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राजस्थान उपचुनाव: सेमीफाइनल के जश्न में न डूबे कांग्रेस, ग्रैंड फिनाले तो अभी बाकी है

पायलट और उनकी टीम जश्न मना सकती है लेकिन इसी समय ये भी ध्यान रखना होगा कि उपचुनाव या कहें कि सेमीफाइनल के ये नतीजे कांग्रेस या पायलट की जीत से ज्यादा वसुंधरा राजे की हार है

Updated On: Feb 02, 2018 08:51 AM IST

Mahendra Saini
स्वतंत्र पत्रकार

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राजस्थान उपचुनाव: सेमीफाइनल के जश्न में न डूबे कांग्रेस, ग्रैंड फिनाले तो अभी बाकी है

तुलसी दास जी ने राम चरित मानस में लिखा है कि होइहि सोइ जो राम रचि राखा. राजस्थान में अजमेर, अलवर लोकसभा और मांडलगढ़ विधानसभा उपचुनाव के तीनों नतीजों में मुंह की खाने के बाद बीजेपी के सामने भी अब यही सवाल है. क्या उसकी हार और सरकार में होने के बावजूद इतना बुरा प्रदर्शन भी भगवान की ही मर्जी है?

ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि सत्ता के 5वें साल में होने के बावजूद न पार्टी और न ही सरकार ने मतदाताओं से अपने काम के आधार पर वोट मांगे. इसके बजाय वोट मांगने की एक बानगी देखिए- अलवर में बीजेपी उम्मीदवार जसवंत यादव ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि जो असली हिंदू है वो उन्हें ही वोट देगा.

मेव इलाकों में लोगों ने जब पूछा कि गौरक्षा के नाम पर मार दिए गए पहलू खान और उमर जैसे लोगों की जान क्या किसी पशु से भी सस्ती है? तो रामगढ़ विधायक ज्ञानदेव आहूजा ने कहा कि मुसलमान अगर गाय की खरीद फरोख्त करेंगे तो यूं ही मारे जाते रहेंगे.

कानून व्यवस्था और शांति, सुरक्षा के लिए जिम्मेदार गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया की तरफ से इसे मूक समर्थन दिया गया. यही नहीं अलवर शहर विधायक बनवारी सिंघल ने तो वोटों के लिए हिंदुओं से कहा कि चेतो, संभल जाओ वरना मुस्लिम राज आ जाएगा और वो तुम्हारी बोटियां ही नहीं बेटियां भी नोंच खाएंगे. कहने की जरूरत नहीं कि संभलना और चेतना तब होता जब बीजेपी को वोट दिया जाता.

इस सबके बावजूद वो कौन से कारण रहे कि बीजेपी अपनी लाज बचाने लायक प्रदर्शन नहीं कर पाई. आखिर 4 साल में ही लोगों को इतनी नफरत कैसे हो गई कि अजमेर के 2 गांवों से तो पार्टी को एक भी वोट नहीं मिला.

बीजेपी की हार का कारण नंबर 1: उसी कारण हारे, जिस कारण जीते थे!

2013 में बीजेपी को जनता ने इतनी सीटें दी थीं जितनी आजादी दिलाने का दावा करने वाली कांग्रेस आजादी के तुरंत बाद भी नहीं जीत पाई थी. ये इतनी थी, जितनी राजस्थान में पार्टी की जड़ें जमाने वाले भैरों सिंह शेखावत भी नहीं ला पाए थे. 200 में से पार्टी ने 163 सीटें जीती थी.

Vasundhara Raje

तब बीजेपी या खुद वसुंधरा राजे से ज्यादा योगदान एक मोदी सुनामी का था. वसुंधरा राजे ने जीत के तुरंत बाद अपने पहले भाषण में इसे कबूल भी किया था, लेकिन एक बड़ी वजह और थी. पहले मैं सोचता था कि कि उस वजह को मौजूदा बीजेपी ने जानबूझकर क्रेडिट नहीं दिया, लेकिन मौजूदा हार देख कर लग रहा है कि पार्टी उसे समझ ही नहीं पाई थी.

ये वजह है, कांग्रेस की पिछली गहलोत सरकार की नाकामी. गहलोत सरकार पर आरोप था कि उसने 4 साल तक कुछ नहीं किया. जो करने की कोशिश की गई या करने का दिखावा किया गया, वो ज्यादातर सत्ता के 5वें साल में ही किया गया. फिर चाहे वे नई भर्तियां हों या फिर रिफाइनरी जैसी बड़ी योजनाओं का शिलान्यास.

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जनता, खासकर युवा दुखी थे और ऐसी सरकार की हार परिवर्तन के साथ नई उम्मीदें भी लेकर आने वाली थी. अफसोस कि परिवर्तन तो हुआ पर सिर्फ सत्ता का. उम्मीदें कहीं किसी गहराई में दबी ही रही. बीजेपी ने 5 साल में 15 लाख नौकरियों का वादा किया था. जबकि हाल ये है कि धरातल पर इसकी 1% नियुक्तियां भी बमुश्किल दिखी हैं.

सरकार के कामकाज का हाल ये है कि जो रिफाइनरी पश्चिमी राजस्थान में नौकरियों और समृद्धि के नए दरवाजे खोल सकती थी, 4 साल बाद प्रधानमंत्री से उसका दोबारा शिलान्यास ही कराया गया है. यानी बीजेपी सरकार भी एक्शन में आती दिखी है तो चुनावी साल में ही. अब ऐसे में मतदाता और खासकर युवा सबक न सिखाते तो क्या करते?

हार का कारण नंबर 2: अपने कोर वोटर की अनदेखी

सवर्ण यानी ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य समुदाय बीजेपी के कोर वोटर माने जाते हैं लेकिन सत्ता की मदहोशी में देखा गया कि इनकी ही नहीं बल्कि आम कार्यकर्ता की भी अनदेखी की गई है, जनता की तो बात ही क्या करें ! राजपूतों की बात करें तो आनंदपाल एनकाउंटर मामले को सही तरीके से हैंडल नहीं किया गया. आनंदपाल को उसके जीते जी बड़े राजपूत अपने पास भी नहीं बैठाते थे लेकिन वो क्या कारण रहे कि इस गैंगस्टर की मौत पर पूरा समाज एकजुट हो गया.

आनंदपाल सिंह के राज्य सरकार के मंत्रियों से संबंध बताए जा रहे हैं

हफ्तों तक राजस्थान सुलगता रहा लेकिन बीजेपी ने इस मामले को अंग्रेजों की बांटों और राज करो कि नीति से सुलझाने की कोशिश की. इसने राजपूत समुदाय को और भड़का दिया. बाद में जांच सीबीआई को देने के नाम पर लीपापोती की कोशिश की गई लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी.

भैरों सिंह शेखावत के दामाद नरपत सिंह राजवी, पूर्व विदेश मंत्री जसवंत सिंह और उनके विधायक बेटे मानवेंद्र सिंह से वसुंधरा राजे की 'रंजिश' भी राजपूतों में नाराजगी का बड़ा कारण है. गुजरात मे पाटीदारों से मिले सबक के बाद फिल्म पद्मावत के विरोध को समर्थन देकर राजपूतों को वापस अपने पाले में लाने की नाकाम कोशिश की गई लेकिन सरकार के इस कदम ने आम जनता के बीच गलत संदेश दे दिया.

ब्राह्मण समुदाय भी बीजेपी से खफा चल रहा है. सांगानेर विधायक और ब्राह्मण नेता घनश्याम तिवाड़ी से वसुंधरा राजे की निजी नाराजगी भी जगजाहिर है. ब्राह्मणों ने भी पहले ही पाटीदारों की तरह बीजेपी को सबक सिखाने का ऐलान कर दिया है.

वैश्य समुदाय भी इस बार बीजेपी से नाराज दिख रहा है. माना जा रहा है कि लेसकैश इकोनॉमी को बढ़ावा देने की नीतियों ने कारोबार की हवा निकाल दी है. जीएसटी और नोटबंदी के बाद व्यापारी मंदी से जूझ रहा है. ऊपर से नोटबंदी के बाद पड़ रहे छापे भी युवा मारवाड़ियों को मन बदलने पर मजबूर कर रहे हैं.

हार का कारण नंबर 3: बीजेपी की अवसरवादी-जातिवादी राजनीति

उपचुनाव में 3-0 की हार में आम जनता के मन में बीजेपी के लिए काम हुई इज्जत भी है. राजस्थान में 65% से ज्यादा लोग साक्षर हैं. साफ है कि अब जुमलों से बहकाना आसान नहीं है.

लेकिन बीजेपी की नीति में अवसरवादिता ही ज्यादा दिखी है. विकास की बात करते-करते पार्टी ध्रुवीकरण पर आ जाती है. प्रधानमंत्री मन की बात में जातिवाद को देश के पिछड़ने का मुख्य कारण मानते हैं लेकिन राजस्थान में टिकट बंटवारे से लेकर चुनाव प्रभारियों और स्टार प्रचारकों तक की सूची में जातिवाद साफतौर पर दिखा है. अलवर में 3 लाख से ज्यादा यादव हैं तो इसी जाति का प्रत्याशी, अजमेर में जाट प्रत्याशी और मांडलगढ़ में राजपूत प्रत्याशी इसी का नतीजा है.

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इसने पढ़े-लिखे और खासकर युवा मतदाताओं के बीच पार्टी की छवि को बिगाड़ा ही है. ऊपर से मंत्रियों के दकियानूसी बयानों ने भी इसे बिगाड़ने में सहयोग ही किया है. एक मिसाल देखिए कि सिलेबस से हल्दीघाटी युद्ध का नतीजा बदल दिया गया, शिक्षामंत्री ने न्यूटन के सिद्धांत को झुठला दिया और गाय की जुगाली में ऑक्सीजन निकलने का दावा कर दिया गया.

हार का कारण नंबर 4: गुर्जर आरक्षण की उलझन

गुर्जर आरक्षण की आग राजे सरकार के पिछले कार्यकाल से ही सुलग रही है. 2007 और 2008 के आंदोलनों में दर्जनों युवाओं को आरक्षण की मांग पर जान गवानी पड़ी थी. 2013 में बीजेपी ने एक बार फिर गुर्जरों को आरक्षण का वादा किया था लेकिन एक बार फिर ये वादा नीतिगत मुद्दों में उलझ कर राह गया है. मैं अपने पिछले कई लेखों में इसपर विस्तार से चर्चा कर चुका हूं.

gurjar agitation

2008 के गुर्जर आंदोलन के दौरान की तस्वीर. (रायटर इमेज)

यहां ये बताना चाहूंगा कि विधानसभा से बार बार पारित प्रस्तावों के अदालत में अटक जाने के बाद गुर्जरों के मन मे एक ही बात मजबूती से जम गई है. वही, जो आज कांग्रेस उपाध्यक्ष गोपाल सिंह ने कही कि गुर्जर समुदाय समझ गया है कि बीजेपी आरक्षण को लटकाए रखना चाहती है. गुर्जर कांग्रेस वोटर हुआ करते थे और आरक्षण की उम्मीद में वे बीजेपी को वोट देने लगे थे. अब एक बार फिर वे कांग्रेस से अच्छे दिनों की उम्मीद कर रहे हैं.

अजमेर और अलवर लोकसभा क्षेत्रों में गुर्जरों की अच्छी खासी आबादी है. खुद कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट (जो कि गुर्जर हैं) अजमेर से सांसद रह चुके हैं. अब लग रहा है कि पायलट गुर्जरों की घर वापसी करने में कामयाब रहे हैं.

...लेकिन कांग्रेस जश्न में न डूबे!

बहरहाल, उपचुनाव की जीत कांग्रेस के लिए बहुत बड़ी खुशी लेकर आई है. इन उपचुनावों को सेमीफाइनल माना जा रहा था. इनमे पायलट और उनकी टीम ने मेहनत भी बहुत की थी. आखिर ये जीत अगले सीएम के तौर पर अशोक गहलोत के सामने उनकी दावेदारी भी मजबूत करने वाली थी.

इसमे कोई शक नहीं कि सचिन पायलट अपने इस इम्तिहान में कामयाब रहे हैं. अब पायलट वो सपना भी देख सकते हैं जिसके लिए गहलोत ने उन्हें मना किया था. गहलोत ने कहा था कि प्रदेशाध्यक्ष बनते ही मुख्यमंत्री बनने का सपना नहीं देखना चाहिए.

पायलट और उनकी टीम जश्न मना सकती है लेकिन इसी समय ये भी ध्यान रखना होगा कि उपचुनाव या कहें कि सेमीफाइनल के ये नतीजे कांग्रेस या पायलट की जीत से ज्यादा वसुंधरा राजे की हार हैं. अगले 7 महीने कांग्रेस को और ज्यादा मेहनत करनी होगी, क्योंकि निश्चित रूप से इन नतीजों ने बीजेपी दफ्तर में हलचल तो मचा ही दी है. अब संगठन में नेतृत्व परिवर्तन के साथ ही सरकार में लोकलुभावन मुद्दों पर आगे बढ़ने की सुरसुराहट होने लगी है.

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