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राजस्थान का जयपुरिया ट्रेंड, जो बनाता और बिगाड़ता है चुनावी खेल

पिंक सिटी के नाम से मशहूर राजस्थान की राजधानी जयपुर के लोगों का मूड तय करता है कौन बैठेगा सिंहासन पर

Updated On: Nov 03, 2018 07:17 AM IST

Shubham Sharma

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राजस्थान का जयपुरिया ट्रेंड, जो बनाता और बिगाड़ता है चुनावी खेल
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राजस्थान में होने वाले विधानसभा चुनाव में अब बस कुछ ही समय बाकी है. ऐसे में सभी राजनीतिक दलों की निगाहें बीजेपी शासित इस राज्य पर बनी हुई है. जहां एक ओर बीजेपी फिर से इस राज्य की सत्ता पर काबिज होने की जुगत में है. वहीं  दूसरी तरफ कांग्रेस उससे सत्ता छीन कर अगले लोकसभा चुनाव में धमाकेदार एंट्री करना चाहती है.

चुनाव में सारा खेल सीटों का होता है, फिर चाहे वो लोकसभा हो या विधानसभा. कई सीटों का प्रभाव तो ऐसा होता है कि वे चुनाव से पहले ही परिणाम तय कर देती हैं. कुछ सीटों पर जीत से ही यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि सत्ता के शीर्ष पर कौन काबिज होगा. इस कड़ी में राजस्थान की कुछ ऐसी सीटों के बारे में जानते हैं जिन पर होने वाली हलचल पूरे चुनाव का रुख तय करती हैं.

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जयपुर वालों का मूड तय करता है कौन बैठेगा सिंहासन पर

पिंक सिटी के नाम से मशहूर राजस्थान की राजधानी जयपुर राजनीतिक गलियारों में भी एक खास भूमिका रखता है. इस जिले में कुल 19 विधानसभा सीटें हैं जो राज्य की कुल विधानसभा सीटों का 10 प्रतिशत है. इसकी खास बात यह है कि प्रत्याशियों की संख्या कम रही हो या ज्यादा, सत्ता का रुख पिंक सिटी के लोग ही तय करते हैं. इसका सीधा अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले पांच में चार विधानसभा चुनावों में जिस पार्टी के खाते में जयपुर से सबसे ज्यादा सीटें गईं, उसका ही राजस्थान में परचम लहराया.

पिछले पांच विधानसभा चुनावों का जयपुरिया ट्रेंड

राजस्थान में सत्ता तक पहुचाने में जयपुर जिले की भूमिका को समझने के लिए पिछले चुनावों पर नजर डालते हैं. साल 1993 में बीजेपी ने 11 और कांग्रेस ने चार सीटें जीतीं. सरकार बीजेपी की बनी. 1998 में 11वें विधानसभा चुनावों के दौरान इस जिले में कांग्रेस का पलड़ा भारी रहा था. तब यहां से 12 सीटें कांग्रेस ने जीतीं तो बीजेपी को सिर्फ 3 सीटों से ही संतोष करना पड़ा. 12वीं विधानसभा में बीजेपी ने उलटफेर करते हुए यहां बाजी मार ली. इस बार यानी साल 2003 में बीजेपी को 10 सीटें मिली तो कांग्रेस महज 4 सीटों पर ही सिमट के रह गई.

हालांकि साल 2008 में 13वीं विधानसभा के दौरान परिसीमन हुआ. इसके चलते सीटों की संख्या 19 हो गई. इन चुनावों में बीजेपी और कांग्रेस के बीच कड़ा मुकाबला हुआ. परिसीमन के बाद हुए चुनावों में जयपुर जिले की 10 सीटों पर बीजेपी और 7 पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की. इस बार जयपुरिया ट्रेंड न चल सका और सूबे में कांग्रेस की सरकार बनी. लेकिन अगले विधानसभा चुनाव यानी साल 2013 में बीजेपी ने यहां से 16 सीटों पर जीत हासिल की. वहीं कभी इस इलाके से 11 सीट जीतने वाली कांग्रेस महज एक सीट पर ही जीत दर्ज कर सकी. इस बार बीजेपी सत्ता के शीर्ष पर पहुंची.

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साल 1993 से 2013 के बीच विधानसभा चुनावों के नतीजे यही बताते हैं कि इन चार चुनावों में जयपुरिया ट्रेंड ही चला है फिर चाहे वो कांग्रेस के हक में गया हो या बीजेपी के.

कोटपूतली में जो जीता वही विपक्ष में बैठा

जयपुर जिले से जुड़ा एक और टोटका भी मशहूर है. यहां की एक सीट ऐसी भी है जिस पर जीत हासिल करने वाली पार्टी कभी सूबे की सत्ता पर काबिज नहीं हो सकी. 1985 से जनता ने यहां से जिसे भी अपना विधायक चुना, उसकी पार्टी की सरकार नहीं बनी. राजस्थान की राजधानी जयपुर और देश के राजधानी दिल्ली को जोड़ने वाले नेशनल हाइवे पर स्थित कोटपूतली कस्बे और विधानसभा क्षेत्र में विकास के आगे जातिगत राजनीति हावी रही है. यही कारण है कि 33 साल में हुए सात विधानसभा चुनावों में किसी पार्टी विशेष की लहर इस क्षेत्र में देखने को नहीं मिली. पिछले सात चुनावों में यहां के लोगों ने तीन बार निर्दलीय उम्मीदवार को ही मौका दिया है.

साल 1993 के चुनाव में कांग्रेस के रामचंद्र रावत ने इस सीट पर तो जीत हासिल की, मगर उनकी पार्टी को विपक्ष में बैठना पड़ा. कुछ ऐसा ही 1998 के चुनाव में बीजेपी के साथ हुआ, जब बीजेपी के रघुवीर सिंह ने कोटपूतली में तो सीट निकाल ली, मगर बीजेपी सत्ता न बचा पाई. वहीं 2013 के चुनाव में कांग्रेस को जयपुर जिले में सिर्फ एक सीट पर ही जीत हासिल हुई और वह सीट थी कोटपूतली विधानसभा. ट्रेंड के हिसाब से इसबार कांग्रेस को विपक्ष में बैठना पड़ा. जबकी सत्ता बीजेपी के हिस्से में आई.

राज्य में एक बार फिर चुनावी महौल बन गया है. बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही जयपुर जिले से ज्यादा से ज्यादा सीटें निकालने की जुगत में रहेंगी मगर कोटपूतली सीट से बचकर.

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