चाहती है.’ राज्य के सवर्ण मतदाताओं में सबसे बड़ा हिस्सा ब्राह्मणों का है, लेकिन देखना यह है कि इनमें से कितनों को तिवाड़ी और उनके सहयोगी तोड़ पाते हैं.

साल 2008 में बीजेपी के टिकट पर खींवसर से विधायक चुने गए हनुमान बेनीवाल भी बागी हो गए हैं. प्रदेश नेतृत्व से मतभेदों के चलते वह भी पार्टी छोड़ चुके हैं. वह नागौर और शेखावटी के कई जाट बहुल जिलों में बीजेपी का खेल बिगाड़ सकते हैं. विधानसभा चुनाव में बीजेपी के वोट बैंक पर बागियों के असर के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा,‘हम बीजेपी को राज्य में तीसरे नंबर पर धकेल देंगे.’ बीजेपी से बागी हुए लोगों में किरोड़ी लाल मीणा भी एक बड़ा नाम हैं. हालांकि, पार्टी उन्हें मनाने में सफल रही और वह वापस आ गए.

क्या बागी नेताओं को साधने में कामयाब हो पाएगी बीजोपी?

इसी तरह, किरोड़ी सिंह बैंसला के तेवर भी बागी हो चले हैं. साल 2008 में गुर्जर सहित पांच जातियों को रोजगार और शिक्षा में आरक्षण की मांग को लेकर चर्चा में आए इस गुर्जर नेता ने आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर अपने पत्ते नहीं खोले हैं. लेकिन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से उनके रिश्ते अच्छे नहीं माने जा रहे. पिछले विधानसभा चुनाव में एक दर्जन से अधिक गुर्जर विधायक बने थे.

बैंसला ने हाल ही में भरतपुर संभाग में मुख्यमंत्री राजे की गौरव यात्रा बाधित करने की धमकी दी थी. हालांकि तभी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के निधन के कारण यात्रा का वह चरण रद्द हो गया. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में बागी नेताओं को साधना बीजेपी के लिए टेढ़ी खीर होगा. हालांकि शहरी विकास और आवासीय मंत्री श्रीचंद कृपलानी इससे इत्तेफाक नहीं रखते. उनका कहना है कि, ‘बीजेपी कार्यकर्ताओं की पार्टी है नेताओं की नहीं. यहां नेता महत्व नहीं रखते और इस तरह जाने वालों (बागियों) से पार्टी पर कोई असर नहीं होगा.’

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
#MeToo पर Neha Dhupia

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi