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राजस्थान: कांग्रेस का घोषणा पत्र बीजेपी की नकल तो नहीं ?

बीजेपी के वादों को कांग्रेस ने लोक-लुभावनी कोशिश और जुमलेबाजी करार दिया था. लेकिन लोगों को लुभाने में कांग्रेस ने भी कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी है.

Updated On: Nov 29, 2018 10:07 PM IST

Mahendra Saini
स्वतंत्र पत्रकार

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राजस्थान: कांग्रेस का घोषणा पत्र बीजेपी की नकल तो नहीं ?

राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने कांग्रेस पर टिकट बंटवारे और घोषणा पत्र जारी करने में सुस्ती का आरोप लगाया था. बीजेपी इन्हें कांग्रेस से पहले जारी करने में कामयाब रही थी. लेकिन बीजेपी घोषणा पत्र जारी होने के 2 बाद ही सही अब कांग्रेस ने भी अपना घोषणा पत्र जारी कर दिया है.

हालांकि, बीजेपी के वादों को कांग्रेस ने लोक-लुभावनी कोशिश और जुमलेबाजी करार दिया था. लेकिन लोगों को लुभाने में कांग्रेस ने भी कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी है. मोटे तौर पर देखने से दोनों घोषणा पत्र कमोबेश एक जैसे ही नजर आते हैं. अधिकतर वादे ऐसे हैं जिन्हे बीजेपी पहले ही अपने संकल्प पत्र में शामिल कर चुकी है. कांग्रेस ने भी संकल्प शब्द पर खास जोर दिया है. अपने जन घोषणा पत्र पर लिखा है- एक ही संकल्प, कांग्रेस ही विकल्प.

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अरुण जेटली ने अपने घोषणा पत्र को राजस्थान के विकास का रोडमैप बताया था. अब अशोक गहलोत ने कहा है कि 5 साल का रोडमैप तो उनका घोषणा पत्र है. अशोक गहलोत ने आरोप लगाया कि वसुंधरा राजे सरकार ने तो राजनीतिक दुश्मनी निकालने के लिए उनकी शुरू की गई उन योजनाओं को भी बंद या सीमित कर दिया, जो वास्तव में लोक कल्याण के लिए थी.

क्या है कांग्रेस के घोषणा पत्र में?

कांग्रेस ने अपने जन घोषणा पत्र में शुरुआत किसानों से की है. कहा गया है कि सत्ता में आने के 10 दिन में किसानों को कर्ज़ माफ़ कर दिया जाएगा. वृद्ध किसानों को पेंशन का वादा किया गया है. खेती-किसानी के अलावा पशुपालन और मत्यस्य पालन जैसे कामों को बढ़ावा देने के लिए बोर्ड बनाने का ऐलान भी किया गया है.

A supporter waves a Congress party flag as the party's newly elected president Rahul Gandhi addresses after taking charge as the president during a ceremony at the party's headquarters in New Delhi

पिछले 5 साल में गाय इस देश में बहुत बड़ा मुद्दा बन चुकी है. गाय को लेकर बीजेपी पर ताने कसती रही कांग्रेस ने मध्य प्रदेश के बाद राजस्थान में भी गाय को घोषणा पत्र में जगह दी है. आरोप लगाया गया है कि बीजेपी ने गौशालाओं को कम अनुदान दिया जिसे हम उसे बढ़ा देंगे.

कांग्रेस ने कहा है कि जीएसटी की वजह से व्यापारियों के साथ ही किसानों को भी बड़ा नुकसान झेलना पड़ा है. इसलिए किसानों के काम आने वाले ट्रैक्टर और दूसरी मशीनरी को जीएसटी से बाहर रखने की बात कही गई है. लेकिन यही पर बड़ी चालाकी भी की गई है. घोषणा पत्र में ये नहीं लिखा है कि सत्ता में आते ही वे ट्रैक्टर को टैक्स फ्री कर देंगे. इसकी बजाय लिखा गया है-कांग्रेस चाहेगी कि ये जीएसटी से मुक्त रहें. अब कोई इनसे ये पूछे कि भैया चाहते तो सब लोग बहुत कुछ हैं लेकिन काम तो करने से होगा. ये वैसा ही है जैसे बीजेपी ने 2013 में 15 लाख नौकरियों के वादे पर ये कह दिया कि हमने तो कौशल विकास कर नौकरी के लायक बना देने की बात कही थी.

खैर, दूसरी घोषणाओं पर नजर डालते हैं. महिलाओं के लिए भी इसमें बहुत कुछ है. लड़कियों की ताउम्र शिक्षा को फ्री कर देने का वादा है. कौशल विकास के लिए महिला आईटीआई खोली जाएंगी. महिला सुरक्षा पर भी बातें की गई हैं. यौन शोषण की शिकार महिलाओं के पुनर्वास के प्रयास और महिलाओं के खिलाफ अपराधों की तय समयसीमा में जांच जैसे वादे हैं.

राइट टू हेल्थ कानून की बात कही गई है. ये अच्छा है. अभी बीजेपी की भामाशाह स्वास्थ्य बीमा योजना लागू है जिसमें एक करोड़ से ज्यादा परिवारों के 3 लाख तक के खर्चे कवर होते हैं. कांग्रेस अब सभी वर्गों को स्वास्थ्य बीमा मुहैया कराएगी. मुख्यमंत्री नि:शुल्क दवा योजना का दायरा भी बढ़ाने की बात है.

युवा बेरोजगारों के लिए बीजेपी ने 5 हजार का भत्ता देने का वादा किया था. अब कांग्रेस ने 1500 रुपए कम यानी साढ़े 3 हजार रुपए के भत्ते की घोषणा की है. इसी तरह सेना भर्ती से पहले ट्रेनिंग देने और तहसील स्तर पर स्टेडियम बनाने का वादा किया गया है. राजे सरकार ने करीब 20 हजार स्कूलों को मर्ज कर दिया था. अब कांग्रेस ने इनकी समीक्षा करने की बात कही है.

bjp vs congress

पत्रकार सुरक्षा कानून बनाने के अलावा पेंशन योजना और रियायती दरों पर प्लॉट देने की योजना का भी वादा है जिसे राजे सरकार ने बंद कर दिया था. इसके अलावा, गुर्जर आरक्षण पर संकल्प जताने और कई सारे कल्याण बोर्ड बनाने का वादा है. बीजेपी ने भी कई सारे बोर्डों का वादा किया था. बीजेपी से मिलते-जुलते वादों पर सचिन पायलट का कहना है कि बीजेपी ने उनकी योजनाएं चुरा ली. वैसे, सबसे खास और अलग बात ये है कि घोषणा पत्र पर कितना अमल हुआ, इसकी जांच के लिए अलग से कमेटी बनेगी.

मुफ्त की घोषणाएं कितनी ठीक हैं?

लोकतंत्र में एक वोट की कीमत अनमोल है. इस एक वोट की खातिर ही इतनी लोक-लुभावनी घोषणाएं की जाती हैं. लेकिन कई बार ये अतिशयोक्तिपूर्ण भी लगता है. सत्ता सुख भोगने के लिए राजनेता ऐसे-ऐसे वादे करते हैं, जो या तो पूरे नहीं होते या फिर उन्हे पूरा करने के लिए राज्य पर बहुत बड़े राजकोषीय घाटे का बोझ डाल दिया जाता है. क्या ये उन टैक्स पेयर्स के साथ धोखा नहीं है जो ईमानदारी से कर चुकाते हैं. इस उम्मीद में कि उनका चुकाया कर देश के विकास में काम आ रहा है.

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लेकिन होता क्या है कि टैक्स पेयर्स का रुपया सत्ता बचाने या हासिल करने के लिए की गई मुफ्त घोषणाओं को पूरा करने में ज्यादा खर्च होता दिखता है. सरकारों को इनसे बचना चाहिए. कहीं न कहीं मुफ्त की घोषणाएं समाज में कुंठा और गैर-ईमानदारी का कारण भी बन सकती हैं. आखिर जब ईमानदारी से कर्ज़ चुकाने वाला शख्स देखेगा कि उसके पड़ोसी का कर्ज़ बिना चुकाए ही माफ हो गया तो अगली बार वो ही क्यों ईमानदारी दिखाएगा ?

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