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राजस्थान विधानसभा चुनाव 2018 : हिंदुत्व नहीं इस बार जातीय गणित बनेगा किंगमेकर

इस बार राजस्थान में एंटी इनकंबेंसी का अंडर करंट दिख रहा है

Updated On: Oct 20, 2018 11:51 AM IST

FP Politics

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राजस्थान विधानसभा चुनाव 2018 : हिंदुत्व नहीं इस बार जातीय गणित बनेगा किंगमेकर
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राजस्थान की राजनीति में कई जातियों का समीकरण है. ऐसी जातियां, जो एक-दूसरे से कभी नहीं मिलतीं. इस साल होने वाले विधान सभा चुनाव में भी जातियों के बीच जंग देखने को मिलेगी. दिसंबर में होने वाले चुनाव के लिए चार जातियों को सबसे अहम माना जा सकता है- जाट, राजपूत, गुर्जर और मीणा. इनके बीच की राजनीति और प्रतिद्वंद्विता चुनाव नजदीक आते-आते लगातार बढ़ती दिखेगी. इसका एक नजारा दिखा भी. मानवेंद्र सिंह ने कांग्रेस जॉइन करने का फैसला किया और मीणा हैवीवेट किरोणी लाल ने कांग्रेस प्रमुख सचिन पायलट पर हमला बोला.

राजस्थान के ज्यादातर हिस्सों में जाट और राजपूत पारंपरिक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं. वे आमतौर पर हमेशा राजस्थान की दो विपक्षी पार्टियों का समर्थन करते हैं. जाट आमतौर पर कांग्रेस के समर्थक माने जाते हैं. दूसरी तरफ राजपूत विपक्षी पार्टी के साथ होते हैं. पहले वे स्वतंत्र पार्टी के समर्थक थे, बाद में बीजेपी से जुड़ गए.

इस साल जाट कई विकल्पों को देख रहे हैं. इनमें से एक हनुमान बेनीवाल हैं. बेनीवाल आक्रामक युवा नेता हैं, जो पश्चिमी राजस्थान में वोटर्स को प्रभावित करते हैं. बेनीवाल तीखी जुबान के ऐसे नेता हैं, जिन्हें नियंत्रित करना आसान नहीं. पहले भी वो बीजेपी और कांग्रेस दोनों के खिलाफ लड़ाई लड़ चुके हैं. 29 अक्टूबर को जयपुर में वो अपनी ताकत का प्रदर्शन करना वाले हैं. यहां वो नई पार्टी और गठबंधन का ऐलान करेंगे. कांग्रेस और बीजेपी दोनों इस पर नजर रखे हैं, क्योंकि उनकी पार्टी राज्य के कई हिस्सों में तीसरी ताकत की तरह होगी.

Manvendra Singh quits BJP

उनके असर का सामना करने के लिए कांग्रेस ने पहली चाल चली है. इसी के तहत राजपूत नेता मानवेंद्र सिंह को शामिल किया गया है. सिंह का परिवार पश्चिमी राजस्थान की कई सीटों पर असर डाल सकता है. यहीं पर बेनीवाल का भी असर है. मानवेंद्र सिंह के जरिए जाट वोटों के नुकसान की भरपाई कांग्रेस कर सकती है. राजपूत पहले ही कह चुके हैं कि वे खुद को किनारे किए जाने की वजह से बीजेपी से नाराज हैं. ऐसे में सिंह का आना इस समुदाय में कांग्रेस की पकड़ मजबूत करेगा.

इसमें चुनौती यकीनन यह होगी कि राजपूतों को अपनी तरफ करने से मिलने वाला फायदा जाट वोटर्स के छिटकने से होने वाले नुकसान से ज्यादा हो. इसे सुनिश्चित करना जरूरी है. पश्चिमी राजस्थान में जाटों की संख्या काफी ज्यादा है. ऐसे में यह कदम राजनीतिक शतरंज में निर्णायक हो सकता है.

कांग्रेस ऐसी स्थिति की उमीद कर रही है, जहां ताकतवर समुदाय का आना बाकी समुदायों को साथ ला सके. कांग्रेस को उम्मीद है कि बेनीवाल का उभार और उनके साथ जाटों के आने से मुस्लिम, राजपूत और ब्राह्मण वोट एकजुट हो जाएंगे.

राज्य में एक और प्रतिद्वंद्विता उभर रही है. वो है गुर्जर और मीणा के बीच. पूर्वी राजस्थान और जयपुर के आसपास अपना दबदबा जमाने के लिए इन समुदायों के बीच जंग है. बुधवार को मीणा समुदाय के ताकतवर नेता किरोणीलाल ने कांग्रेस के प्रमुख पायलट पर हमला बोलकर पुरानी प्रतिद्वंद्विता जगाई. किरोणीलाल हाल ही में बीजेपी में शामिल हुए हैं, जबकि पायलट गुर्जर हैं.

किरोड़ी लाल मीणा

किरोड़ी लाल मीणा

मीणा ने पायलट ने गुर्जर समुदाय की मांग को लेकर सवाल किया, जो अनुसूचित जनजाति में शामिल करने को लेकर हैं. कोटा का लाभ अनुसूचित जनजाति को पहुंचाने से सबसे ज्यादा फायदे में मीणा हैं. गुर्जर इसी तरह के फायदे की मांग कर रहे हैं. दोनों समुदाय एक-दूसरे के खिलाफ हमेशा दिखाई देते हैं.

मीणा का खेल आसान सा है. गुर्जर मुख्यमंत्री के खिलाफ डर भरा जाए और मीणाओं को कांग्रेस के खिलाफ एकजुट किया जाए. मीणा ने पिछले दो चुनावों में लगातार अदल-बदल की वजह से राजनीतिक जमीन खोई है. ऐसे में अभी तय नहीं कि मीणा उनकी बात कितना सुनेंगे. लेकिन गुर्जर बनाम मीणा करने की उनकी कोशिश के बीच कांग्रेस सावधानी से अगला कदम रखने के लिए मजबूर होगी.

मीणा न सिर्फ पूर्वी राजस्थान में काफी तादाद में है, उसके अलावा, गांव में वोटिंग पर उनका काफी असर दिखाई देता है. पश्चिमी राजस्थान की तरह मीणा के उभरने से बाकी जातियों के काउंटर पोलराइजेशन की उम्मीद भी बंधती है. यहां जातियों का समीकरण कैसा बनता है, उस पर इस क्षेत्र में चुनाव का नतीजा तय होगा.

इतिहास पर नजर डालें तो पाएंगे कि राजस्थान की राजनीति में जातियां अहम रोल अदा करती हैं. इसका अपवाद सिर्फ वो चुनाव हैं, जहां किसी की लहर हो. जाटों और राजपूतों ने किसी एक ही पार्टी को पहली बार शायद 1989 में वोट दिया होगा. तब भैरों सिंह शेखावत और चौधरी देवी लाल कांग्रेस के खिलाफ प्रचार कर रहे थे. उस समय बीजेपी और वीपी सिंह के जनता दल के बीच गठबंधन था. 2013-14 में नरेंद्र मोदी की लहर ने जातियों की बाधाओं को तोड़ दिया था. इससे बीजेपी के लिए राज्य में सफाया करना तय हो गया.

इस बार राजस्थान में एंटी इनकंबेंसी का अंडर करंट दिख रहा है. अगर ये कैंपेन के दौरान चरम पर पहुंचता है, तो जातियों का गणित कमजोर पड़ जाएगा. ऐसा नहीं होता, तो ये अहम रोल अदा करेगा. एक बात तय है. राज्य में इस बार हिंदुत्व का मुद्दा नहीं है. जाति ही किंगमेकर साबित होगी.

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