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राजस्थान कांग्रेस: नैतिकता के दावे फुस्स, हुआ वही जो होता आया

राजनीतिक विश्लेषकों की राय के उलट पायलट के कुछ कदम उनके अंदर आत्म विश्वास की कमी को दर्शाते हैं. इनमें से एक है, अपनी बात पर कायम न रहना

Updated On: Nov 16, 2018 08:20 PM IST

Mahendra Saini
स्वतंत्र पत्रकार

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राजस्थान कांग्रेस: नैतिकता के दावे फुस्स, हुआ वही जो होता आया

इंतज़ार की इंतहा पार करने के बाद राजस्थान के लिए कांग्रेस की पहली लिस्ट तब आई जब आधी दुनिया सो रही थी, लेकिन आह! इस लिस्ट ने पार्टी अध्यक्ष के उन तमाम बड़े-बड़े नैतिक दावों को फुस्स कर दिया, जिन्हें पिछले कुछ महीनों से वे बार-बार और लगभग हर स्टेज पर जोर देकर दोहरा रहे थे. एक बानगी देखिए, राहुल गांधी कहते थे- मैं कार्यकर्ताओं को निराश नहीं होने दूंगा. पैराशूट उम्मीदवारों की पतंग 200 किलोमीटर ऊपर हवा में ही काट दूंगा. इनाम उन्हें ही मिलेगा जिन्होंने पिछले 5 साल से पार्टी की सेवा की है.

एक और बानगी देखिए, राहुल कहते थे- पार्टी वंशवाद की बेल को जड़ से उखाड़ देगी. हम देखेंगे कि टिकट का पैमाना सार्वजनिक जीवन में सेवा भावना हो, न कि किसी बड़े नेता से रिश्तेदारी. एक और दावा ये भी था कि फूट, गुटबाजी अब वे शब्द हैं जो राजस्थान कांग्रेस की डिक्शनरी से गायब किए जा चुके हैं. सुनकर बड़ा अच्छा लगता था कि चलो, देश की 'ग्रैंड ओल्ड पार्टी' अब राजनीति में नई बयार लाने वाली है. लेकिन लिस्ट आते ही एक पुराना मुहावरा लोगों की जुबां पर आ गया- खोदा पहाड़ और निकली चुहिया.

वही हुआ जो परिपाटी है

अपनी पहली लिस्ट में कांग्रेस ने 152 नाम जारी किए हैं. गुटबाजी और उठापटक का अंदाज़ा तो तभी लग गया था जब स्क्रीनिंग कमेटी की अध्यक्ष कुमारी शैलजा के दावों के बावजूद लिस्ट सोमवार को नहीं आई. मंगलवार को भी नहीं और बुधवार को भी नहीं. ये आई चौथे दिन, वो भी आधी रात को.

sachin pilot ashok gehlot

पार्टी कार्यकर्ताओं को तवज्जो देने का दावा फुस्स हो गया. 5 साल तो क्या, कांग्रेस में ज़िंदगी खपा देने वाले नाम धरे रह गए और जुम्मा-जुम्मा कुछ घंटे पहले शामिल हुए लोग टिकट ले उड़े. बीजेपी छोड़कर आए हरीश मीणा देवली-उनियारा से तो हबीबुर्रहमान नागौर से उम्मीदवार बन गए. 2013 चुनाव में कांग्रेसियों की हार की वजह बनने वाले मनीष यादव शाहपुरा से, राजकुमार शर्मा नवलगढ़ से और रायसिंह नगर से सोना देवी बावरी को टिकट थमा दिया गया. पूर्व IPS सवाई सिंह गोदारा, कन्हैया लाल झंवर भी टिकट पाने में कामयाब रहे.

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राजनीतिक शुचिता का दावा भी फेल हो गया है. भंवरी देवी मर्डर केस में जेल में बंद महीपाल मदेरणा और मलखान सिंह बिश्नोई की बेटी-बेटे को टिकट दे दिया गया है. दिव्या मदेरणा को ओसियां से जबकि महेंद्र बिश्नोई को लूणी से टिकट दिया गया है. दूसरी ओर, जिस फुलेरा सीट के लिए प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट और नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी में राहुल गांधी के सामने ही तीखी बहस हो गई थी, उस सीट पर पार्टी घोषणा नहीं कर पाई है.

पार्टी में गुटबाजी फैलाने के नाम पर एक दूसरे गुटों के निशाने पर आ गए लोग भी अपना नाम पक्का कराने में कामयाब रहे. झोटवाड़ा से पूर्व केंद्रीय मंत्री लाल चंद कटारिया टिकट पा गए. कटारिया ने मुख्यमंत्री के मुद्दे पर अशोक गहलोत का खुलकर समर्थन किया था. दूसरी ओर, मुख्यमंत्री के लिए सचिन पायलट के समर्थन में हाथ खड़े करवा कर सौगंध दिलवाने वाले विश्वेंद्र सिंह पहली लिस्ट से बाहर हैं. हालांकि पायलट समर्थक और गहलोत गुट का विरोध करने वाले धीरज गुर्जर और अशोक चांदना कामयाब रहे.

क्या पायलट में आत्मविश्वास की कमी है?

लिस्ट आने के बाद राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 152 नामों में से कम से कम 79 उम्मीदवार पायलट खेमे के हैं. यानी दिग्गज अशोक गहलोत की जादूगरी की काट करने में कहीं न कहीं पायलट कामयाब रहे हैं. आखिर उन्हें भी मालूम है कि मुख्यमंत्री बनने के लिए विधायक दल में अपनों की संख्या कितनी जरूरी है. हालांकि अभी ये कहना जल्दबाजी होगी कि वास्तव में वे लोग पायलट का कितना समर्थन करेंगे जिन्हें वे अपना मान रहे हैं.

राजनीतिक विश्लेषकों की राय के उलट पायलट के कुछ कदम उनके अंदर आत्म विश्वास की कमी को दर्शाते हैं. इनमें से एक है, अपनी बात पर कायम न रहना. पहले तो पायलट चुनाव लड़ने से ही मना करते रहे. शायद उन्हें डर रहा हो कि कहीं हार गए तो मुख्यमंत्री बनने का सपना चूर-चूर हो जाएगा. किसी तरह चुनाव लड़ने को तैयार हुए तो फिर सुरक्षित सीट की तलाश करने लगे. लिस्ट आने की देरी के पीछे ये भी एक वजह हो सकती है.

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दिग्गज राजेश पायलट की राजनीतिक विरासत संभालने वाले सचिन केंद्रीय मंत्री रह चुकने और प्रदेशाध्यक्ष होने के बावजूद अपनी सीट लगातार बदल रहे हैं. कुछ महीनों पहले तक पायलट का नाम कोटपूतली विधानसभा की मतदाता सूची में दर्ज था. 2004 में वे दौसा से सांसद रहे. 2009 में अजमेर पहुंच गए. अब उनका नाम किशनपोल विधानसभा की मतदाता सूची में है. लेकिन चुनाव लड़ रहे हैं टोंक सीट से. शायद टोंक में मुस्लिम-गुर्जर समीकरण उन्हें जीत के लिए ज्यादा मुफीद लगा हो.

राजस्थान के दौसा से सांसद हरीश चंद्र मीणा के साथ सचिन पायलट

राजस्थान के दौसा से सांसद हरीश चंद्र मीणा के साथ सचिन पायलट

..और उग्र हो गए कांग्रेस के बागी

बीकानेर में पूर्व प्रदेशाध्यक्ष और वित्त आयोग के अध्यक्ष रहे बी डी कल्ला का टिकट कटने के बाद समर्थक उग्र हो गए. कल्ला समर्थकों ने डागा चौक पर घंटों तक नारेबाजी की और वहां रखी कुर्सियां जला दी. 2013 में चुनाव लड़ चुके गोपाल गहलोत ने तो 2 सीटों पर कांग्रेस को सबक सिखाने का ऐलान कर दिया.

दूसरी ओर, बाड़मेर में अपने रसूख का दावा करने वाले मानवेंद्र सिंह या उनकी पत्नी को टिकट नहीं दिया गया है. अभी तक माना जा रहा था और शिव सीट से मानवेंद्र की पत्नी चुनाव लड़ेंगी. 2013 में मानवेंद्र यहीं से विधायक बने थे. लेकिन लगता है कि पैराशूट नेताओं को टिकट न देने का आदर्श उनके लिए लागू कर दिया गया है. हालांकि अभी 48 उम्मीदवारों के नाम बाकी हैं. इस सीट से पूर्व मंत्री अमीन खान को टिकट दिया गया है. ये वही अमीन खान हैं, जिन्होंने पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल का उदाहरण देते हुए एक बार कहा था कि कांग्रेस में इनाम उन्हें मिलता है जो गांधी परिवार की चाकरी कर चुके होते हैं.

बहरहाल, विरोध की खबरें कई और इलाकों से भी आ रही हैं. कांग्रेस की बगावत देखते हुए पहले से ही बागियों से जूझ रही बीजेपी ने भी अपनी कुछ सीटों पर नाम बदलने का इशारा दिया है. पूर्व प्रदेशाध्यक्ष ओम माथुर के नजदीकी एक नेता ने बताया कि अगले 3 दिन में कुछ सीटों पर उम्मीदवार बदले जा सकते हैं. शायद कांग्रेस छोड़कर आने वालों को कुछ इनाम मिले.

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