S M L

राजस्थान: हर फैसले के पीछे राहुल! क्या जनता में गलत संदेश नहीं जाएगा?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कांग्रेस सारी शक्तियों के केंद्रीकरण का आरोप लगाती रही है. लेकिन मौजूदा हालात में यही राहुल गांधी भी करते नजर आ रहे हैं.

Updated On: Dec 26, 2018 07:34 PM IST

Mahendra Saini
स्वतंत्र पत्रकार

0
राजस्थान: हर फैसले के पीछे राहुल! क्या जनता में गलत संदेश नहीं जाएगा?

पहले विधानसभा चुनाव के लिए टिकट बांटने में जूतमपैजार, फिर मुख्यमंत्री पद की जंग और अब मंत्रियों को विभागों के आवंटन का मसला. ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस को इस बार राजस्थान में सत्ता मिल तो गई लेकिन पार्टी में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है. पार्टी में छोटे-छोटे मुद्दों को लेकर बन रहा बड़ा गतिरोध अब जनता के लिए सिरदर्द बनता जा रहा है.

विधायकों को मंत्री पद की शपथ लिए हुए 48 घंटे से ज्यादा हो गए हैं. लेकिन आज़ादी के बाद शायद ये पहली बार है जब सरकार के गठन के बावजूद विभागों के मुखिया तक तय नहीं हो पा रहे हैं. सोमवार को 23 मंत्रियों ने शपथ ली. लेकिन सरकार में बने 2 पावर सेंटर्स के बीच शीतयुद्ध इतना गंभीर है कि शपथ लिए हुए सभी लोग विभाग विहीन मंत्री बने हुए हैं.

पोर्टफोलियो पर फंस रहा पेच!

माना जाता है कि 13-14 दिसंबर की शाम दिल्ली के कांग्रेस मुख्यालय में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच अपने गुटों से 15-15 मंत्री पदों पर सहमति बनी थी. लेकिन हफ्ते भर तक एक दूसरे के गुटों के नामों पर आपत्तियां आती रही. इस वजह से मंत्रिपरिषद का गठन तक नहीं हो सका. इसके बाद दिल्ली में ही राहुल गांधी ने आखिरकार मंत्रियों के नामों पर मुहर लगाई. 24 दिसंबर को मंत्रिपरिषद ने शपथ ली. लेकिन अब पेच विभागों के बंटवारे पर फंस गया है.

ASHOK-GEHLOT-sachin-pilot

गहलोत और पायलट, दोनों ही गुटों की नजर मलाईदार विभागों पर है. दोनों में से कोई भी नहीं चाहता कि दूसरे के खाते में महत्त्वपूर्व विभाग चले जाएं. इसीलिए मंत्रियों के बीच पोर्टफोलियो का बंटवारा नहीं हो पा रहा है. गृह, पीडब्लूडी, वित्त, ट्रांसपोर्ट, खनन और राजस्व विभागों पर दोनों ही गुटों की नजर है. ये मलाईदार विभाग समझे जाते हैं.

ऐसे में पोर्टफोलियो को लेकर नज़रें दिल्ली पर टिक गई हैं. माना जा रहा है कि इस मामले में भी गतिरोध का खात्मा राहुल गांधी के दफ्तर में ही हो पाएगा. शायद आज देर शाम तक गतिरोध दूर हो पाए. राजस्थान प्रभारी अविनाश पांडेय, पर्यवेक्षक के.सी. वेणुगोपाल, पार्टी सचिव भंवर जितेंद्र सिंह, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट इस संबंध में मीटिंग कर सकते हैं.

माना जा रहा है कि कार्मिक और वित्त जैसे महत्त्वपूर्ण विभाग मुख्यमंत्री अपने पास रख सकते हैं. जबकि उपमुख्यमंत्री के पाले में उद्योग और नगरीय विकास जैसे विभाग आ सकते हैं. हालांकि आखिरी फैसला राहुल गांधी की राय से ही लिए जाने की बात कही जा रही है.

सीनियर नेताओं के समर्थक हो रहे उग्र

मंत्रिपरिषद के गठन के बाद कांग्रेस में सीनियर नेताओं की उपेक्षा भी बड़ा मुद्दा बन चुका है. 23 में से 18 विधायक ऐसे हैं जो पहली बार मंत्री बने हैं. हालांकि, पहली बार चुनकर आए 25 विधायकों में से किसी को मंत्री नहीं बनाया गया. पहले कयास लगाए जा रहे थे कि सीनियर नेताओं का मंत्रिपरिषद में बहुमत रहेगा. लेकिन युवाओं को आगे बढ़ाने के नाम पर सीनियर्स की अनदेखी की गई.

सीनियर नेताओं ने इस कवायद को अपने विरुद्ध समझा है. इन्होने सीधे तो विरोध नहीं जताया लेकिन इनके समर्थकों की तरफ से काफी उग्र प्रतिक्रियाएं दी जा रही हैं. सबसे ज्यादा विरोध सी पी जोशी, दीपेंद्र सिंह शेखावत, परसराम मोरदिया, हेमाराम चौधरी, राजेंद्र पारीक जैसे नेताओं के समर्थकों की तरफ से दर्ज कराया जा रहा है. बूंदी में कई चौराहों पर कांग्रेस के पोस्टर फाड़ दिए गए. पूर्वी राजस्थान में कई जगह कार्यकर्ताओं ने चौराहों पर प्रदर्शन किया.

नाराजगी के चलते सी.पी. जोशी और दीपेंद्र सिंह तो शपथ ग्रहण समारोह में ही शामिल नहीं हुए. कामां में जाहिदा खान और गुढ़ामालानी में हेमाराम चौधरी के समर्थकों ने भी उग्र प्रदर्शन किया. मुसलमानों के बीच मंत्रिपरिषद में कम प्रतिनिधित्व को लेकर भी व्यापक प्रतिक्रिया देखी जा रही है. अलवर में मेव पंचायत ने सभा कर इसके लिए विरोध जताया. कांग्रेस के पास 7 मुस्लिम विधायक हैं. लेकिन सिर्फ पोकरण विधायक सालेह मोहम्मद को मंत्री बनाया गया है. शिकायत ये भी है कि राज्य में ज्यादा जनसंख्या और प्रभाव वाले मेव और कायमखानी मुस्लिमों को तरजीह नहीं दी गई.

क्या जल्द होगा मंत्रिपरिषद का विस्तार?

विधायकों की नाराजगी 4 महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए घातक सिद्ध हो सकती है. शायद इस को भांपते हुए ही उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट ने मंत्रिपरिषद के विस्तार के संकेत दिए हैं. राज्य में कुल 30 मंत्री बनाए जा सकते हैं. यानी अभी 7 सीटें खाली हैं. कहा जा रहा है कि विस्तार में कई दिग्गजों की लॉटरी लग सकती है.

इसके अलावा, कुछ विधायकों को विधानसभा अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, मुख्य और उपमुख्य सचेतक के पदों से संतुष्ट किया जाएगा. कई प्रभावशाली विधायकों को निगम और बोर्डों में खपाने के सपने भी दिखाए जा रहे हैं. हालांकि, गहलोत और पायलट के बीच चल रही पावर की रस्साकशी की वजह से ये भी इतना आसान नजर नहीं आ रहा है.

सरकारी कामकाज हो रहा प्रभावित

मंत्रियों के बीच विभागों का बंटवारा नहीं हो पाने के कारण राज्य का विकास कार्य भी लगभग ठप पड़ गया है. चुनाव से पहले आचार संहिता की वजह से पिछले 3 महीने से सिर्फ रूटीन काम ही हो रहा है. विभागों में फाइलों का अंबार लग गया है. अभी सिर्फ तबादलों का दौर चल रहा है. मुख्यमंत्री के आदेश सिर्फ आईएएस अफसरों को इधर-उधर करने में ही जारी हो रहे हैं. 24 घंटे पहले ही 68 आईएएस अफसरों का तबादला किया गया है.

बीजेपी राज्य सरकार में उपजे इन हालात पर गहराई से नजर बनाए हुए हैं. बीजेपी नेता इसकी तुलना यूपीए-2 सरकार की नीतिगत पंगुता (Policy Paralysis) से कर रहे हैं. बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष मदन लाल सैनी ने तंज कसते हुए कहा कि कांग्रेस के विरोधाभास 15 दिन में ही सामने आ चुके हैं. आने वाले 5 साल में तो पता नहीं क्या-क्या और देखने को मिलेगा.

Rahul Gandhi Press Conference at AICC

बहरहाल, अब इसे राहुल गांधी की पार्टी पर पकड़ मजबूत करने की कोशिश कहा जाए या एक से ज्यादा पावर सेंटर्स का उदय. लेकिन हकीकत ये है कि हर मामले को दिल्ली में निपटाने की कोशिशें जनता के बीच गलत मैसेज ही पेश कर रही हैं. लोकसभा चुनाव में कम समय को देखते हुए कांग्रेस सरकार ने कामकाज में सुधार नहीं दर्शाया तो खामियाजा भी भुगतना पड़ सकता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कांग्रेस सारी शक्तियों के केंद्रीकरण का आरोप लगाती रही है. लेकिन मौजूदा हालात में यही राहुल गांधी भी करते नजर आ रहे हैं.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
KUMBH: IT's MORE THAN A MELA

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi