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राजस्थान: वोट तो ले लिया, अब जनता की सुध कौन लेगा?

राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की जीत के विश्लेषण बहुत हो चुके हैं. माना जा रहा है कि किसान कर्जमाफी के एक ही वादे ने तीन-तीन राज्यों में कांग्रेस की सत्ता का सूखा खत्म कर दिया.

Updated On: Dec 24, 2018 05:06 PM IST

Mahendra Saini
स्वतंत्र पत्रकार

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राजस्थान: वोट तो ले लिया, अब जनता की सुध कौन लेगा?

राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की जीत के विश्लेषण बहुत हो चुके हैं. माना जा रहा है कि किसान कर्जमाफी के एक ही वादे ने तीन-तीन राज्यों में कांग्रेस की सत्ता का सूखा खत्म कर दिया. आखिर, किसान शब्द अपने आप में खुद ही एक मुद्दा है. लगातार गिरती कृषि आय, कर्ज का मकड़जाल और खुदकुशी करते किसानों के नाम पर सभी वर्गों के वोट हासिल किए जा सकते हैं. बीजेपी ने ये यूपी में किया. कांग्रेस ने कर्नाटक के बाद इन तीन राज्यों में भी कर दिखाया. अब लग रहा है कि लोकसभा चुनाव में भी किसान ही 'वोट मुखिया' रहेगा.

मुद्दे से मिले रिटर्न और लोकसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस ने किसान कर्जमाफी के वादे को लागू करने की सबसे पहले घोषणा भी कर दी. लेकिन जिस तरह बाजार में किसी प्रोडक्ट के विज्ञापन में छोटा सा स्टार (*) टर्म्स एंड कंडीशंस का लगा दिया जाता है, यहां भी किसानों के साथ वही स्टार लगा दिया गया है. बीजेपी का कहना है कि कांग्रेस कोरी वाह-वाही भले ही लूट ले. लेकिन वास्तव में इस कर्जमाफी से आम किसान को वैसा फायदा नहीं होगा, जैसा 2009 में UPA-1 के 70 हजार करोड़ की माफी से हुआ था.

पिछले कुछ दशकों से लगभग हर सरकार किसानों की कर्जमाफी करती आ रही है. कई तरह की फसल बीमा योजना और सब्सिडी स्कीम्स भी चल रही हैं. लेकिन न किसानों की आत्महत्याएं रुक रही हैं, न कृषि विकास दर बढ़ रही है और न ही किसानों की आय ही बढ़ रही है. राजस्थान में ही 3 महीने पहले 29 लाख किसानों के 50 हजार तक के कुल 8 हजार करोड़ रुपये के लोन माफ किए गए. अब नई सरकार ने 2 लाख रुपए तक के लोन को माफ करने का ऐलान भी कर दिया है.

किसान-सरकार का सिरदर्द बना यूरिया

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प्रतीकात्मक तस्वीर

किसान कर्ज माफी और इससे उपजी समस्या बड़ी है. फिलहाल ज्यादा गहराई में न जाते हुए राजस्थान में मौजूदा समस्या पर बात करना चाहेंगे. इस समय एक साथ किसानों से जुड़ी दो समस्याएं गंभीर स्तर पर देखी जा रही हैं. कर्जमाफी के 'स्टार' की बात से पहले यूरिया की किल्लत की चर्चा ज्यादा जरूरी है.

खेती के लिहाज से ये रबी सीजन है और इस समय गेहूं, जौ, सरसों जैसी फसलों में सिंचाई का दौर चल रहा है. सिंचाई के साथ खाद के लिए यूरिया इस्तेमाल किया जाता है. महीने भर से राजस्थान में किसानों को यूरिया की भारी किल्लत का सामना करना पड़ रहा है. हर गांव, कस्बे में यूरिया की दुकानों के बाहर वैसी ही लंबी लाइनें देखी जा सकती हैं जैसी 60-70 के दशक में राशन के लिए लगा करती थीं. यूरिया के एक-एक कट्टे के लिए मार-पीट तक हो रही है. कई इलाकों में पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा है. आशंका है कि हालात जल्द नहीं सुधरे तो किसान उग्र भी हो सकते हैं.

गडे़पान में चंबल फर्टिलाइजर्स के बाहर कांग्रेस विधायक भरत सिंह अपने समर्थकों के साथ धरने पर बैठ गए. भरत सिंह ने आरोप लगाया कि एशिया के बड़े यूरिया प्लांटों में शामिल गड़ेपान के इस प्लांट से स्थानीय किसानों को यूरिया देने के बजाय बाहर सप्लाई किया जा रहा है. 35 लाख टन क्षमता वाले इस प्लांट से यूरिया न देने पर उन्होंने प्रबंधन को गंभीर नतीजे भुगतने की चेतावनी तक दे डाली.

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मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पिछले हफ्ते वादा किया था कि समस्या को दूर करने के लिए 33 हजार मीट्रिक टन अतिरिक्त सप्लाई की जाएगी. हालांकि राजस्थान को जरूरत 5 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा की है. लेकिन हालात ये हैं कि अभी तक सिर्फ 11 हजार टन यूरिया ही पहुंच सका है. बीजेपी का आरोप है कि 2 हफ्ते से कांग्रेस से अपने मुद्दे ही सुलझने में नहीं आ रहे है. किसानों की समस्या की तरफ तो पता नहीं कब ध्यान जाएगा.

कर्जमाफी पर कांग्रेस में ही उठे सवाल

यूरिया के बाद जो सबसे ज्यादा चर्चा में है, वो है किसान कर्ज़माफी का मुद्दा. मुख्यमंत्री की शपथ लेते ही अशोक गहलोत की पहली घोषणा किसानों के 2 लाख रुपए तक के कर्ज़ को माफ करने की थी. लेकिन अब खुद सरकार में ही इसे लेकर गतिरोध दिख रहा है. मंत्री पद की शपथ ले चुके डीग-कुम्हेर विधायक विश्वेंद्र सिंह ने इस पर सवाल उठाए हैं. सिंह का आरोप है कि मौजूदा प्रारुप में उन किसानों को ही फायदा होगा, जो डिफॉल्टर हैं. जबकि ईमानदारी से लोन चुकाने वाले किसान खुद को ठगा सा महसूस करेंगे. इस तरह आगे से कोई भी लोन लेने के बाद किश्ते चुकाएगा ही नहीं क्योंकि फायदा तो डिफॉल्टर होने में है.

बीजेपी ने भी कर्जमाफी पर सरकार से कई सवाल पूछे हैं. पूर्व पंचायतीराज मंत्री रहे राजेंद्र सिंह राठौड़ ने इसे छलावा बताया है. राठौड़ के मुताबिक राज्य के 59 लाख किसानों पर करीब 99 हजार करोड़ रुपए का लोन है. जबकि गहलोत सरकार सिर्फ 18 हजार करोड़ की माफी का ही ऐलान कर रही है. ऐसे में ज्यादातर किसानों को तो कोई फायदा नहीं होगा.

दूसरे, सरकार सिर्फ फसली ऋण को माफ करने की बात कह रही है. जबकि कुल लोन में करीब 75% से ज्यादा हिस्सा तो लोंग टर्म लोन का है. लोंग टर्म लोन कृषि उपकरण जैसे ट्रैक्टर वगैरह खरीदने के लिए लिया जाता है. फसली ऋण तो शॉर्ट टर्म लोन होता है, जो एक फसल सीजन के लिए लिया जाता है जैसे रबी या खरीफ के लिए. इसे फसल कटते ही चुका दिया जाता है. फिर सरकार ने ये भी नहीं बताया है कि माफ की गई रकम की भरपाई कैसे और कहां से की जाएगी.

कर्जमाफी से असल फायदा किसको?

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प्रतीकात्मक तस्वीर

जानकारों का ये भी मानना है कि कर्जमाफी की ऐसी स्कीमों से वास्तविक काश्तकारों को कोई फायदा नहीं होता है. आर्थिक सर्वे के आंकड़े देखें तो वर्तमान में खेती कर रहे 30% से ज्यादा वे लोग हैं जो बंटाई में खेती करते हैं. यानी इनके पास जमीन नहीं है. छोटी जोतों वाले(1-4 हेक्टेयर तक) 30% से ज्यादा किसान वे हैं जिनके खेत भूमि सुधारों के अभाव में उनके नाम नहीं चढ़ पाए हैं (लेखक स्वयं उनमें से एक है). ऐसे में होता ये है कि इन्हे संस्थागत ऋण (जैसे बैंक) नहीं मिल पाते और ये बाज़ार से महंगी दर पर रुपया उठाते हैं. किसानों के पिछड़ेपन की बड़ी वजह यही है.

ग्राउंड लेवल पर वास्तविकता ये है कि कृषि भूमि पर ऐसे लोग लोन उठाते हैं, जो खुद खेती नहीं करते. क्योंकि जमीन इनके नाम है तो हर साल-दो साल में ये 'समृद्ध' लोग पैसा उठाते हैं और उसे गाड़ी खरीदने या दूसरे लग्जरी आइटम्स पर खर्च करते हैं. यही लोग बार-बार डिफॉल्ट करते हैं और अधिकतर अपना लोन माफ कराने में भी कामयाब रहते हैं. बैंकों का NPA बढ़ने के पीछे ऐसे कथित 'किसान' भी जिम्मेदार हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट ?

RBI के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन समेत कई अर्थशास्त्रियों ने कर्जमाफी स्कीमों को अर्थव्यवस्था के लिए सही नहीं बताया है. देश में हरित क्रांति के जनक एम एस स्वामीनाथन ने भी लंबे समय में इससे देश को नुकसान ही होने की बात कही है. स्वामीनाथन के मुताबिक राजनीतिक दल तात्कालिक फायदे के लिए कर्जमाफी का सहारा लेते हैं. जबकि जरूरत खेती-किसानी की मूल समस्या की ओर ध्यान देने की है.

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इस संबंध में मोदी सरकार की कुछ नीतियां खास तौर पर जिक्र करने लायक हैं. हालांकि आजकल ये ट्रेंड चल निकला है कि वर्तमान सरकार की अच्छी योजनाओं की तारीफ करने वालों को खास कैटेगरी में डाल दिया जाता है. इस रिस्क के बावजूद मैं कहना चाहूंगा कि प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, सॉइल कार्ड, ई-नाम, संपदा (SAMPADA- स्कीम फॉर एग्रो-मैरीन प्रोसेसिंग एंड डेवलपमेंट ऑफ एग्रो-प्रोसेसिंग क्लस्टर्स), कुसुम (KUSUM-किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाअभियान), बायो-किसान (बायोटेक-कृषि इनोवेशन साइंस एपलीकेशन नेटवर्क) जैसी योजनाएं किसानों की वास्तविक समस्या को दूर करने में सहायक साबित हो सकती हैं.

हां, ये जरूर है कि इसमें लंबा समय लग सकता है जबकि एक वोटर तात्कालिक फायदे की तरफ ज्यादा देखता है. लेकिन देश को इस सवाल पर जरूर विचार करना चाहिए कि कर्जमाफी योजनाओं के बावजूद कृषि और कृषक की दशा सुधर क्यों नहीं रही?

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