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राजस्थान उपचुनाव: कांग्रेस जीती तो उसे पद्मावत और आनंद पाल को धन्यवाद देना होगा

राजस्थान की दो लोकसभा सीटों और एक विधानसभा सीट के लिए सोमवार को उपचुनाव हुए

Sandipan Sharma Sandipan Sharma Updated On: Jan 30, 2018 04:15 PM IST

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राजस्थान उपचुनाव: कांग्रेस जीती तो उसे पद्मावत और आनंद पाल को धन्यवाद देना होगा

राजस्थान की दो लोकसभा सीटों और एक विधानसभा सीट के लिए सोमवार को उपचुनाव हुए. सभी जगहों पर तकरीबन शांतिपूर्ण ढंग से मतदान संपन्न हुआ. जिन जगहों पर उपचुनाव हुए उनमें अजमेर और अलवर लोकसभा सीट, वहीं मांडलगढ़ विधानसभा सीट शामिल है. अलवर लोकसभा सीट पर करीब 63 फीसदी और अजमेर सीट पर करीब 65 फीसदी वोटिंग हुई. जबकि, मांडलगढ़ विधानसभा सीट पर करीब 75 फीसदी मतदान हुआ. वोटों की गिनती एक फरवरी को होगी.

अजमेर लोकसभा सीट पर बीजेपी के राम स्वरूप लांबा और कांग्रेस के रघु शर्मा के बीच टक्कर है. अलवर लोकसभा सीट पर बीजेपी के जसवंत सिंह यादव और कांग्रेस के करण सिंह यादव के बीच मुकाबला है. जबकि, मांडलगढ़ विधानसभा सीट पर बीजेपी के शक्ति सिंह हाडा और कांग्रेस के विवेक धाकड़ आमने-सामने हैं.

अगर कांग्रेस राजस्थान उपचुनाव में दोनों लोकसभा सीटें जीतने में कामयाब हो जाती है, तो उसे संजय लीला भंसाली को धन्यवाद पत्र भेजने के बारे में विचार करना चाहिए. ऐसा इसलिए क्योंकि संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावत’ अजमेर और अलवर लोकसभा सीटों पर कांग्रेस की जीत में निर्णायक भूमिका निभा सकती है. सोमवार को राजस्थान में उपचुनाव के लिए वोटिंग सिर्फ एक ही मुद्दे के मुद्दे पर हुई. वह मुद्दा था- राजस्थान में बीजेपी और कांग्रेस जाति के समीकरणों को कैसे संभालती हैं. यही वह वजह है जिसने राजस्थान के उपचुनाव में ‘पद्मावत’ को महत्वपूर्ण बना दिया.

अजमेर लोकसभा सीट पर हार-जीत का अंतर एक लाख मतों के भीतर होने की संभावना है. इस सीट पर रावण राजपूतों को गेमचेंजर माना जा रहा है. रावण राजपूत समुदाय की अजमेर में अच्छी-खासी आबादी है. एक ऐसे निर्वाचन क्षेत्र में जहां दोनों ही पार्टियां अपने परंपरागत वोटरों और समर्थकों पर निर्भर हों, वहां रावण राजपूतों के वोट निर्णायक साबित हो सकते हैं.

sanwar lal jat

सांवर लाल जाट

अजमेर में बीजेपी उम्मीदवार राम स्वरूप लांबा पूर्व मंत्री सांवरलाल जाट के बेटे हैं. सांवरलाल जाट का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया था. उनके निधन से खाली हुई सीट पर ही उपचुनाव कराया गया. सांवरलाल जाट इलाके के कद्दावर नेता थे. उन्होंने अजमेर में बड़ी आबादी वाले जाट समुदाय को एकजुट करने में अहम भूमिका निभाई थी. जाटों के अलावा सांवरलाल ने अपने निर्वाचन क्षेत्र में रावतों-सिंधियों और व्यापारियों को भी अपने पक्ष में कर रखा था.

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वहीं अजमेर में कांग्रेस उम्मीदवार रघु शर्मा जाति से ब्राह्मण हैं. बीजेपी के जाट-सिंधी और व्यापारियों के गठजोड़ के जवाब में कांग्रेस ने ब्राह्मण, गुर्जर, मुस्लिम और दलितों का गठबंधन बनाया. सचिन पायलट की वजह से इस गठबंधन में गुर्जरों को खास महत्व दिया गया. बहरहाल, बीजेपी और कांग्रेस के बीच वोटों की रस्साकशी के बीच अजमेर का राजपूत समुदाय अहम भूमिका में नजर आया. अजमेर में, जहां दोनों ही पार्टियां खुद को पांच-पांच लाख वोट मिलने का दावा कर रही हैं, वहीं राजपूतों के डेढ़ लाख वोट यकीनन निर्णायक सिद्ध होंगे.

राजस्थान उपचुनाव में बीजेपी को एक गंभीर समस्या का सामना करना पड़ा. दरअसल, वैसे तो राजपूत समुदाय पारंपरिक रूप से चुनावों में बीजेपी का समर्थन करता आया है, लेकिन इस साल दो मुद्दों ने राजपूतों को अपने फैसले पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर कर दिया. पहला मुद्दा रहा, जून 2017 में कथित पुलिस एनकाउंटर में गैंगस्टर आनंद पाल सिंह की मौत. राजपूतों की नजर में आनंद पाल सिंह की छवि रॉबिनहुड की तरह थी, जिसने उन्हें जाट माफिया के दबदबे से मुक्ति दिलाई थी. गैंगस्टर आनंद पाल सिंह की मौत ने राज्य के राजपूतों को खासा नाराज कर दिया था. लेकिन राज्य की बीजेपी सरकार इस मुद्दे पर राजपूत समुदाय को मनाने में नाकाम रही.

गैंगस्टर आनंद पाल सिंह के कथित एनकाउंटर से खफा राजपूत समुदाय की नाराजगी फिल्म ‘पद्मावत’ ने और बढ़ा दी. राजपूतों ने वसुंधरा राजे सरकार से ‘पद्मावत’ पर बैन लगाने की मांग की थी. लेकिन वसुंधरा सरकार ने ‘पद्मावत’ को बैन करने में असमर्थता जता दी. जिससे राजपूत समुदाय बेहद निराश हुआ. हालांकि, राजस्थान के सिनेमाघरों ने फिल्म को दिखाने से इनकार कर दिया है, लेकिन फिर भी राज्य का राजपूत समुदाय मायूस है. राजपूतों को लग रहा है कि, बीजेपी ने उन्हें नीचा दिखाया है. ऐसा इसलिए क्योंकि, फिल्म को न केवल सेंसर बोर्ड ने मंजूरी दी है, बल्कि बीजेपी शासित कई राज्यों में फिल्म को दिखाने की इजाजत भी दी गई.

आनंदपाल सिंह (तस्वीर:न्यूज़18 हिंदी)

आनंदपाल सिंह (तस्वीर:न्यूज़18 हिंदी)

बीजेपी को डर सता रहा है कि, कहीं नाराज राजपूत समुदाय ने उसके उम्मीदवारों के खिलाफ वोट न किया हो. वहीं राजपूत भी यह दिखा सकते हैं कि वे भगवा ब्रिगेड से बंधे हुए नहीं हैं और न ही बीजेपी के प्रति उनकी वफादारी को हल्के में लिया जा सकता है. राजपूत यह भी बखूबी जानते हैं कि अजमेर चुनाव में उनके वोट निर्णायक हैं. इसलिए राजपूत अपनी ताकत और क्षमता का सियासी फायदा उठा सकते हैं.

बीजेपी के रणनीतिकारों को उम्मीद है कि गुजरात के पाटीदारों की तरह अजमेर में राजपूतों ने अंततः कांग्रेस को वोट देने की बजाय बीजेपी के ही पक्ष में मतदान किया होगा. वहीं बीजेपी बड़ी संख्या में जाट समुदाय के वोट मिलने की भी उम्मीद लगाए बैठी है. क्योंकि बीजेपी का मानना है कि सहानुभूति के चलते जाट मतदाता बड़ी तादाद में उसके उम्मीदवार लांबा को वोट करेंगे. अगर ऐसा ही हुआ तो अजमेर में बीजेपी जीत का परचम लहरा सकती है.

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वहीं अलवर लोकसभा सीट को लेकर बीजेपी ज्यादा आशावादी नहीं है. अलवर में भी बीजेपी सांसद के निधन के बाद उपचुनाव हुआ है. अलवर में जाति का समीकरण कांग्रेस उम्मीदवार करण सिंह यादव के पक्ष में नजर आता है. उम्मीद है कि अलवर में मेव और यादव समुदाय ने कांग्रेस के पक्ष में मतदान किया. अगर ऐसा हुआ है तो बीजेपी उम्मीदवार जसवंत यादव के लिए मुकाबला मुश्किल माना जाएगा.

दिलचस्प बात यह है कि बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने राजस्थान उपचुनाव से दूरी बनाए रखी. हालांकि बीजेपी आलाकमान इस बात से अनजान नहीं है कि उपचुनाव के नतीजे इस साल के आखिर में होने वाले विधानसभा चुनाव पर असर डाल सकते हैं. उपचुनाव के दौरान प्रचार अभियान की जिम्मेदारी पूरी तरह से मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के कंधों पर रही. दिल्ली के एक भी नेता ने उपचुनाव वाले किसी भी निर्वाचन क्षेत्र का दौरा नहीं किया. ऐसा करके संभवतः केंद्र ने यह संकेत दिया है कि उपचुनाव के नतीजों के लिए जवाबदेह सिर्फ वसुंधरा राजे ही होंगी.

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उपचुनाव में प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने अजमेर और मांडलगढ़ पर ज्यादा ध्यान दिया. क्योंकि इन जगहों पर बीजेपी रेस में नजर आ रही थी. जबकि अलवर लोकसभा सीट पर खास तवज्जो नहीं दी गई. अलवर के उम्मीदवार को अपनी लड़ाई खुद ही लड़ने के लिए छोड़ दिया गया. ऐसी चर्चा है कि बीजेपी उम्मीदवार, जो वसुंधरा राजे सरकार में मंत्री भी हैं, वह अलवर लोकसभा सीट जीतने के लिए जरा भी उत्सुक नजर नहीं आए. ऐसा इसलिए क्योंकि वह राजस्थान में अपना मंत्रालय खोने और केंद्र सरकार में महज एक सांसद बनकर रहना नहीं चाहते.

एक फरवरी को वोटों की गिनती होगी. संभावना है कि उस दिन कांग्रेस 1-0 की बढ़त के साथ शुरुआत करेगी. आखिर में यह बढ़त अगर 2-0 से कांग्रेस के पक्ष में बदल जाए, तो इसके लिए दो घटनाओं को श्रेय दिया जाना चाहिए: आनंद पाल का एनकाउंटर और फिल्म पद्मावत की रिलीज.

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