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राजस्थान उपचुनाव: जानिए कहां तक है सचिन पायलट की उड़ान...

कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष सचिन ने सबको चौंकाते हुए अपनी जगह पार्टी के ज़मीनी नेता रघु शर्मा को क्यों आगे बढ़ाया

FP Staff Updated On: Feb 01, 2018 01:33 PM IST

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राजस्थान उपचुनाव: जानिए कहां तक है सचिन पायलट की उड़ान...

अजमेर सीट बीजेपी का मजबूत गढ़ मानी जाती है. पिछले आठ लोकसभा चुनावों में छह बार यहां बीजेपी ने जीत दर्ज की है. विधानसभा सीटों पर नज़र डालें तो जिले के आठों विधायक बीजेपी के हैं.

बीजेपी के सीनियर नेता और अजमेर से सांसद सांवरलाल जाट ने 2014 के लोकसभा चुनावों में सचिन पायलट को शिकस्त दी थी. सांवरलाल की मृत्यु के बाद जब इस सीट पर उपचुनाव की घोषणा हुई तो ये तय माना जा रहा था कि सचिन ही दावेदार होंगे. हालांकि कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष सचिन ने सबको चौंकाते हुए अपनी जगह पार्टी के ज़मीनी नेता रघु शर्मा को आगे बढ़ाया.

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, पायलट ने ऐसा काफी सोच समझकर किया है, क्योंकि अशोक गहलोत की ही तरह उन्होंने भी राजस्थान का सीएम बनने का सपना संजोया हुआ है. ऐसे में उपचुनावों का रिजल्ट काफी हद तक तय करेगा कि आने वाले उपचुनावों में सीएम कैंडिडेट किसे बनाया जाएगा.

टेढ़ी खीर रही है अजमेर सीट

अजमेर सीट बीजेपी का मजबूत गढ़ मानी जाती है. पिछले आठ लोकसभा चुनावों में छह बार यहां बीजेपी ने जीत दर्ज की है. विधानसभा सीटों पर नज़र डालें तो जिले के आठों विधायक बीजेपी के हैं. इसी जिले से आने वाले दो विधायक वासुदेव देवनानी और अनीता भदेल तो मंत्री भी हैं. इसके अलावा बीजेपी ने सांवरलाल जाट के बेटे रामस्वरूप लांबा को उतार कर कांग्रेस के लिए ये चुनाव और मुश्किल कर दिया है. रघु शर्मा का राजनैतिक इतिहास बहुत अच्छा नहीं रहा है. अभी तक वे तीन विधानसभा और एक बार लोकसभा चुनाव लड़कर सिर्फ एक बार विधायक बन पाए हैं.

पायलट ने बचा लिया है खुद को

अजमेर सीट से उपचुनाव न लड़ने का फैसला भी इसी को देखते हुए लिया गया, क्योंकि अगर एक बार फिर पायलट अपनी सीट बचाने में नाकाम रहते तो अशोक गहलोत का वज़न बढ़ना तय था. दूसरी तरफ अगर वो इस पर जीत भी जाते तो 2019 के लोकसभा चुनावों में एक साल बाद ही उन्हें फिर से इसी अग्निपरीक्षा से गुजरना होता. दोनों ही स्थितियों में उनकी सीएम कैंडिडेट की उम्मीदवारी खतरे में रहती. गुजरात में अशोक गहलोत के कांग्रेस प्रभारी रहते हुए पार्टी ने दमदार प्रदर्शन किया है.

रघु शर्मा भी घाटे का सौदा नहीं!

जनाकारों के मुताबिक सिर्फ ये समझना कि पायलट ने रघु शर्मा को अपनी सीएम कैंडिडेट कि उम्मीदवारी बचाने के लिए आगे किया है पूरी तरह सही नहीं है. पायलट ने भी कांग्रेस के पुराने स्टाइल की तरह ही जातिगत समीकरणों को ध्यान में रखकर उम्मीदवार चुने हैं. बता दें कि अजमेर जाट और गुर्जर बहुल क्षेत्र है हालांकि इस इलाके में मुस्लिम, राजपूत, ब्राह्मण, वैश्य और रावत समुदाय से जुड़े लोग भी बड़ी तादाद में रहते हैं. बीजेपी के उम्मीदवार रामस्वरूप लांबा जाट समुदाय से आते हैं वहीं पायलट गुर्जरों के नेता माने जाते हैं. ब्राह्मण और वैश्य बीजेपी के परंपरागत वोटर्स माने जाते हैं लेकिन पायलट ने रघु शर्मा के जरिए इसी वोट बैंक में सेंध लगाने का दांव खेला है.

पायलट का कद बढ़ रहा है

राहुल गांधी और पायलट की नजदीकियों के चलते राजस्थान संगठन के युवाओं में उनकी लोकप्रियता बाकी नेताओं के मुकाबले काफी ज्यादा है. पायलट को प्रदेशाध्यक्ष बनाकर आलाकमान ने भी साफ़ कर दिया है कि वो उन्हें राजस्थान के भविष्य के तौर पर देख रहा है. जानकारों का मानना है कि यदि किन्हीं कारणों से रघु शर्मा जीतने में असफल रहे तो भी इसकी तोहमत उनके माथे नहीं लगेगी.

लेकिन यदि वे यह चुनाव जीत पाए तो सचिन पायलट के साथ जीत का सेहरा कहीं न कहीं उनके सर भी बांधा जाएगा और उनकी गिनती प्रदेश कांग्रेस के बड़े नामों में की जाने लगेगी. पायलट के नेतृत्‍व में कांग्रेस पहली बार चुनाव लड़ रही है और अजमेर के अलावा अलवर क्षेत्र में उनका अच्‍छा प्रभाव माना जाता है. कुख्यात गैंगस्टर आनंदपाल के एनकाउंटर से नाराज़ राजपूतों को भी पायलट ने अपनी तरफ मिलाने के लिए कई मुलाकातें की हैं.

अशोक गहलोत हैं सबसे बड़ी मुश्किल

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को पायलट की राह का प्रमुख रोड़ा माना जाता है. गहलोत ने खुलकर कहा भी है कि पार्टी अध्यक्ष (पायलट) को अपना ध्यान मुख्यमंत्री पद पर नहीं लगाना चाहिए. उन्होंने बार-बार कहा है कि वे अब भी खुद को राजस्थान के भावी सीएम के बतौर देखते हैं. सूत्रों के मूताबिक गहलौत का खेमा चाह रहा है कि आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले उन्हें मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट किया जाए.

उप चुनाव में हार गहलौत के खेमे को मजबूत कर देगा और अगर ऐसा हुआ तो फिर ये लोग राहुल गांधी से मिल सकते हैं. दूसरी तरफ पायलट एक युवा नेता हैं और गहलोत की तरह उनके पास समर्थकों की लंबी-चौड़ी फौज भी नहीं है. बता दें कि अलवर और अजमेर लोकसभा सीटों में 8-8 विधानसभा सीटें हैं जिसके चलते इन्हें विधानसभा चुनावों की रिहर्सल माना जा रहा है.

(न्यूज18 से साभार)

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