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राजस्थान उपचुनाव: संकट में बीजेपी क्योंकि बात सिर्फ दिसंबर के विधानसभा चुनाव की नहीं

अजमेर और अलवर के नतीजे केंद्रीय राजनीति पर भी गंभीर असर डालेंगे क्योंकि गुजरात में बीजेपी की मुश्किल जीत के फौरन बाद इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती

Shivam Vij Updated On: Feb 02, 2018 10:10 PM IST

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राजस्थान उपचुनाव: संकट में बीजेपी क्योंकि बात सिर्फ दिसंबर के विधानसभा चुनाव की नहीं

सत्तारूढ़ पार्टियां आमतौर पर उपचुनाव जीत ही जाती हैं क्योंकि मतदाताओं को ऐसा सांसद या विधायक चुनने का फायदा मिलता है, जिसका संबंध सत्ताधारी पार्टी से होता है. उस सासंद या विधायक की सरकार में पहुंच होती है और वह इलाके के काम करा सकता है. यही वजह है कि राजस्थान में बीजेपी की 3-0 से हार ना सिर्फ मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए भी प्रत्यक्ष संकेत है.

कांग्रेस की अलवर में जीत की काफी ज्यादा उम्मीद की जा रही थी और अजमेर में कांटे की टक्कर में बीजेपी की मामूली बढ़त मानी जा रही थी. इसकी बड़ी वजह ये थी कि यहीं पर सचिन पायलट साल 2014 के लोकसभा चुनाव में 2 लाख वोटों के अंतर से हार गए थे. लेकिन वह इस बार चुनाव नहीं लड़ रहे थे. जिस वजह से यह धारणा बनी कि उन्हें खुद की जीत की उम्मीद नहीं थी. कांग्रेस उम्मीदवार रघु शर्मा, एक पूर्व विधायक, सही मायनों में कोई दमदार नेता नहीं थे. इसके बावजूद उन्हें चुनाव मैदान में उतार गया.

चुनावी जोर आजमाइश के बीच कांग्रेस के भीतर राजनीतिक रस्साकशी भी जारी थी. कांग्रेस में सचिन पायलट और अशोक गहलोत खेमे की अंदरूनी लड़ाई चल रही थी. राज्य कांग्रेस के अध्यक्ष युवा सचिन पायलट लोकप्रिय कांग्रेस नेता अशोक गहलोत को किनारे लगाने में लगे हुए थे.

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उधर बीजेपी  भी दिवंगत सांसद सांवर लाल जाट के बेटे को टिकट देकर अपनी जीत को लेकर आधी आश्वस्त थी. वसुंधरा राजे सरकार और उनकी करीब-करीब पूरी कैबिनेट ने कई दिन तक अजमेर में प्रचार किया था. राजे सरकार और बीजेपी ने राजपूत विरोधी ना दिखाई दें, इसके लिए सब कुछ किया और फिल्म पद्मावत को रिलीज नहीं होने देने के लिए सिर-धड़ की बाजी लगा दी.

इन सबके बावजूद बीजेपी बड़े अंतर से अजमेर हार गई. मतदाताओं ने लोकसभा और विधानसभा में अलग तरीके से बर्ताव किया. उनके दिमाग में केंद्र सरकार थी. साल 2014 में बीजेपी ने अजमेर भी मोदी के नाम पर लड़ा था. वैसे भी 2014 के बाद मोदी फैक्टर ने ही बीजेपी को हर चुनाव में जीत दिलाई है.

अधिकांश टिप्पणीकार इस चुनाव का आकलन साल 2018 के राजस्थान विधानसभा चुनाव के परिप्रेक्ष्य में कर रहे हैं लेकिन अजमेर और अलवर के नतीजे केंद्रीय राजनीति पर भी गंभीर असर डालेंगे. गुजरात में बीजेपी की मुश्किल जीत के फौरन बाद इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि साल 2014 की मोदी लहर पर असर पड़ता जा रहा है.ग्रामीणों की परेशानी, कृषि संकट और बेरोजगारी हर राज्य में दिखाई दे रही है.

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अलवर में कांग्रेस के अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद की जा रही थी. यह ऐसी सीट थी जिसे बीजेपी ने 2014 में जीता था. जैसा कि राजस्थान में हर सीट पर हुआ था. अलवर में कांग्रेस की जीत में 1.44 लाख वोट का अंतर महत्वपूर्ण है. अगर अजमेर और अलवर में कांग्रेस की जीत का अंतर कुछ इशारा देता है तो यही लगता है कि कांग्रेस राजस्थान में स्पष्ट बहुमत से जीतने वाली है. हालांकि दिसंबर तक बहुत कुछ बदल भी सकता है.

मंडलगढ़ उपचुनाव और भी महत्वपूर्ण है जहां कांग्रेस ने 40,000 वोट काटने वाले बागी उम्मीदवार के बावजूद जीत दर्ज की. बागी प्रत्याशी को सचिन पायलट धड़े का करीबी माना जा रहा था. फिर भी कांग्रेस ने 17,000 वोट से चुनाव जीत लिया. एक बार फिर यह दर्शाता है कि बीजेपी ना सिर्फ हारी बल्कि कांग्रेस में अंदरूनी लड़ाई और उसके बागी उम्मीदवार के बाद भी बड़े अंतर से हारी.

गुजरात-हिमाचल में जीत के नतीजे आने के बाद बीजेपी हेडक्वाटर के बाहर जीत का निसान दिखाते पार्टी अध्यक्ष अमित शाह (फोटो: पीटीआई)

आसमान पर लिखी इबारत बिल्कुल साफ है. बीजेपी संकट में है और मसला सिर्फ दिसंबर के विधानसभा चुनाव का नहीं है. साल 2014 में बीजेपी ने गुजरात और राजस्थान में हर एक सीट जीती थी. उत्तर प्रदेश में  80 में से 71 सीटें जीती थीं जबकि बीजेपी के सहयोगी अपना दल ने अन्य दो सीटें जीती थीं. पिछले साल उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 312 सीटें जीतीं थीं. लेकिन अब गुजरात विधानसभा चुनाव और राजस्थान उपचुनाव बताते हैं कि कम से कम ग्रामीण मतदाता मोदी लहर से बाहर निकल रहे हैं और मोदी-पूर्व सत्ताविरोधी रुझान की तरफ लौट रहे हैं. अगर यह रुझान जारी रहा तो मोदी की अगुवाई वाली बीजेपी की संभावनाओं को साल 2019 में गंभीर झटका लग सकता है. ये रुझान बताते हैं कि बीजेपी ने साल 2014 में जिन राज्यों में जीत हासिल की थी, वहां आधी सीटें गंवा भी सकती है. इसका मतलब है कि इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि 2019 में एक कमजोर बीजेपी सरकार का नेतृत्व कर रही होगी.

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