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राजस्थान: दलित मुद्दा बीजेपी की सबसे बड़ी मुश्किल

तमाम कोशिशों के बावजूद कुछ न कुछ ऐसा देखने को जरूर मिल जाता है जिससे लगता है कि निम्न वर्गों के प्रति बीजेपी नेताओं की कथनी और करनी में भारी अंतर है.

Mahendra Saini Updated On: May 14, 2018 06:06 PM IST

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राजस्थान: दलित मुद्दा बीजेपी की सबसे बड़ी मुश्किल

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद 2 दिन के राजस्थान दौरे पर हैं. राष्ट्रपति चुनाव के समय रामनाथ कोविंद को उम्मीदवार बनाते समय बीजेपी ने उनके दलित होने पर काफी जोर दिया था. दलित जाति पर जोर देने के पीछे सोच ये थी कि आमतौर पर सवर्ण पहचान वाली बीजेपी दलित वर्ग के बीच भी पैठ बना सके. इसी रणनीति के तहत उत्तर प्रदेश में कथित नीची जातियों के घरों में बीजेपी नेताओं के खाना खाने के कार्यक्रम भी बनाए गए.

खासकर, 2 अप्रैल की अनुसूचित जाति और जनजातियों की रैली के बाद और कर्नाटक चुनाव के दौरान बीजेपी ने दलित वर्गों को लुभाने की पूरी कोशिशें की. राजस्थान में दलितों को अपने पाले में लाने की कोशिश में ही 2 अप्रैल की हिंसा के मद्देनजर दलितों पर दायर हुए मामलों को वापस लेने की बातें भी की जा रही हैं. लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद कुछ न कुछ ऐसा देखने को जरूर मिल जाता है जिससे लगता है कि निम्न वर्गों के प्रति बीजेपी नेताओं की कथनी और करनी में भारी अंतर है.

अभी राष्ट्रपति के दौरे के समय ही बीजेपी विधायकों के बीच एक बड़ा विवाद उठ खड़ा हुआ है. ये विधायक मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के क्षेत्र हाड़ौती से संबंधित हैं. इनमें एक हैं गुर्जर विधायक प्रहलाद गुंजल, एक दलित विधायक चंद्रकांता मेघवाल और तीसरे हैं, पूर्व मंत्री और कभी मुख्यमंत्री की फोटो को घर के मंदिर में रखकर पूजा करने वाले विधायक भवानी सिंह राजावत.

गुंजल ने कहा- तू नेता दो कौड़ी की

मामला 12 मई का है. कोटा में एक समीक्षा बैठक के दौरान प्रभारी मंत्री प्रभुलाल सैनी की अध्यक्षता में एक बैठक चल रही थी. इसी दौरान तीनों विधायकों के बीच गर्मागर्म बहस हो गई. बहस का स्तर इस कदर नीचा था कि कोटा उत्तर से विधायक प्रह्लाद गुंजल ने भरी सभा में चंद्रकांता मेघवाल को दो कौड़ी की नेता बता दिया. गुंजल ने कहा कि कैसे-कैसे दो कौड़ी के लोगों को हम राजनीति में ले आए.

चंद्रकांता मेघवाल और

चंद्रकांता मेघवाल और प्रह्लाद गुंजल

रामगंज मंडी से विधायक चंद्रकांता मेघवाल ने भी पलट कर जवाब दिया कि अगर अनुसूचित जाति वाले दो कौड़ी के हैं तो आप का स्तर भी इससे ऊंचा नहीं है. मेघवाल का कहना था कि अगर सार्वजनिक पद पर बैठा कोई शख्स किसी महिला की इज्जत नहीं कर सकता तो उसे इससे ज्यादा सम्मान भी नहीं दिया जा सकता. मेघवाल को इस पर भी आपत्ति थी कि प्रह्लाद गुंजल क्यों हर सार्वजनिक मंच पर उनकी बुराई करते हैं. उन्हें जातिसूचक शब्दों से प्रताड़ित करते हैं. चंद्रकांता मेघवाल ने तो सबके सामने गुंजल को चुनौती भी दे डाली कि अगर उनसे इतनी ही एलर्जी है तो निकलवा दीजिए पार्टी से.

बात सिर्फ इतनी थी कि विधायक प्रह्लाद गुंजल के क्षेत्र में एक अंडरपास का निर्माण होना था. लेकिन विधायक चंद्रकांता मेघवाल और पूर्व मंत्री भवानी सिंह राजावत इस अंडरपास का विरोध इस आधार पर कर रहे थे कि जहां ये प्रस्तावित है, वहां इसकी जरूरत ही नहीं है. चंद्रकांता मेघवाल इसे संसाधनों का दरुपयोग बताते हुए अपने विधानसभा क्षेत्र में नालियों और सड़कों के कामों को प्राथमिकता देने पर जोर दे रही थी. जबकि गुंजल का जोर इस पर था कि कोटा में इस अंडरपास की घोषणा खुद मुख्यमंत्री ने बजट भाषण में की थी.

प्रह्लाद गुंजल और चंद्रकांता मेघवाल के बीच की लड़ाई काफी वक्त से चल रही है. इस समीक्षा बैठक के दौरान ये लड़ाई खुलकर सामने आ गई. दोनों के अंदर एक दूसरे के प्रति गुस्से का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि पूरी बहस में इस बात का भी ख्याल नहीं रखा गया कि वहां पर प्रभारी मंत्री प्रभुलाल सैनी भी मौजूद थे, बाकी अधिकारियों की तो बात ही क्या.

प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंची शिकायत

अब ये मामला प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के ऑफिस तक पहुंच गया है. खुद चंद्रकांता मेघवाल ने ई-मेल भेजकर इसकी शिकायत की है. राष्ट्रीय संगठन महामंत्री रामलाल और प्रदेश संगठन महामंत्री चंद्रशेखर को भी उन्होने घटना का पूरा ब्यौरा भेजा है. चंद्रकांता ने अपनी चिट्ठी में लिखा है कि प्रभारी मंत्री, विधायकों और प्रशासनिक अधिकारियों के सामने प्रह्लाद गुंजल ने उनका घोर अपमान किया है. इससे वे आहत हैं और खुद को अपमानित, असुरक्षित और सदमे में महसूस कर रही हैं.

चंद्रकांता का आरोप है कि प्रह्लाद गुंजल की तरफ से पहली बार ऐसा नहीं किया गया है. इससे पहले भी वे कई बार शादी जैसे निजी समारोहों में और मीडिया में भी मेरी जाति को लेकर टिप्पणियां कर चुके हैं. मेघवाल के शब्दों में ये सिर्फ उनका नहीं बल्कि पूरे अनुसूचित समुदाय का अपमान है. मेघवाल ने पार्टी पदाधिकारियों से ये सुनिश्चित करने को भी कहा है कि गुंजल के खिलाफ कार्रवाई हो. मेघवाल के शब्दों में ऐसा नहीं होता है तो आने वाले चुनावों में अनुसूचित जातियां इसे अपने खिलाफ मान सकती हैं.

हालांकि प्रह्लाद गुंजल भी चंद्रकांता मेघवाल से आरपार के मूड में दिखते हैं. गुंजल का कहना है कि आरोपों से उनपर कोई फर्क नहीं पड़ता. गुंजल का दावा है कि उन्होने तो मुख्यमंत्री की बजट घोषणा को जल्द पूरा कराने की मांग उठाई थी. जबकि चंद्रकांता मेघवाल ने योजनाबद्ध तरीके से उनपर चीखना-चिल्लाना शुरू कर दिया. वैसे, गुंजल के लिए इस बार राहत की गुंजाइश दिखाई नहीं दे रही है. विधायक चंद्रकांता के समर्थन में पूरा मेघवाल समाज एकजुट हो गया है. उनके समर्थन में समाज के लोगों ने कई जगह गुंजल के पुतले फूंक कर विरोध जताया है.

क्या गुंजल पर गिरेगी गाज ?

vasundhara raje

पिछले कुछ दिन से बीजेपी के लिए दलित मुद्दा एक अनचाहे विवाद की तरह उभरा है. 2 अप्रैल की रैली में दलित युवकों के बीच बीजेपी के खिलाफ दिखे गुस्से को अभी दूर भी नहीं किया जा सका है. अब 2 विधायकों के बीच के विवाद में दलित बनाम गैर दलित का रंग आ जाने से पार्टी की पेशानी पर बल आ गए हैं. राष्ट्रपति के दौरे के समय इस विवाद का उठना पार्टी को ज्यादा परेशान कर रहा है.

बीजेपी और खुद वसुंधरा राजे के लिए ये मामला बहुत ही संवेदनशील बन गया है. बीजेपी को डर है कि कांग्रेस ने अगर इस मुद्दे को लपकने की कोशिश की तो मुश्किलें बढ़ सकती हैं. विधायक चंद्रकांता ने जिस तरीके और जिस रूप में पार्टी अध्यक्ष और प्रधानमंत्री कार्यालय तक शिकायत पहुंचाई है, उसे देखते हुए प्रह्लाद गुंजल पर कार्रवाई करना लाजिमी हो गया है. लेकिन पार्टी के लिए अब हालात आगे कुआं तो पीछे खाई जैसे हो गए हैं. क्योंकि दोनों ही समुदाय विपरीत कार्रवाई को खुद के खिलाफ समझ सकते हैं.

प्रह्लाद गुंजल गुर्जर समाज के बड़े नेता हैं. पहले के आरक्षण आंदोलनों में उनकी प्रभावी भूमिका रही है. राज्य में अब नए सिरे से गुर्जर आरक्षण आंदोलन की सुगबुगाहट शुरू हो चुकी है. ऐसे समय में अगर गुंजल पर कार्रवाई होती है तो इससे गुर्जर भड़क भी सकते हैं. लेकिन गुंजल पर कार्रवाई नहीं होती तो ये अनुसूचित जातियों में बीजेपी के प्रति नाराज़गी को और बढ़ा सकता है. इन दिनों वैसे ही गुजरात के जिग्नेश मेवाणी राजस्थान में घूम-घूमकर दलित एकता का झंडा बुलंद करने की कोशिश कर रहे हैं.

हाड़ौती संभाग बीजेपी का पुराना गढ़ है और मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का निर्वाचन क्षेत्र भी. कई बार देखा गया है कि बीजेपी के लिए बाकी इलाकों में रही कमी को अकेला हाड़ौती संभाग पूरा करता आया है. अगर यहां गुर्जर या अनुसूचित वर्ग में से किसी भी समुदाय की नाराजगी स्थायी बन गई तो बीजेपी के लिए चुनाव में मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं. अगर यहां हालात बिगड़े तो पार्टी के लिए इज्जत बचाना मुश्किल हो जाएगा.

( लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं. )

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