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राजस्थान विधानसभा चुनाव 2018: नतीजा RAS एग्जाम का, मुश्किल BJP की!

पिछली परीक्षाओं की तरह ओबीसी की कटऑफ अगर सामान्य से ऊपर रखी जाती तो जाट, सैनी, यादव जैसी प्रभावशाली जातियों में गुस्सा फैलने का खतरा था

Updated On: Oct 28, 2018 09:38 AM IST

Mahendra Saini
स्वतंत्र पत्रकार

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राजस्थान विधानसभा चुनाव 2018: नतीजा RAS एग्जाम का, मुश्किल BJP की!

राजनीति जो न कराए, वो कम है. अगर लोगों के बीच चल रही चर्चाओं पर यकीन करें तो लगता है कि मुश्किल घड़ी में बीजेपी सरकार के साथ कुछ भी ठीक नहीं हो रहा. न बिगड़े को सुधार पा रहे हैं न और ज्यादा बिगड़ने से बचा पा रहे हैं. ताजा मामला राजस्थान लोक सेवा आयोग की आरएएस प्री परीक्षा-2018 से जुड़ा है. इसी हफ्ते इसके नतीजे जारी किए गए और अब घमासान ऐसा मचा है कि बीजेपी के लिए लेने के देने पड़ सकते हैं.

ऐसा माना जा रहा है कि इस बार रिजल्ट को देरी से इसीलिए घोषित किया गया क्योंकि कटऑफ को लेकर फैसला नहीं हो पा रहा था. पिछली परीक्षाओं की तरह ओबीसी की कट ऑफ अगर सामान्य से ऊपर रखी जाती तो जाट, सैनी, यादव जैसी प्रभावशाली जातियों में गुस्सा फैलने का खतरा था. लेकिन ओबीसी की कट ऑफ को सामान्य वर्ग के बराबर रखने में सवर्ण अभ्यर्थियों के कम पास होने का रिस्क भी था. एससी/एसटी कानून पर अध्यादेश के मामले में वैसे ही सवर्णों में इस समय बीजेपी के खिलाफ गुस्सा बताया जा रहा है. हालांकि आरपीएससी एक संवैधानिक निकाय है, लेकिन लोगों के बीच यही चर्चा थी कि सरकार के कारण रिजल्ट में देरी हुई है.

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नतीजे पर बवाल क्यों?

5 अगस्त को हुई RAS प्री परीक्षा के 78 दिन बाद नतीजा घोषित किया गया. इसमें सामान्य वर्ग की कट ऑफ 76.06 मार्क्स तो ओबीसी की कट ऑफ 99.33 मार्क्स रही, यानी पूरे 23 मार्क्स ज्यादा. 5 जातियों को मिलाकर बनाई गई मोस्ट बैकवार्ड कैटेगरी (MBC) की कट ऑफ भी सामान्य से 16 मार्क्स ऊपर रही. टीएसपी इलाके में सामान्य की कट-ऑफ 71.14 तो अनुसूचित जाति की 75.17 मार्क्स रही. यानी एससी वर्ग की कटऑफ सामान्य वर्ग से 4 मार्क्स ज्यादा. लोग सवाल उठा रहे हैं कि जिन वर्गों को दमित और पिछड़ा होने के चलते आरक्षण दिया गया, वे सामान्य से इतना ऊंचा कैसे?

पिछली परीक्षा (RAS-2016) का नतीजा महज 17 दिन में घोषित कर दिया गया था. लेकिन इसबार बार-बार यही कहा गया कि लोकसेवा आयोग कोई रिस्क नहीं लेना चाहता इसलिए नतीजों को व्यापक परीक्षण के बाद ही जारी किया जाएगा. नतीजे किस तरह जारी किए जाएं, इसके लिए कार्मिक विभाग से भी राय ली गई.

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बहरहाल, कार्मिक विभाग की राय के बाद भी नतीजा वैसे ही विवादित रहा जैसे पिछले कुछ रहे थे. बार-बार परीक्षाओं के मामले कोर्ट में जा रहे हैं और एक बार फिर यही हुआ है. दरअसल, पिछले कुछ साल से आयोग की कई परीक्षाओं में ओबीसी की कट ऑफ सामान्य वर्ग से ज्यादा दी जा रही है. 2016 में पटवारी परीक्षा में ओबीसी की कट ऑफ ऊंची रखी गई. आरएएस-2013 की मुख्य परीक्षा में भी ओबीसी की कटऑफ सामान्य वर्ग से 31 मार्क्स ऊपर थी. आरएएस-2016 की प्री परीक्षा की ओबीसी कट ऑफ भी सामान्य वर्ग से करीब 17 मार्क्स ऊपर थी.

ये सभी मामले अदालत में गए और सभी में कोर्ट ने ओबीसी की कट ऑफ को सामान्य वर्ग से ऊपर नहीं रखने के आदेश दिए. कट ऑफ तो नीचे ले आई गई लेकिन इन सबके कारण परीक्षार्थियों को खासी मुश्किलों का सामना करना पड़ा. राजस्थान में तो ऐसा भी कहा जाने लगा है कि यहां परीक्षा के 3 नहीं 4 चरण होते हैं- प्री, मेंस, इंटरव्यू और कोर्ट. कई परीक्षाओं की प्रक्रिया तो महीनों और सालों से खिंच रही है. आरएएस-2016 का फाइनल नतीजा पिछले साल अक्टूबर में आ गया था लेकिन 12 महीने बाद भी नियुक्ति का इंतजार है. हालात ये हैं कि ऊंची रैंक हासिल कर जश्न मना चुके लोग भी 2018 की प्री परीक्षा में दोबारा बैठने को मजबूर हुए हैं. डर था कि अगर भर्ती अदालत ने खारिज कर दी तो क्या होगा?

अदालती मामले, फिर भी कट ऑफ ऊपर क्यों?

सबके जेहन में यही सवाल है कि बार-बार मामले कोर्ट में जाने के बावजूद आरपीएससी लगातार पिछड़े वर्गों की कट ऑफ सामान्य वर्ग से ऊंची क्यों रख रही है. दरअसल, आरपीएससी के लिए नतीजों और आरक्षण का मुद्दा दुधारी तलवार की तरह है. पिछड़े वर्गों की ऊंची कट ऑफ के पीछे तर्क दिया जा रहा है कि 15 गुणा अभ्यर्थियों को पास करने की बाध्यता की वजह से ऐसा करना पड़ रहा है.

गहराई में गए बिना 15 गुणा अभ्यर्थियों की बाध्यता को यूं समझिए कि आरएएस परीक्षा के लिए आयोग की नियमावली में विज्ञापित सीटों के 15 गुणा अभ्यर्थियों को पास करने का नियम है. अब अगर रोस्टर लागू किया जाए तो सामान्य वर्ग की अधिकतर सीटों पर ओबीसी का कब्जा हो सकता है. माना जाता है कि राजस्थान में करीब 54 फीसदी जनसंख्या ओबीसी है और 15 फीसदी सवर्ण जनसंख्या. 31.3% आबादी एससी और एसटी वर्गों की है. ऐसे में सामान्य वर्ग के हित को सुरक्षित रखने के लिए कैटेगरी में 15 फीसदी को पास करने का फॉर्मूला अपनाया जा रहा है.

वैसे, आरएएस-2016 परीक्षा में गुर्जर आरक्षण (SBC) पर तस्वीर साफ न होने के चलते सामान्य वर्ग के 46% अभ्यर्थी ही पास किए गए. मामला कोर्ट में गया और राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने फाइनल नतीजे आ चुकने के बावजूद प्री परीक्षा के नतीजे को रिवाइज करने के आदेश दिए. फिलहाल मामला सुप्रीम कोर्ट में है.

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गुर्जर आंदोलन की प्रतीकात्मक तस्वीर

बीजेपी के लिए हो सकती है मुश्किल!

तमाम सर्वे बीजेपी के लिए वैसे ही इस बार सत्ता में वापसी को टेढ़ी खीर बता रहे हैं. अब आरएएस के इस नतीजे ने बीजेपी के सामने और बड़ी मुश्किल खड़ी कर दी है. सोशल मीडिया पर बीजेपी के खिलाफ कैंपेन छेड़ दिया गया है. लोग लिख रहे हैं कि राजस्थान लोकसेवा आयोग के चेयरमैन पद पर वसुंधरा सरकार ने उत्तर प्रदेश के व्यक्ति को बिठाया, जो राजस्थानियों के खिलाफ काम कर रहा है. ओबीसी वर्ग के लोग अपने कैंपेन में बीजेपी को सबक सिखाने का आह्वान कर रहे हैं.

ओबीसी और टीएसपी में एससी की ऊंची कट ऑफ के खिलाफ हाईकोर्ट में वाद दायर भी कर दिया गया है. पिछड़ी जातियों को पूरी उम्मीद है कि कोर्ट ओबीसी की कट ऑफ को नीचे लाने के निर्देश देगा. हर बार ऐसा ही हुआ है, लेकिन इस बार पिछड़ी जातियां बीजेपी को बख्शने के मूड में नहीं है. सोशल मीडिया पर यूपीएससी की किसी रिपोर्ट का भी हवाला दिया जा रहा है. दावा किया जा रहा है कि इस रिपोर्ट के मुताबिक मोदी सरकार आने के बाद से प्रशासनिक सेवाओं में ओबीसी की भागीदारी को लगातार कम किया गया है.

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हालांकि सुप्रीम कोर्ट बहु-चरणीय परीक्षाओं में रोस्टर को फाइनल नतीजों में ही लागू करने की बात कह चुका है, लेकिन लोगों के लिए तात्कालिक फायदा या नुकसान ज्यादा मायने रखता है. फिलहाल आरएएस परीक्षा में सामान्य और ओबीसी वर्ग के 23 मार्क्स के फासले में 10 हजार से ज्यादा अभ्यर्थी माने जा रहे हैं. इनमें गहरा गुस्सा है और इनके परिवारों को भी ये बात अखर रही है. मेरे एक पड़ोसी के शब्दों में- ‘सवर्णों से ज्यादा मार्क्स लाने के बावजूद ओबीसी को रोका जा रहा है तो हम भी बीजेपी को अपनी ताकत दिखा देंगे.’ अगर 10 हजार परिवार और उनके रिश्तेदार खिलाफ होते हैं तो निश्चित रूप से बीजेपी के लिए घंटी खतरे की ही बजनी है.

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