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राजस्थान चुनाव 2018: एक नेता जिसने अपनी ही सरकार को दी चुनौती और लगातार 17 साल तक रहा सीएम

13 नवंबर 1954 को मोहन लाल सुखाड़िया ने राजस्थान के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली और लगातार 17 साल तक राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे

Updated On: Nov 29, 2018 07:26 AM IST

FP Staff

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राजस्थान चुनाव 2018: एक नेता जिसने अपनी ही सरकार को दी चुनौती और लगातार 17 साल तक रहा सीएम

राजस्थान में चुनाव होने वाले हैं. ऐसे में क्षेत्रफल के नजरिए से सबसे बड़े राज्य की सियासत पर थोड़ी नजर दौड़ानी चाहिए. राज्य में बीजेपी की तरफ से वसुंधरा राजे चुनाव मैदान में हैं, लेकिन कांग्रेस की तरफ से अभी तक किसी नाम की घोषणा नहीं हुई है.

राजस्थान के बारे में राजनीतिक पंडित कहते हैं कि यहां एक बार कांग्रेस जीतती है तो एक बार राज्य की जनता बीजेपी को कमान सौंपती है. लेकिन नहीं... एक दौर ऐसा भी था जब कांग्रेस की तरफ से एक ही नेता लगातार 17 साल तक मुख्यमंत्री रहा. इस नेता पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को शुरुआत में विश्वास नहीं था. लेकिन जब उन्होंने एक के बाद एक चुनाव में जीत का परचम लहराया तो पूरी कांग्रेस की निगाहें सिर्फ उनपर रहती थीं.. इस नेता का नाम है मोहन लाल सुखाड़िया.

1 नवंबर 1952 को राजस्थान के नए मुख्यमंत्री बने जय नारायण व्यास ने अपने मंत्रिमंडल में मोहन लाल सुखाड़िया को वित्त मंत्री की जिम्मेदारी दी. इस दौरान बड़ी संख्या में राम राज्य परिषद के 22 सदस्यों ने कांग्रेस जॉइन की. इसके बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं में गुस्सा भर गया क्योंकि राम राज्य परिषद के ज्यादातर सदस्य जमींदार थे और इससे राज्य में चल रहा भूमि सुधार प्रभावित हो रहा था.

जब कांग्रेस हाईकमान को इसकी भनक लगी तो उन्होंने जय नारायण व्यास से विधानसभा में विश्वास मत हासिल करने के लिए कहा. व्यास के सामने एक नौजवान खड़ा हो गया और अपने ही सरकार को चुनौती दे डाली...इस नौजवान का नाम था मोहन लाल सुखाड़िया. वोटिंग हुई तो सब चौंक गए क्योंकि मोहन लाल सुखाड़िया इस चुनाव में 8 मतों से जीत हासिल कर चुके थे. इसके साथ सुखाड़िया प्रदेश के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने. देखते ही देखते ये जीत का दौर लगातार 17 साल तक बरकरार रहा.

13 नवंबर 1954 को मोहन लाल सुखाड़िया ने राजस्थान के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, लेकिन अभी भी उनके लिए चुनौती कम नहीं थी. पंडित नेहरू सुखाड़िया को प्रदेश की कमान सौंपने के पक्ष में नहीं थे. सुखाड़िया के राजनीतिक गुरु माणिक्य लाल वर्मा ने पंडित नेहरू से सुखाड़िया के नाम की पैरवी की थी.

खैर, इसके बाद बारी आई राज्य के चुनाव की... साल 1957. नेहरू से माणिक्य लाल वर्मा ने तो सुखाड़िया के नाम को आगे बढ़ा दिया था, लेकिन उन्हें अभी अग्निपरीक्षा से होकर गुजरना था. 1957 के चुनाव में जब जीत की खबर दिल्ली पहुंची तो नेहरू का विश्वास भी अब सुखाड़िया पर जमना शुरू हो गया था. कांग्रेस को भारी संख्या में सीटें मिलीं और एक बार फिर सुखाड़िया ने राजस्थान के मुख्यमंत्री की शपथ ली.

इस जीत के साथ कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में सुखाड़िया के प्रति गुस्सा भर गया और उन्होंने 1958 में सुखाड़िया के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव प्रस्तुत किया, लेकिन इसमें भी सुखाड़िया ने खुद को साबित कर दिया और विश्वास मत हासिल कर लिया. इसके बाद सुखाड़िया 8 जुलाई 1971 तक लगातार राज्य के मुख्यमंत्री रहे. सुखाड़िया देश के दूसरे सबसे लंबे समय तक किसी राज्य के मुख्यमंत्री बनने वाले नेता हैं. इसके बाद उन्हें कर्नाचक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु का गवर्नर बनाया गया.

सुखाड़िया की सरकार में बड़े पैमाने पर शैक्षणिक सुधार हुए. हर साल सूखे की मार झेलने वाले राजस्थान के लिए भी सुखाड़िया ने कई बड़े फैसले लिए.

कौन थे मोहन लाल सुखाड़िया?

मोहन लाल सुखाड़िया का जन्म राजस्थान के झालवाड़ में जैन परिवार में हुआ था. उनके पिता पुरुषोत्तम लाल सुखाड़िया बॉम्बे के क्रिकेटर थे. अपने शुरुआती पढ़ाई उदयपुर से करने के बाद मोहन लाल भी बॉम्बे पहुंचे और उन्होंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा प्राप्त किया. इस दौरान उन्हें छात्र संगठन का महासचिव चुन लिया गया. इस दौरान मुंबई में सुखाड़िया देश की आजादी के लिए संघर्ष कर रहे सुभाष चंद्र बोस, सरदार वल्लभभाई पटेल के संपर्क में आए.

वापस राजस्थान आने के बाद उन्होंने नाथद्वार में छोटी इलेक्टिकल शॉप खोली. यहीं दुकान पर सुखाड़िया अपने दोस्तों के साथ ब्रिटिश राज, सामाजिक भेदभाव पर चर्चा किया करते थे. गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन में भी उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. 25 साल की उम्र में उन्होंने एक साल से ज्यादा जेल में काटी.

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