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आखिर झुक गया ‘राज’: सरकार ने सेलेक्ट कमेटी को भेजा विवादित बिल

हालात ऐसे हो गए हैं कि अगर बिल पास कराने की दिशा में आगे बढ़ा जाता तो यह बहुत बड़ी गलती होती, खुद सरकार के लिए भी और गुजरात चुनाव में घिर रही बीजेपी के लिए भी

Updated On: Oct 24, 2017 08:11 PM IST

Mahendra Saini
स्वतंत्र पत्रकार

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आखिर झुक गया ‘राज’: सरकार ने सेलेक्ट कमेटी को भेजा विवादित बिल

भ्रष्ट आचरण के आरोपी लोकसेवकों को बचाने वाले और काले कानून की संज्ञा दिए जा रहे राजस्थान के दंड संहिता (राजस्थान संशोधन) विधेयक-2017 को फिलहाल प्रवर समिति को सौंप दिया गया है. लेकिन इससे पहले, आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में संशोधन वाला यह बिल बीजेपी सरकार के लिए सांप-छुछुंदर का खेल बनकर रह गया था. व्यापक विरोध के बावजूद सोमवार को इस बिल को राजस्थान विधानसभा में पेश किया गया था. लेकिन बीते 24 घंटों में इससे सरकार की मुश्किलें कम होने के बजाय बढ़ती ही गई.

अब हालात ऐसे हो गए हैं कि अगर बिल पास कराने की दिशा में आगे बढ़ा जाता तो यह बहुत बड़ी गलती साबित हो सकता था. खुद सरकार के लिए भी और गुजरात चुनाव में घिर रही बीजेपी के लिए भी. सबने देखा कि पिछले कई दिन से इस बिल को लेकर खुद बीजेपी और राजस्थान सरकार सदन से लेकर से सड़क तक और सोशल मीडिया से लेकर चाय पर चर्चाओं तक हर जगह घिरी हुई थी.

सरकार के लिए पीछे हटना भी भारी बेइज्जती से कम नहीं था. आखिर पिछले कई दिन से पूरी सरकारी मशीनरी विवादों के बावजूद इस बिल का समर्थन करने में जुटी थी. ऐसे में पीछे हटना उस मुहावरे का सच होना होता, जिसका जिक्र बीजेपी के ही विधायक घनश्याम तिवाड़ी ने किया, यानी 'थूक कर चाटना'. हालांकि चौतरफा विरोध के बाद सरकार ने आखिरकार बिल को प्रवर समिति को भेजने में ही भलाई समझी है.

Chief Minister of Rajasthan Raje and Gujjar leader Bainsla walk back after news conference in Jaipur

प्रवर समिति को भेजने के मायने

बिल को प्रवर समिति को सौंपने के कई मायने हैं. माना जा रहा है कि व्यापक विरोध और छीछालेदर से बचने के लिए सरकार ने यह फैसला किया है. जानकार लोगों के मुताबिक यह सरकार के लिए फौरी राहत है. अब विरोध के सुर फिलहाल थम जाएंगे क्योंकि बिल पर अपनी राय देने के लिए प्रवर समिति किसी समय सीमा में बंधी नहीं रहती है. कई बार तो ऐसा भी देखा गया है कि प्रवर समिति के पास कई मामले 2-3 साल तक भी लटके रहते हैं.

संभावनाएं यह भी जताई जा रही हैं कि प्रवर समिति बिल में दो संशोधनों का सुझाव दे सकती है. पहला है, मीडिया पर आरोपी लोकसेवकों की पहचान उजागर करने की पाबंदी हटाना. दूसरा सुझाव यह हो सकता है कि मामला दर्ज करने के लिए 180 दिन की समय सीमा में संशोधन किया जाए. महाराष्ट्र के जिस कानून को राजस्थान सरकार मॉडल बता रही है, उसमें यह सीमा 90 दिन है.

वसुंधरा राजे सरकार ने फिलहाल मामला शांत करने की कोशिश की है. हालांकि बिल को प्रवर समिति को भेजने के बावजूद विवादित कानून अभी लागू है. सीनियर एडवोकेट ए के जैन के मुताबिक सरकार ने अभी तक उस अध्यादेश को वापस नहीं लिया है, जिसकी जगह पर यह बिल लाया गया है. यानी दंड प्रक्रिया संहिता (राजस्थान संशोधन) अध्यादेश. इसी अध्यादेश में जजों, मजिस्ट्रेटों और लोकसेवकों के पक्ष में विवादित प्रावधान किए गए थे. यह अध्यादेश सितंबर में लाया गया था. जैन के मुताबिक अध्यादेश वापस लिए जाने तक यह लागू रहेगा. वैसे, मौजूदा सत्र में विधेयक के पारित न होने पर ये अध्यादेश संवैधानिक प्रावधानों के तहत स्वत: ही खत्म भी हो जाएगा.

Rajasthan High Court

क्या बीजेपी नेता दंभ में हैं?

फिलहाल इस बिल को प्रवर समिति को सौंप दिया गया है. लेकिन इस फैसले से कुछ घंटे पहले तक राजस्थान के मंत्री और दूसरे बीजेपी नेता विरोध के बावजूद लगातार इसके समर्थन में बेतुके बयानों से भी तौबा नहीं कर रहे थे. यह बयान वैसे ही थे जैसे 2014 के चुनाव से पहले तक यूपीए सरकार के मंत्रियों और कांग्रेस नेताओं के दंभ से भरे बयान थे. कुछ दिन पहले ही खुद राहुल गांधी ने इसे स्वीकार किया था.

विरोधियों का कहना है कि राजस्थान में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी नेता भी राहुल गांधी जैसी ही स्वीकारोक्ति करते नजर आ सकते हैं. वरना, भ्रष्ट आचरण के आरोपी लोकसेवकों को बचाने के लिए न ऐसे किसी कानून की जरूरत है और न ही ऐसी गलती के बाद गलत बयानी की. यह चोरी और सीनाजोरी से कम कुछ नहीं है.

ऐसे बयानों की एक बानगी खुद प्रदेश के गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया का बयान है. सोमवार शाम कटारिया ने कहा कि यह कोई आपातकाल नहीं है. ईमानदार लोकसेवकों की प्रतिष्ठा बचाने के लिए यह कानून बनाया जा रहा है. मीडिया पर पाबंदी और सजा के प्रावधान पर उन्होंने कहा कि अगर कोई कानून नहीं तोड़ेगा तो सजा भी नहीं मिलेगी.

क्या गृह मंत्री के बयान का यह अर्थ नहीं निकलता कि कोई लोकसेवक अगर भ्रष्ट आचरण करता है तो उसे करने दिया जाए. मीडिया उसका पर्दाफाश नहीं करेगा तो वो बचा रहेगा वरना सच दिखाने पर उसे सजा मिलेगी. गोया कि बिल्ली आंख मूंदकर दूध पीती रहे और मान ले कि उसे कोई नहीं देख रहा. अगर देख भी रहा है तो वो भी आंखें बंद कर ले वरना बिल्ली के पंजे खतरनाक हैं.

Gulab Chand Kataria

राजस्थान के गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया

अब बैकफुट पर क्यों आई सरकार?

सरकार को बैकफुट पर इसलिए आना पड़ा क्योंकि जिसने भी इस कानून के प्रावधानों को समझा, उसी ने इसका मुखर विरोध किया. विरोध का आलम यह है कि राजस्थान हाईकोर्ट में इस बिल के खिलाफ 3 याचिकाएं दर्ज की जा चुकी हैं. बार एसोसिएशन ने अदालतों के बहिष्कार का ऐलान कर दिया. पत्रकारों के विभिन्न संगठनों ने जयपुर में विधानसभा तक रैली निकालने की घोषणा की. कांग्रेस ने भी सदन के अंदर और बाहर जमकर हंगामा किया. बीजेपी विधायक घनश्याम तिवाड़ी और निर्दलीय विधायक माणिक चंद सुराणा ने बिल के विरोध में विपक्ष के साथ सदन का बायकॉट किया.

बीजेपी विधायकों के बीच ही बिल को लेकर अलग-अलग सुर हैं. कई बीजेपी विधायकों ने ऑफ द रिकॉर्ड बातचीत में माना कि उन्हें इसके प्रावधानों की जानकारी नहीं है. वो सिर्फ पार्टी लाइन के कारण इसका समर्थन कर रहे हैं. वहीं, बीजेपी विधायक प्रहलाद गुंजल ने स्वीकार किया कि आरोपी लोकसेवकों को बचाने वाले इस बिल से पारदर्शिता के हनन के साथ ही भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.

बीजेपी नेता और संवैधानिक मामलों के जानकार सुब्रमण्यन स्वामी ने अपने ट्वीट में बिल को फौरन वापस लेने की मांग करते हुए लिखा कि अदालत में यह टिक नहीं पाएगा.

राजस्थान हाईकोर्ट के जज गोविंद माथुर और विनीत कुमार माथुर की खंडपीठ ने भी एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए मौखिक रूप से गंभीर टिप्पणी की है. न्यायाधीशों ने कहा कि सरकार निकम्मे अफसरों को बचाने के लिए ढाल का काम कर रही है.

मुख्यमंत्री ने मंत्रियों को लताड़ लगाई!

जबर्दस्त विरोध और हाईकोर्ट की मौखिक टिप्पणी के बाद खुद मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने सोमवार की देर शाम कैबिनेट मंत्रियों की एक बैठक बुलाई. बैठक में गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया, कार्मिक मंत्री राजेंद्र सिंह राठौड़, सार्वजनिक निर्माण मंत्री यूनुस खान और बीजेपी के अध्यक्ष अशोक परनामी मौजूद थे. बताया जा रहा है कि राजे ने इस बिल पर गहरी नाराजगी जताते हुए पुनर्विचार के निर्देश दिए. इसी के बाद बिल को फिलहाल प्रवर समिति को भेजने के कयास लगाए जाने लगे थे.

हालांकि इस बिल के भविष्य पर अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगा. बताया जा रहा है कि संशोधनों के बाद बिल विधानसभा के अगले सत्र में फिर पेश किया जा सकता है. इस आशंका के बाद नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी ने ऐलान कर दिया है कि बिल को वापस लिए जाने तक आंदोलन से पीछे नहीं हटा जाएगा.

पिछले कुछ दिन से राजस्थान ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी सरकारें लगातार गलत वजहों से चर्चा में है. फिर चाहे गुजरात चुनाव की तारीखों का मसला हो या पाटीदार आंदोलन से जुड़े नेताओं की खरीद-फरोख्त का मामला हो. ऐसे में राजस्थान सरकार का यह विवादित बिल लाना अपने पांव पर खुद कुल्हाड़ी मारने जैसा है. राजस्थान से बाहर के नेटिजन्स ने भी इस पर जिस तरह की प्रतिक्रिया दी है, उससे बीजेपी को आने वाले चुनावों में बड़े नुकसान की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.

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