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राजस्थान चुनाव 2018: बीजेपी में खींचतान, मजबूरी बनीं महारानी?

अब जो मुख्यमंत्री बनेगा उस की राजनीति फिर खत्म ही हो जाएगी. इसलिए बेहतर है कि 'रानी' खेल में बनी रहे

Updated On: Feb 09, 2018 08:37 AM IST

Mahendra Saini
स्वतंत्र पत्रकार

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राजस्थान चुनाव 2018: बीजेपी में खींचतान, मजबूरी बनीं महारानी?

2 लोकसभा और एक विधानसभा उपचुनाव में बुरी हार के बाद राजस्थान बीजेपी में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है. कहने को ये 3-0 की हार है लेकिन तीनों सीटों को समेटने वाले 17 विधानसभा क्षेत्रों में एक भी इलाका ऐसा नहीं रहा, जहां सत्तारूढ़ पार्टी को बढ़त मिली हो. इस लिहाज से अगर इस हार को 17-0 की हार भी कहा जाए तो कुछ गलत नहीं होगा. यही वजह है कि अब बदलाव की मांग जोर पकड़ने लगी है.

बीजेपी ओबीसी मोर्चा के कोटा जिलाध्यक्ष अशोक चौधरी अब खुलकर वो बात कर रहे हैं, जो अब तक दबी जुबान में ही कही जाती थी. चौधरी ने अमित शाह को चिट्ठी लिखकर नेतृत्व परिवर्तन के मुद्दे पर बड़ी बहस छेड़ दी है. इस चिट्ठी में चौधरी ने मुख्यमंत्री पद से वसुंधरा राजे और प्रदेशाध्यक्ष पद से अशोक परनामी को हटाने की मांग की है. चौधरी के मुताबिक उपचुनाव के सभी 17 विधानसभा क्षेत्रों में से एक में भी बीजेपी को बढ़त नहीं मिल पाई है. इससे साफ है कि जनता ने नेतृत्व को नकार दिया है. ऐसे में जिम्मेदार पदों पर इन नेताओं के बैठे रहने का कोई औचित्य नहीं है.

पार्टी के लेटरहेड पर लिखे इस पत्र में वही दावे किए गए हैं, जिनकी चर्चा फर्स्टपोस्ट पर पिछले लेखों में हो चुकी है. चौधरी ने राजे की कार्यशैली पर निशाना साधते हुए लिखा है कि किसान, कर्मचारी और युवा यहां तक कि महिलाएं भी इस सरकार की नीतियों से त्रस्त हैं और बदलाव नहीं किया गया तो आने वाले चुनाव में बड़ी हार निश्चित है. फर्स्टपोस्ट आपको बता चुका है कि नई नौकरियां न निकलने पर कैसे युवाओं में भारी नाराजगी है.

कोटा से लिखी चिट्ठी के कई हैं मायने

कोटा से मुख्यमंत्री को हटाने की मांग उठना बड़ी बात है. कोटा हाड़ौती संभाग में आता है और ये मुख्यमंत्री का घरेलू संभाग है. वसुंधरा राजे झालरापाटन से विधायक हैं और उनके बेटे दुष्यंत सिंह झालावाड़ से सांसद हैं. मुख्यमंत्री बनने से पहले वे ही झालावाड़ से सांसद बनती रही हैं. यही नहीं, हाड़ौती संभाग बीजेपी का पुराना गढ़ भी है. 2013 में कोटा से पार्टी ने विधानसभा की 17 सीटों पर जीत दर्ज की थी. ऐसे में यहां पार्टी के भीतर से मुख्यमंत्री के खिलाफ आवाज उठना मामूली बात नहीं है.

Vasundhara Raje

नेतृत्व परिवर्तन की मांग के खुलकर कोटा से उठने के कई और मायने भी हैं. बीजेपी के एक बड़े नेता ने अनौपचारिक बातचीत में बताया कि 15 फरवरी तक आपको बहुत बड़ी खबर मिल सकती है. 12 फरवरी को राज्य का बजट पेश होना है और इसके 3 दिन के अंदर राज्य में कुछ बड़ा हो सकता है. ये पूछने पर कि क्या ये नेतृत्व परिवर्तन से संबंधित है, ये नेताजी सिर्फ मुस्कुरा दिए और कहा कि हो सकता है केशोरायपाटन शुगर मिल से कुछ मीठा मिल जाए.

इशारों में कही गई इस बात का मतलब समझाते हैं. केशोरायपाटन हाड़ौती संभाग मे आता है और यहां एक चीनी मिल है जो शायद अभी बंद पड़ी है. इससे मीठा मिलने का इशारा बताता है कि कोटा या हाड़ौती संभाग से नेतृत्व परिवर्तन के मुद्दे का रिश्ता है. एक अन्य नेता ने बताया कि अगर मुख्यमंत्री फिलहाल न भी बदली जाएं तो भी प्रदेशाध्यक्ष बदलना तो लगभग तय है और बड़ी संभावना हाड़ौती संभाग के उन सांसद महोदय की जताई जा रही है जो संसद में अक्सर सक्रिय रहते हैं.

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कोटा संभाग मे ही पिछले कुछ समय से विधायक भवानी सिंह राजावत भी नेतृत्व के खिलाफ सक्रिय दिख रहे हैं. राजावत वसुंधरा राजे के पिछले कार्यकाल में मंत्री थे लेकिन इस बार भाव नहीं मिलने से वे नाराज हैं. पिछले दिनों संभाग में डेंगू, स्वाइन फ्लू के मुद्दे पर उन्होने चिकित्सा मंत्री की बैठक तक का बहिष्कार कर दिया था. इतिहास में हाड़ौती संभाग उन इलाकों में गिना जाता है जिन्होंने विदेशी आक्रांताओं के सामने आसानी से हथियार नहीं डाले.

सरकार में दिखने लगी खींच-तान

उपचुनावों की इस हार ने निश्चित रूप से बीजेपी और खासकर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के लिए खतरे की घंटी बजा दी है. अब संगठन में ही नहीं बल्कि सरकार में भी फेरबदल की मांग में वजन बढ़ गया है. पहले यदा-कदा नेतृत्व परिवर्तन के सवाल उठते थे. लेकिन इसके लिए कोई नेता खुलकर सामने नहीं आता था. अब वसुंधरा राजे का खुल्लमखुल्ला विरोध हो रहा है.

मुख्यमंत्री और गृहमंत्री के बीच सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है. 2 दिन पहले ही प्रदेशाध्यक्ष अशोक परनामी ने मीडिया से कहा कि विधानसभा चुनाव वसुंधरा राजे के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा. बाद मे गृहमंत्री ने अलग बात कही. गुलाब चंद कटारिया ने कहा कि अभी चुनावी चेहरा तय करने का समय नहीं आया है. यानी राजे के खिलाफ बगावत के दरवाजे अब बंद नहीं हैं. हालांकि उन्होंने ये कहकर बात संभाली कि बीजेपी में ऐसे फैसले कांग्रेस की तरह एक आदमी या एक परिवार नहीं करता है.

Gulab Chand Kataria

राजस्थान के गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया

बीजेपी दफ्तर से छन-छन कर आ रही खबरों को लब्बोलुआब ये है कि नतीजे नहीं दे पा रहे नेताओं को जल्द ही सत्ता और संगठन, दोनों जगह से हटाया जाएगा. कुछ मंत्रियों के विभाग बदले जा सकते हैं तो कुछ को बाहर भी किया जा सकता है. एक बीजेपी नेता ने 15 फरवरी तक बड़ी खबर का जो इशारा दिया था, हो सकता है कि वो भी इसी से संबंधित हो.

राजे की राज'नीति' से नाराज़गी!

मुख्यमंत्री के तौर पर वसुंधरा राजे का ये दूसरा कार्यकाल है. लेकिन पहली बार उनको जोरदार विरोध का सामना करना पड़ रहा है. बताया जा रहा है कि वसुंधरा राजे पिछले तीन-चार साल से एक खास मंत्री की बात और सलाह ही ज्यादा सुन रही हैं. इससे ऊपर से नीचे तक भारी विरोध है. राजे सरकार के पिछले कार्यकाल में उनके खास रहे एक मंत्री तो इसकी शिकायत अमित शाह तक से कर चुके हैं. शाह की कार्यप्रणाली कुछ ऐसी बताई जाती है कि वे घड़ा भरने तक इंतजार करते हैं. फिजाओं में अब यही सवाल गूंज रहा है कि क्या घड़ा भर गया?

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नाराज विधायक, नेताओं ने अब खुलकर उनकी अवहेलना भी शुरू कर दी है. बीजेपी के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री वी सतीश ने फीडबैक के आधार पर एक रिपोर्ट तैयार की है. इसके मुताबिक कई मौजूदा विधायकों और दूसरे नेताओं ने अलवर और अजमेर संसदीय क्षेत्रों में पार्टी की बत्ती गुल कर दी. कई विधायकों की पार्टी उम्मीदवार से निजी नापसंदगी थी. जबकि प्रधान, चेयरमैन, जिलाध्यक्ष जैसे टिकट की दौड़ में लगे दूसरे नेताओं ने मौजूदा विधायकों के नंबर कम कराने के लिए अपनी ही पार्टी का साथ नहीं दिया.

मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से नाराजगी के बाद पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे चुके रामगढ़ विधायक ज्ञानदेव आहूजा ने भी अब खुलकर सरकार के खिलाफ ताल ठोंक दी है. खनन माफिया की दखलअंदाजी का आरोप लगाते हुए उन्होने कहा कि अरावली की पहाड़ियों से तगड़ी वसूली की जाती है और ये रकम ऊपर तक पहुंचती है. उपचुनाव में बीजेपी की हार के पीछे जनता में बजरी माफिया को लेकर फैली नाराजगी भी एक वजह बताई जा रही है.

केंद्रीय नेतृत्व से राजे का रिश्ता उतार-चढ़ाव भरा

आमतौर पर अमित शाह और नरेंद्र मोदी के साथ वसुंधरा राजे के रिश्ते उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं. ढाई साल पहले दिल्ली में अमित शाह ने वसुंधरा राजे को मिलने तक का समय नहीं दिया था. राजे 2 दिन तक दिल्ली में रही थीं और उन्हें बिना मिले ही वापस लौटना पड़ा था. तब राज्य में मुख्यमंत्री पद पर परिवर्तन की चर्चाएं खासी तेज थी.

Amit Shah Pic

वैसे भी, नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से राज्य में रह-रहकर नेतृत्व परिवर्तन की खबरें उड़ती रही हैं. नए मुख्यमंत्री के तौर पर कई बार ओम माथुर का नाम उछाला जा चुका है. 2-3 साल पहले तो जयपुर में पार्टी दफ्तर के बाहर माथुर के पोस्टर तक लग गए थे. ओम माथुर पार्टी के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष हैं. प्रचारक के तौर पर वे नरेंद्र मोदी के पुराने साथी रहे हैं और उत्तर प्रदेश में पार्टी की पुनर्वापसी कराकर वे अमित शाह के खास भी बन चुके हैं.

लेकिन पिछले साल जुलाई में जब शाह जयपुर आए तो उन्होंने नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों को सिरे से खारिज कर दिया. पिछले महीने खुद प्रधानमंत्री मोदी भी बाड़मेर में वसुंधरा राजे की काफी तारीफ करके गए हैं. हालांकि ये तारीफ उपचुनाव में 17 के 17 विधानसभा क्षेत्रों में पिछड़ने से पहले की हैं. अब हालात बदल चुके हैं और इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बजट सत्र चल रहा है और मुख्यमंत्री चुप-चुप सी हैं.

क्या बगावत कर सकती हैं वसुंधरा ?

वसुंधरा राजे को बदलने की बातें तो कई बार उठती रही हैं. उनके व्यवहार को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं. लेकिन कभी इस दिशा में कदम नहीं उठाया गया. इसकी वजह बताई जाती है सत्ता और संगठन पर उनकी पकड़. अक्सर यही कहा जाता रहा कि केंद्र में जैसे बीजेपी का मतलब मोदी हो गया है, वैसे ही राजस्थान में पहले से ही बीजेपी का मतलब वसुंधरा है. अब तक यही कहा जाता रहा कि परिवर्तन हुआ तो पार्टी टूट सकती है. शायद इसी 'पकड़' के बूते ही 2009 में पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह तक को वसुंधरा राजे ने आंख दिखा दी थी.

हालांकि ये भी सच है कि अक्सर, बंद मुट्ठी लाख की रहती है और खुल जाए तो खाक की हो जाती है. हो सकता है कि वसुंधरा राजे की विधायकों पर ताकत उतनी नहीं हो जितना प्रचार किया गया. अगर सत्ता-संगठन पर पकड़ मजबूत ही होती तो फिर अब जो विरोध के सुर उठ रहे हैं, वे क्यों उठते?

एकबारगी मान भी लें कि बगावत और टूट हो सकती है लेकिन बीजेपी का पुराना रिकॉर्ड बताता है कि पार्टी को तोड़ने वाला कोई नेता अपने मकसद में कामयाब नहीं रहा. उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह, मध्य प्रदेश में उमा भारती और कर्नाटक में येदियुरप्पा की बगावत हम देख चुके हैं. सभी को अपेक्षित सफलता न मिलने पर वापस पार्टी के झंडे तले ही लौटना पड़ा. इस रास्ते पर शायद वसुंधरा राजे की कहानी भी अलग न हो.

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फिर पहले उनके साथ विधायक रहे भी हों क्योंकि राजस्थान में राजे पार्टी का चेहरा तो रही ही हैं. लेकिन उपचुनाव में इतनी बुरी हार के बाद नहीं लगता कि कोई अपनी सीट बचाने से ज्यादा अपने नेता की फिक्र करेगा. ये चुनावी साल है. जरा सी भी ऊंच-नीच अगले 5 साल के लिए सत्ता से दूर कर सकती है. इसलिए पार्टी में टूट का खतरा फिलहाल तो नजर नहीं आता.

जीत की संजीवनी के बूते विपक्ष मुखर

सचिन पायलट के साथ रघु शर्मा

सचिन पायलट के साथ रघु शर्मा

बहरहाल, बीजेपी और वसुंधरा राजे के लिए उपचुनाव नतीजे खतरा बन कर आए हों. लेकिन कांग्रेस के लिए इस जीत ने किस कदर संजीवनी का काम किया है, ये मौजूदा विधानसभा सत्र में बुलंद हुई उसकी आवाज से समझा जा सकता है. पिछले 4 साल में विपक्ष की आवाज कभी इतनी मुखर नहीं दिखी है. 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को महज 20 सीटें मिली थी. हालांकि इसके बाद हुए 8 उपचुनाव में उसने 6 जीते लेकिन अब जैसा आत्मविश्वास कभी नहीं दिखा.

अब कांग्रेस विधायक खुलकर राजे सरकार को घेर रहे हैं. उनका आत्मविश्वास इतना बढ़ा है कि सत्तापक्ष के धुरंधरों से भी जवाब देते नहीं बन रहा है. भ्रष्ट लोकसेवकों को बचाने वाले काले कानून का मामला हो या नई नौकरियों का या फिर किसानों की कर्ज माफ़ी पर बीजेपी सरकार की वादाखिलाफी का. विधानसभा में सचेतक गोविंद सिंह डोटासरा वर्तमान बजट सत्र के पहले दिन से ही सरकार को घेर रहे हैं. नसीराबाद विधायक रामनारायण गुर्जर ने चिकित्सा मंत्री कालीचरण सर्राफ पर डॉक्टरों के तबादलों में भ्रष्टाचार का आरोप लगाया.

प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट ने तो उपचुनाव नतीजों के दिन ही वसुंधरा राजे से इस्तीफे की मांग कर दी थी. अब एकबार फिर उन्होने सरकार को संवेदनहीन करार दिया है. पायलट ने आरोप लगाया कि 4 साल में 28 विद्यार्थी मित्रों ने खुदकुशी कर ली लेकिन भर्तियां नहीं निकाली जा रही हैं. पायलट के मुताबिक राजे सरकार ने जनादेश का सिर्फ दुरुपयोग किया है.

बीजेपी में रहकर वसुंधरा राजे का विरोध कर रहे नेता भी अब आत्मविश्वास से भरे हैं. बुधवार को शेरगढ़ से बीजेपी विधायक बाबू सिंह राठौड़ ने कानून व्यवस्था के मामले पर गृहमंत्री को घेरा. सांगानेर विधायक घनश्याम तिवाड़ी ने आरोप लगाया कि इस सरकार से नई भर्तियों की तो उम्मीद ही क्या करें, पुराने 60 हजार पद ही खत्म कर दिए.

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राजस्थान में बीजेपी की सबसे बुरी गत के पीछे एक वजह नौकरी के मुद्दे को भी माना जा रहा है. लेकिन इस मुद्दे पर सरकारी लापरवाही का आलम देखिए कि विधानसभा में खुद गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया ने अपने ही घोषणा पत्र को झुठला दिया. कटारिया ने कहा कि बीजेपी ने कभी 15 लाख नौकरियों का वादा नहीं किया. और देखिए, भ्रष्ट लोकसेवकों को बचाने वाले जिस कानून का सबसे ज्यादा विरोध हुआ, उसके लिए सेलेक्ट कमेटी को एक्सटेंशन दे दिया गया है.

अब आगे क्या?

बहरहाल, आने वाला सप्ताह बहुत ही रोचक रह सकता है. कोटा से अशोक चौधरी की चिट्ठी के बाद वसुंधरा के विरुद्ध सुर तेज ही हुए हैं. अब देखने वाली बात ये होगी कि क्या जनता में खराब हो चुकी सरकार की छवि को सुधारने के लिए कुछ ठोस किया जाएगा. या फिर मंथन बैठक की तरह केवल फौरी कार्रवाई कर दी जाएगी. हालांकि मामले को टालना अब उतना आसान रह नहीं गया है.

वैसे नेतृत्व परिवर्तन की मांग बीजेपी के कोर वोट बैंक की तरफ से भी उठ रही है. राजपूत और ब्राह्मण दावा कर रहे हैं कि कांग्रेस की जीत उनकी वजह से है क्योंकि उन्होने इस बार बीजेपी को वोट नहीं दिया. ऐसे में कुछ लोग वसुंधरा राजे की जगह किसी दूसरे राजपूत को मुख्यमंत्री बनाने की मांग भी कर रहे हैं. इससे छिटक चुके वोटर को वापस अपने पाले में लाया जा सकेगा.

Vasundhara Raje

लेकिन बड़ी बात ये है कि साढ़े 4 साल की नकारात्मक इमेज को क्या 6 महीने में सुधारा जा सकेगा. खबरें तो ऐसी भी आ रही हैं कि अब राज्य का कोई नेता मुख्यमंत्री बनना भी नहीं चाहता. आखिर ऐसे ताज को कौन पहनना चाहेगा जिसमें कांटों की भरमार हो और इन्हे निकालने का वक्त बेहद कम. कांटें निकल नहीं पाएंगे और सारा ठीकरा मुफ्त में नाम चढ़ जाएगा. बीजेपी के ही एक बड़े नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि हार तो निश्चित है, अब जो मुख्यमंत्री बनेगा उस की राजनीति फिर खत्म ही हो जाएगी. इसलिए बेहतर है कि 'रानी' खेल में बनी रहे.

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