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राजस्थान: लव जेहाद की आड़ धर्मपरिवर्तन में बढ़ता सरकारी हस्तक्षेप

ईसाई पादरी और मशहूर लेखक जॉन हार्डन को पढ़ना चाहिए. हार्डन लिखते हैं कि वर्तमान हिंदू धर्म की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि उसने ऐसे गैर हिंदू राज्य की स्थापना की है जहां सभी धर्म समान हैं

Updated On: Dec 19, 2017 05:48 PM IST

Mahendra Saini
स्वतंत्र पत्रकार

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राजस्थान: लव जेहाद की आड़ धर्मपरिवर्तन में बढ़ता सरकारी हस्तक्षेप

डॉ. भीमराव अंबेडकर ने एकबार कहा था कि वो हिंदू धर्म में पैदा हुए क्योंकि ये उनके हाथ में नहीं था. लेकिन वो हिंदू धर्म में मरेंगे नहीं क्योंकि ये उनके हाथ में है. इसके बाद वे बौद्ध बन गए. धर्म परिवर्तन के पीछे उनके व्यक्तिगत कारणों से ज्यादा सामुदायिक कारण माने जाते हैं. कुछ हफ्ते पहले बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने भी ऐलान किया कि मोदी सरकार की नीतियों में परिवर्तन नहीं हुआ तो वो अपना धर्म परिवर्तन कर लेंगी.

धार्मिक स्वतंत्रता पर बहस नई नहीं है. भारत में यह संविधान प्रदत्त स्वतंत्रता में आता है तो अकसर इसे व्यक्तिगत मामला बताकर भी टालने की कोशिश की जाती है. फिलहाल राजस्थान में भी धर्म परिवर्तन पर नई चर्चा छिड़ गई है. दरअसल, राजस्थान हाईकोर्ट में जस्टिस जी के व्यास और वी के माथुर की खंडपीठ ने धर्म परिवर्तन के लिए नई गाइडलाइन जारी की हैं.

जिला कलेक्टर कहेगा तो ही बदलेगा धर्म

गाइडलाइंस के मुताबिक अब नाबालिग किसी भी सूरत में धर्म परिवर्तन नहीं कर सकते. बालिगों को भी धर्म बदलने से पहले खुद को संतुष्ट करना होगा. इसका मतलब है कि किसी के बहकावे या दबाव में आकर नहीं बल्कि धर्म तभी बदला जा सकता है जब वास्तव में नए धर्म में आस्था स्थापित हो गई हो.

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धर्म परिवर्तन से पहले जिला कलेक्टर या एसडीएम को सूचना देना अब जरूरी हो गया है. डीएम और एसडीएम उसी दिन धर्म बदलने की ये सूचना अपने दफ्तर के नोटिस बोर्ड पर लगाएंगे.

Rajasthan High Court

धर्म परिवर्तित व्यक्ति फौरन शादी भी नहीं कर सकेंगे. शादी के लिए उन्हे एक हफ्ते रुकना पड़ेगा. साथ ही संबंधित अथॉरिटी व व्यक्ति भी शादी कराने से पहले ये सुनिश्चित करेंगे कि धर्म बदलने की सूचना जिला कलेक्टर को दी गई है या नहीं.

जबरन धर्म परिवर्तन की सूचना मिलने पर जिला कलेक्टर इसकी जांच कराएंगे. अगर इसकी पुष्टि होती है तो कानून अनुसार उचित कदम उठाएंगे. खंडपीठ ने कहा है कि ये गाइडलाइंस तब तक अस्तित्व में रहेंगी जब तक कि राजस्थान धर्म स्वातंत्र्य बिल-2006 लागू न हो जाए या राज्य सरकार की ओर से बलपूर्वक धर्म परिवर्तन रोकने का कोई दूसरा कानून न बना दिया जाए.

पायल केस में आई नई गाइडलाइंस

9 बिंदुओं की ये गाइडलाइंस जोधपुर की पायल सिंघवी और फैज मोहम्मद के मामले में सुनवाई के दौरान जारी की गई हैं. ये अलग बात है कि ये गाइडलाइंस भविष्य के लिए हैं यानी इस केस पर लागू नहीं होगी. इसी साल अप्रैल में पायल ने मुस्लिम धर्म कबूल कर अपने ब्वॉयफ्रेंड से निकाह कर लिया था. इसके बाद उसके परिवार ने इसे केरल के हादिया केस की तर्ज पर लव जेहाद बता कर अदालत में याचिका लगाई थी.

सुनवाई के दौरान जस्टिस गोपाल कृष्ण व्यास ने कई तल्ख टिप्पणियां की थी. न्यायाधीश ने यहां तक कहा था कि महज 10 रुपए के स्टांप पेपर पर कोई भी आखिर कैसे धर्म बदल सकता है? हाईकोर्ट ने राजस्थान सरकार से पूछा था कि क्या धर्म परिवर्तन के लिए सरकार की तरफ से कोई नियम बनाए गए हैं. तब सरकारी पक्ष ने धर्म स्वातंत्र्य बिल का हवाला दिया था. लेकिन ये बिल पिछले 11 साल से अटका पड़ा है.

अटके पड़े विधेयक में अब तेजी

वसुंधरा राजे सरकार के पिछले कार्यकाल (2003-08) के दौरान 2006 में धर्म स्वांतत्र्य बिल को तैयार किया गया था. तब कांग्रेस ने इसका कड़ा विरोध किया था और इसे संवैधानिक अधिकारों का हनन बताया था. इसके बाद राज्यपाल प्रतिभा पाटिल ने इसे लौटा दिया. राजे सरकार ने जब दोबारा इसे भेजा तो राज्यपाल ने 2007 में इसे राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेज दिया. 2008 में सरकार ने नया बिल बनाया. लेकिन ये भी तब से ही लंबित है.

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अब पायल केस में कोर्ट की कड़ी टिप्पणियों के बाद धर्म स्वातंत्र्य बिल पर सरकार ने तेजी दिखाई है. बताया जा रहा है कि फिलहाल यह विधि मंत्रालय में विचाराधीन है. इससे पहले केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इसे राष्ट्रीय नीति से असंबद्ध बताते हुए राज्य सरकार से स्पष्टीकरण मांगा था. हालांकि इस बिल में कुछ वैसे ही प्रावधान हैं, जैसी गाइडलाइन अब हाईकोर्ट ने बनाई हैं मसलन, धर्म बदलने के लिए जिला कलेक्टर की मंजूरी लेना.

vasundhara raje

राजस्थान धर्म स्वातंत्र्य बिल की खास बातें-

- जबरन, लालच या धोखे से धर्म परिवर्तन पर पूरी तरह रोक है. उल्लंघन पर 3 साल तक की सजा और 25 हजार रुपए का जुर्माना.

- बच्चों, महिलाओं और अनुसूचित जाति/जनजाति के व्यक्तियों के ऊपर बताए तरीकों से धर्म परिवर्तन कराने पर 5 साल तक की सजा और 50 हजार रुपए का जुर्माना.

- गैर कानूनी रूप से धर्म परिवर्तन में लिप्त संस्था का रजिस्ट्रेशन निरस्त किया जा सकता है.

- मूल धर्म में वापस लौटना भी आसान नहीं. इसकी सूचना भी जिला कलेक्टर को देनी होगी.

इससे पहले गुजरात, हिमाचल, झारखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य भी धर्म परिवर्तन को प्रबंधित करने वाले कानून बना चुके हैं. कुछ जगह इस कानून को 40 साल तक हो गए हैं तो कई राज्यों में ‘मोदीयुग’ में तत्परता दिखी है. हालांकि किसी को भी अपनी इच्छा के धर्म को अपनाने से रोकना संविधान सम्मत नहीं कहा जा सकता.

संविधान में क्या है ?

भारत कई धर्मों और सांस्कृतिक परिवेशों वाला देश है. संविधान निर्मात्री सभा को भी इसका बखूबी इल्म था. यही वजह है कि संविधान निर्माण के वक्त इसका खास ख्याल रखा गया. मूल अधिकारों के तहत अनुच्छेद 25 से 28 तक धार्मिक स्वतंत्रता के व्यापक अधिकार लोगों को प्रदान किए गए हैं. इसमें पहला ही अनुच्छेद ये कहता है कि नागरिकों को अपने अंत:करण के आधार पर किसी भी धर्म को मानने की स्वतंत्रता है.

हालांकि अनुच्छेद 25(1) में धर्म के ‘प्रचार’ (Propagation) शब्द को लेकर सबसे ज्यादा बहस होती रही है. संविधान निर्मात्री सभा में भी इसको लेकर मतभेद थे. के एम मुंशी ने कहा था कि प्रचार शब्द ईसाई समुदाय के भारी आग्रह की वजह से सम्मिलित किया गया. ईसाई समुदाय का कहना था कि धर्म प्रचार उनके धर्माचरण का मुख्य अंग है.

दरअसल, धर्म प्रचार और परिवर्तन के बीच की बारीक लाइन ही धार्मिक स्वतंत्रता पर बहस को जन्म देती है. कई बार धर्म का प्रचार इस कदर किसी के दिमाग पर हावी हो जाता है कि धर्म परिवर्तन की इच्छा प्रबल हो जाती है. कई बार प्रचार की आड़ में अल्पसंख्यक समुदाय धर्म परिवर्तन को संविधान सम्मत ठहराने की कोशिश भी करते हैं.

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संविधान मामलों के जानकार डी डी बसु ने ‘दी कॉन्स्टीट्यूशन ऑफ इंडिया’ में प्रचार के निहितार्थ को स्पष्ट करने की कोशिश की है. बसु के अनुसार ईसाई प्राय: ये तर्क देते हैं कि संविधान में उल्लेखित प्रचार शब्द उन्हे धर्म परिवर्तन का संवैधानिक अधिकार देता है. लेकिन ये तर्क पूरी तरह असत्य है.

क्या कहता है सुप्रीम कोर्ट ?

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धर्म परिवर्तन पर रेव स्टेनिस्लॉस केस सबसे ज्यादा चर्चित मामलों में से एक है. इसमें सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि अनुच्छेद 25 सभी नागरिकों को अपने विवेक से धार्मिक आचरण की स्वतंत्रता देता है लेकिन इसमें किसी को भी उसके धर्म से दूसरे धर्म में ले जाने की स्वतंत्रता नहीं है. इसको इस तरीके से समझ सकते हैं कि मुझे अपने धर्म के प्रचार की आजादी तो है लेकिन मैं इसकी आड़ में किसी द्सरे का धर्म बदलवा दूं, ये अधिकार मुझे नहीं है.

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वर्तमान में धर्म परिवर्तन पर ये पूरी बहस हिंदू धर्म को खतरे में बताने वाली आशंकाओं की वजह से छिड़ गई है. दरअसल, पिछले कुछ साल में हिंदू लड़कियों के मुस्लिम लड़कों से शादी करने को अलग नजरिए से देखा जाने लगा है. दूसरी वजह ईसाई पादरियों के लालच देकर गरीब/आदिवासी हिंदुओं को ईसाई बनाने के बढ़ते मामले हैं.

हालांकि ऐसे लोगों को ईसाई पादरी और मशहूर लेखक जॉन हार्डन को पढ़ना चाहिए. हार्डन लिखते हैं कि वर्तमान हिंदू धर्म की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि उसने ऐसे गैर हिंदू राज्य की स्थापना की है जहां सभी धर्म समान हैं. इसलिए दूसरे धर्म में शादी करना या कुछ लोगों का धर्म छोड़कर चले जाना, दुनिया के सबसे पुराने धर्म को खतरे में नहीं डाल सकता.

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