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राजस्थान विधानसभा चुनाव 2018: खरगोश और कछुए की कहानी में कछुआ बनकर उभरे हैं पायलट

राजस्थान चुनाव के लिए आ रहा हर सर्वे पायलट को मतदाताओं की पहली पसंद बता रहा है. माना जा रहा है कि उनकी लोकप्रियता मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और अपने ही साथी, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से ज्यादा है

Updated On: Nov 03, 2018 07:32 AM IST

FP Politics

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राजस्थान विधानसभा चुनाव 2018: खरगोश और कछुए की कहानी में कछुआ बनकर उभरे हैं पायलट
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राजस्थान की राजनीति में सचिन पायलट का उभरना एक बार फिर खरगोश और कछुए की कहानी के सिद्धांत को साबित करता है. चार साल तक उन्होंने चुपचाप, आराम से, लगातार जमीनी स्तर पर काम किया. उसके बाद अचानक राज्य के मुख्यमंत्री पद के दावेदार बनकर खड़े हुए.

राजस्थान चुनाव के लिए आ रहा हर सर्वे पायलट को मतदाताओं की पहली पसंद बता रहा है. माना जा रहा है कि उनकी लोकप्रियता मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और अपने ही साथी, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से ज्यादा है. ये दोनों ही राजस्थान राजनीति के स्तंभ माने जाते हैं.

चार साल पहले, जब वो अजमेर से लोक सभा चुनाव हारे थे, तो किसी ने उम्मीद नहीं की थी कि राजनीति में पायलट का ऐसा उभार आएगा. उन्हें कुल मिलाकर दिल्ली के नेता के तौर पर देखा गया, जिसका जमीनी स्तर पर ज्यादा असर नहीं था. जाति के गणित पर राजनीति को देखने पर भी उन्हें नुकसान ही दिख रहा था. उनका गुर्जर जाति का आधार ज्यादा वोट में तब्दील नहीं हो रहा था, क्योंकि इस समुदाय का मतदाता के तौर पर असर कम है.

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पायलट के राजस्थान में उभार की कई वजहें हैं

पार्टी के भीतर सचिन पायलट को गहलोत और पूर्व केंद्रीय मंत्री सीपी जोशी से मुकाबला करना था, जो राहुल गांधी के भरोसेमंद सिपहसालार और रणनीतिज्ञ माने जाते थे. बाहरी दुनिया में उन्हें अपने ऊपर लगे लेबल से मुकाबला करना था, जिसमें उन्हें पैराट्रूपर यानी आसमान से सीधे उतरने वाला हवाई नेता और वंशवादी राजनीति से फायदा लेने वाला माना गया. लेकिन ओपिनियन पोल और मैदान पर चर्चाओं से ऐसा लगता है कि सारी बाधाएं उन्होंने पार कर ली हैं. बल्कि अपनी कुछ कमियां मानी जाने वाली चीजों को ही उन्होंने अपनी ताकत बना लिया है.

कांग्रेस के पूर्व विधायक संयम लोढ़ा कहते हैं कि पायलट के राजस्थान में उभार की कई वजह हैं. पहली, उन्हें राज्य कांग्रेस प्रमुख के तौर पर लंबा वक्त मिला, लगभग पांच साल. इससे उन्हें अपना नेटवर्क विकसित करने और कांग्रेस के चेहरे के तौर पर लोगों से जुड़ने में आसानी हुई. दूसरा, अपने इस कार्यकाल में उन्होंने जमकर यात्रा की और पार्टी को खड़ा करने की कोशिश की. तीसरा, उन्हें सौम्य, संयमित और करिश्माई व्यक्तित्व वाला शख्स माना गया. लोढ़ा कहते हैं, ‘उनके जैसे युवा वोटर उन्हें आधुनिक और प्रगतिशील सोच वाला मानते हैं.’

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पायलट की जाति भी उनके लिए फायदेमंद साबित हुई. वो गुर्जर हैं. राजस्थान में ताकतवर जातियां, जैसे जाट, राजपूत और ब्राह्मण उन्हें तटस्थ मानते हैं. गहलोत की तरह नहीं, जहां जाट उन्हें स्वीकार नहीं करते. पायलट उन जातियों और समुदायों में भी मान्य हैं, जो पावर का बड़ा हिस्सा लेने के लिए आपस में लड़ती हैं.

कांग्रेस के पूर्व विधायक प्रताप सिंह खाचरियावास कहते हैं कि पायलट का लगातार उभार और स्वीकार्यता दिखाती है कि वोर्टस अब जाति और समुदाय की राजनीति से ऊपर उठ रहे हैं. खासतौर पर शहरी क्षेत्रों में. खाचरियावास के अंकल भैरों सिंह शेखावत राजस्थान राजनीति के दिग्गजों में गिने जाते हैं. खाचरियावास कहते हैं, ‘राजे के ढलान ने राज्य में खालीपन ला दिया था. पायलट ने राजे को मैदान पर लगातार चुनौती देते हुए खुद को विल्क के रूप में स्थापित किया है. वोटर उनके संघर्ष को याद करते हैं.’

लगातार बढ़ते इन कयासों के साथ कि वो राजस्थान के सीएम बन सकते हैं, पायलट को दो मामलों को डील करना है. पहला, बीजेपी का एंटी इनकंबेंसी से पार पाने के लिए वर्तमान विधायकों को बिठाने का  दांव. दूसरा कम होने के बावजूद गहलोत की अच्छी-खासी लोकप्रियता और महत्वाकांक्षा.

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पायलट पार्टी की पसंद हो सकते हैं

बीजेपी का अंदरूनी सर्वे इशारा करता है कि कम से कम उसके 100 विधायक अब अलोकप्रिय हैं. बीजेपी हाई कमान उनकी जगह नए चेहरों को लाना चाहता है. राजे को भी एंटी इनकंबेंसी की चिंता है, लेकिन वो इतनी बड़ी तादाद में बदलाव नहीं करना चाहतीं. उन्हें डर है कि ऐसा करने से तमाम निष्ठावान लोगों का पत्ता भी कट जाएगा. लेकिन अगर बीजेपी अपनी योजना लागू करने में कामयाब हुई, तो कांग्रेस का मुकाबला करने में मदद मिलेगी. हालांकि कई लोग मानते हैं कि लोगों का गुस्सा पार्टी के मुकाबले राजे को लेकर ज्यादा है.

पायलट के लिए गहलोत ज्यादा बड़ी चुनौती हैं. उनका कांग्रेस हाई कमान से रिश्ता अच्छा रहा है. ट्रैक रिकॉर्ड उनके साथ है. कई सर्वे इस बात की तरफ इशारा करते हैं कि लोग अब भी उनके कार्यकाल को कामयाब मानते हैं. इसके अलावा पार्टी काडर में उनकी स्वीकार्यता काफी ज्यादा है.

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अगर कांग्रेस इस चुनाव में जीतती है, तो किसकी ताजपोशी होगी, इसका फैसला दो बातों पर निर्भर करता है. पहला, नतीजे पढ़ पाने की राहुल गांधी की क्षमता और उसे आने वाले लोक सभा चुनाव में रणनीति के तौर पर पेश करना. उन्हें तय करना होगा कि सीएम के तौर पर कांग्रेस के लिए ज्यादा फायदेमंद कौन हो सकता है, गहलोत या पायलट. अगर वो वरिष्ठता को प्राथमिकता देते हैं तो गहलोत का नाम है. लेकिन  अगर जातीय समीकरण को बैलेंस करने और नई शुरुआत का इशारा करने का फैसला करते हैं, तो पायलट पार्टी की पसंद हो सकते हैं.

एक और मुद्दा है कि टिकट वितरण में कौन हावी रहता है. अगर गहलोत के लोग विधानसभा में पायलट के लोगों से ज्यादा हैं, तो वे सीक्रेट बैलट के जरिए नेता चुनने की मांग कर सकते हैं. लेकिन कांग्रेस में अंदर के लोगों का कहना है कि इससे डील करने का सबसे अच्छा तरीका है कि राहुल गांधी को फैसला लेने दिया जाए. उम्मीदवार चुनने का एकमात्र तरीका मैदान पर अपने चुनावी विश्लेषकों और पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट पर आधारित हो कि किसके जीतने की उम्मीद ज्यादा है. अगर ऐसा होता है, तो पायलट के पक्ष में लाभ की स्थिति है.

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